जब ‘आधी आबादी’ कमायेगी नहीं तो किसानों की आय दोगुनी कैसे होगी

जब ‘आधी आबादी’ कमायेगी नहीं तो किसानों की आय दोगुनी कैसे होगीमहिला किसान मजदूरों के साथ हो रहा भेदभाव

पिछले दिनों एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा था कि जब तक महिलाओं को कृषि की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बनाया जायेगा, तब तक किसानों की आय दोगुना नहीं हो पायेगी।

लेकिन ऐसा है नहीं है। ग्रामीण भारत में कृषि मजदूरी के क्षेत्र में भी महिलाओं के साथ भेदभाव किया जा रहा है। ये बात The Review of Agrarian Studies की शोध में सामने आई है। 1998 से 2017 के बीच महिला किसानों की मजदूरी दर पुरुष मजदूर किसानों की अपेक्षा बहुत कम बढ़ी है। मजदूरी में भी महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है, जैसा की अन्य क्षेत्रों में होता है।

एनएसएसओ (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय) के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले तीन दशकों में कृषि क्षेत्र में महिलाओं एवं पुरुषों, दोनों की संख्या में गिरावट आई है। जहाँ पुरुषों में संख्या 81 प्रतिशत से घटकर 63 प्रतिशत हो गई है, वहीं महिलाओं की संख्या 88 प्रतिशत से घटकर 79 प्रतिशत ही हुई है, क्योंकि महिलाओं की जनसंख्‍या में गिरावट पुरुषों की जनसंख्‍या में गिरावट से काफी कम है, इसलिए इस प्रवृति को आसानी से “भारतीय कृषि का महिलाकरण” कहा जा सकता है।

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भारत सहित अधिकतर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण महिलाओं का सबसे अधिक योगदान है। आर्थिक रुप से सक्रिय 80 प्रतिशत महिलाएं कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं। इनमें से 33 प्रतिशत मजदूरों के रूप में और 48 प्रतिशत स्व-नियोजित किसानों के रूप में कार्य कर रही हैं। एनएसएसओ (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय) रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग 18 प्रतिशत खेतिहर परिवारों का नेतृत्व महिलाएं ही करती हैं। कृषि का कोई कार्य ऐसा नहीं है जिसमें महिलाओं की भागीदारी न हो।

उत्तर प्रदेश, बहराइच के ब्लॉक रीसिया, गांव दूरा की रामा कहती हैं "मैं अपने खेत में काम तो करती ही हूं, अपने पति के साथ दूसरों के खेतों में भी मजदूरी करती हूं। मेरे पति को एक दिन का 250 और मुझे 200 रुपए मिलते हैं। आदमी लोग ज्यादा मेहनत करते हैं, इसलिए उन्हें ज्यादा मजदूरी मिलती है।"

श्रम ज्यादा करें पर पारिश्रमिक पुरुषों से कम मिले। यह प्रमाण है व्यवस्था पर मर्दों के जबरिया कब्ज़े का। बुवाई / रोपाई / निराई के लिए महिलाओं को आंध्र प्रदेश में पुरुषों को 145 रुपए मजदूरी मिलती है, जबकि महिलाओं को 114.88 रुपए मजदूरी मिल रही है। बिहार में इस काम के लिए पुरुषों को 173 रुपए रोज मिल रहे हैं, पर महिलाओं को 138.27 रुपए। इस मामले में मध्यप्रदेश में पुरुषों को 127.59 रुपए और महिलाओं को 135.45 रुपए की मजदूरी मिल रही है।

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देश में मजदूरी में सबसे ज्यादा गैर बराबरी महाराष्ट्र में है। यहां पुरुषों को 173.73 रुपए और महिलाओं 97.62 मिलता है। ग्रामीण महिला किसान मजदूरी दर के मामले में महाराष्ट्र सबसे पीछे है। वहीं उत्तर प्रदेश में ये दर 146.45, 128.26 है। देश में 1998 में बुवाई / रोपाई / निराई के लिए पुरुष किसानों को 95 रुपए मिलते थे, इनकी मजदूरी दर 2016-17 में 158.08 रुपए पहुंची जबकि 1998 में महिलाओं की मजदूरी दर देश में 78.23 रुपए थी जो अब तक केवल 131.44 रुपए तक ही पहुंच पाई है।

राजस्थान पाली के किसान भंवर सिंह राजपुरोहित बताते हैं "ऐसा तो मेरे यहां भी होता है। जैसे खेत भराई का काम कठिन होता है, तो उसे करने के लिए पुरुष मजदूर ज्यादा पैसे तो लेंगे ही। हालांकि कई मामलों में मजदूरी बराबर मिलती है। लेकिन ज्यादातर मामलों में दोनों की मजदूरी में अंतर होता ही हैं।

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देश में ऐसा एक ही प्रदेश है जहां महिलाओं की मजदूरी दर (कृषि) बुवाई / रोपाई / निराई के मामले पुरुषों से ज्यादा है। ये प्रदेश मध्य प्रदेश हैं जहां पुरुषों को 127.59 रुपए और महिलाओं को 135.45 रुपए की मजदूरी मिल रही है।

राजस्थान, जिला श्रीगंगनगर के सूरतगढ़ की रहने वाली महिला किसान अंजू विश्नोई कहती हैं “भेदभाव तो हमारे यहां भी होता है। पुरुषों की तुलना में हमें मजदूरी कम मिलती है जबकि काम हम बराबर का ही करते हैं।”

जबकि केरला में महिलाओं की मजदूरी दर अन्य प्रदेशों की अपेक्षा सबसे ज्यादा 273.52 रुपए है। इसी तरह कटाई / खलिहान / सूप के काम में आंध्र प्रदेश में महिलाओं को इस समय 119.57 रुपए मजदूरी मिल रही है, जबकि पुरुषों को 153.28 रुपए मिल रही है। ये हाल हर प्रदेश में है। बात अगर भारत की करें तो कटाई / खलिहान / सूप के क्षेत्र में पुरुष किसान मजदूरों की आय 1998 में 94.42 रुपए थी जो अब 2016-17 में 157.12 रुपए पहुंची जबकि 1998 में महिलाओं की मजदूरी दर देश में 77.83 रुपए थी जो अब तक केवल 132.52 रुपए तक ही पहुंच पाई है।

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वहीं उत्तर प्रदेश, जिला सीतापुर के ब्लॉक मछरेटा, गाँव गोड़ी ही रहने वालीं सुनीता वर्मा (30) जो एक संस्था के लिए काम करती हैं, बताती हैं " मेरे तो यहां ऐसी बहुत कम ही होता है कि महिला और पुरुष किसानों को अलग-अलग पैसे दिए जाएं। हां, कई कामों में असामना होती है। क्योंकि लोगों का ऐसा मानना है कि पुरुष ज्यादा काम करते हैं।"

खाद्य और कृषि संगठन (Food & Agriculture Organisation) के आंकड़ों की मानें तो कृषि क्षेत्र में कुल श्रम में ग्रामीण महिलाओं का योगदान 43 प्रतिशत है, वहीं कुछ विकसित देशों में यह आंकड़ा 70 से 80 प्रतिशत भी है। ऐसे में महिला किसान की खेती-किसानी में बड़ी भूमिका को देखते हुए भारत में 15 अक्टूबर को अब महिला किसान दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। भारतीय जनगणना 2011 के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में छह करोड़ से ज़्यादा महिलाएं खेती के व्यवसाय से जुड़ी हैं।

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