आम में बढ़िया उत्पादन पाने के लिए जनवरी में अपनाएँ यह आसान तरीका
Dr SK Singh | Jan 16, 2026, 14:51 IST
जनवरी का महीना आम की फसल के लिए बेहद अहम होता है। इसी समय मिली बग कीट जमीन से निकलकर पेड़ों पर चढ़ता है और फूल व फलों को नुकसान पहुँचाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, तने पर पॉलीथिन शीट बांधने जैसी सरल तकनीक अपनाकर किसान इस कीट को शुरुआत में ही रोक सकते हैं। यह तरीका कम लागत वाला, पर्यावरण के अनुकूल और उत्पादन बढ़ाने में बेहद असरदार है।
आम भारत का सबसे लोकप्रिय फल है और लाखों किसानों की आमदनी का बड़ा सहारा भी है। लेकिन हर साल जैसे ही आम के पेड़ों में बौर यानी मंजर आने का समय पास आता है, वैसे ही एक छोटा सा कीट पूरी फसल को बर्बाद करने की ताकत रखता है। इस कीट का नाम है मिली बग। कई किसान इसे सफेद कीड़ा या रस चूसने वाला कीट भी कहते हैं। यह कीट पेड़ की कोमल टहनियों, फूलों और छोटे फलों पर हमला करके रस चूसता है, जिससे फूल झड़ जाते हैं, फल गिर जाते हैं और उपज में भारी कमी आ जाती है। कई इलाकों में देखा गया है कि अगर समय पर नियंत्रण न किया जाए तो आम की पैदावार 50 से 70 प्रतिशत तक घट सकती है।
जनवरी का महीना इस कीट के नियंत्रण के लिए सबसे अहम माना जाता है, क्योंकि यही वह समय होता है जब मिली बग जमीन से निकलकर पेड़ों पर चढ़ना शुरू करता है। इस कीट का जीवन चक्र मिट्टी से जुड़ा होता है। गर्मियों में मादा कीट मिट्टी में अंडे देती है। ठंड के मौसम में, खासकर दिसंबर के अंत और जनवरी में, इन अंडों से छोटे-छोटे शिशु निकलते हैं। ये शिशु उड़ नहीं सकते, बल्कि जमीन से रेंगते हुए सीधे आम के पेड़ के तने पर चढ़ते हैं। जैसे ही वे ऊपर पहुँचते हैं, फरवरी-मार्च में फूलों पर हमला कर देते हैं। अगर किसान जनवरी में ही इनके रास्ते को रोक दे, तो आगे होने वाला पूरा नुकसान बचाया जा सकता है।
इसी सिद्धांत पर आधारित है पॉलीथिन शीट बांधने की तकनीक। यह तरीका बहुत सस्ता, आसान और पर्यावरण के लिए सुरक्षित है। इसमें आम के पेड़ के मुख्य तने पर जमीन से लगभग एक से डेढ़ फुट ऊपर चिकनी पॉलीथिन शीट कसकर बांध दी जाती है। जब मिली बग के शिशु जमीन से निकलकर ऊपर चढ़ने की कोशिश करते हैं, तो यह पॉलीथिन उनके लिए दीवार की तरह काम करती है। वे इस अवरोध को पार नहीं कर पाते और नीचे ही रुक जाते हैं। अगर पॉलीथिन के ऊपरी किनारे पर हल्की सी ग्रीस या जली हुई मोबिल ऑयल की पतली परत लगा दी जाए, तो कीट और भी आसानी से फिसलकर नीचे गिर जाता है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी जहरीली दवा की जरूरत नहीं पड़ती। इससे मधुमक्खी, तितली जैसे परागण करने वाले मित्र कीट सुरक्षित रहते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे जलवायु-स्मार्ट और पर्यावरण-अनुकूल तरीका मानते हैं। बदलते मौसम के दौर में जब सर्दियाँ पहले जैसी ठंडी नहीं रह गई हैं और कीटों की सक्रियता बढ़ रही है, तब यह तरीका और भी ज्यादा जरूरी हो गया है।
कई बागवानों ने अनुभव किया है कि अगर जनवरी के पहले या दूसरे सप्ताह में यह पॉलीथिन बांध दी जाए और फरवरी तक इसे सही तरीके से संभालकर रखा जाए, तो मिली बग का हमला लगभग खत्म हो जाता है। इससे फूल ज्यादा समय तक टिकते हैं, फल गिरते नहीं हैं और आम का आकार भी अच्छा बनता है। फल की गुणवत्ता बढ़ने से बाजार में बेहतर दाम भी मिलते हैं।
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हालांकि सिर्फ पॉलीथिन बांध देना ही काफी नहीं है। अगर किसान इसे दूसरे अच्छे कृषि तरीकों के साथ अपनाए, तो असर और भी बेहतर होता है। जैसे पेड़ के आसपास की मिट्टी को हल्का खोदकर धूप में पलटना, ताकि मिट्टी में छिपे अंडे नष्ट हो जाएँ। बाग में घास और झाड़ियों को साफ रखना, क्योंकि ये कीटों को छिपने की जगह देती हैं। चींटियों का नियंत्रण करना भी जरूरी है, क्योंकि चींटियाँ मिली बग को बचाकर रखती हैं और उसे पेड़ पर फैलाने में मदद करती हैं। अगर बहुत ज्यादा प्रकोप दिखाई दे, तो नीम आधारित जैविक दवाओं या वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई सीमित मात्रा में कीटनाशक का उपयोग किया जा सकता है।
आज जब खेती की लागत बढ़ रही है और दवाइयों पर खर्च किसानों के लिए भारी बोझ बन चुका है, तब इस तरह के यांत्रिक और प्राकृतिक उपाय बहुत फायदेमंद साबित हो रहे हैं। एक बार पॉलीथिन लगाने का खर्च बहुत कम होता है, लेकिन इससे पूरे सीजन की फसल बच सकती है। यही कारण है कि कई प्रगतिशील किसान अब इस तकनीक को हर साल नियमित रूप से अपना रहे हैं।
अंत में यही कहा जा सकता है कि आम के बाग को मिली बग से बचाने के लिए जनवरी का महीना सोने जैसा मौका है। अगर किसान इस समय थोड़ी सी सावधानी बरत लें, पेड़ के तने पर सही तरीके से पॉलीथिन बांध दें और बाग की सफाई व देखभाल पर ध्यान दें, तो आने वाले महीनों में उन्हें फूल झड़ने, फल गिरने और उत्पादन घटने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। यह छोटा सा कदम बड़े फायदे की ओर ले जाता है और आम की खेती को ज्यादा सुरक्षित, टिकाऊ और लाभकारी बना देता है।
ये भी पढ़ें: इंजीनियर से किसान तक, एग्रोफॉरेस्ट्री के ज़रिए मिट्टी बचाने निकले सिद्धेश सकोरे
जनवरी का महीना इस कीट के नियंत्रण के लिए सबसे अहम माना जाता है, क्योंकि यही वह समय होता है जब मिली बग जमीन से निकलकर पेड़ों पर चढ़ना शुरू करता है। इस कीट का जीवन चक्र मिट्टी से जुड़ा होता है। गर्मियों में मादा कीट मिट्टी में अंडे देती है। ठंड के मौसम में, खासकर दिसंबर के अंत और जनवरी में, इन अंडों से छोटे-छोटे शिशु निकलते हैं। ये शिशु उड़ नहीं सकते, बल्कि जमीन से रेंगते हुए सीधे आम के पेड़ के तने पर चढ़ते हैं। जैसे ही वे ऊपर पहुँचते हैं, फरवरी-मार्च में फूलों पर हमला कर देते हैं। अगर किसान जनवरी में ही इनके रास्ते को रोक दे, तो आगे होने वाला पूरा नुकसान बचाया जा सकता है।
इसी सिद्धांत पर आधारित है पॉलीथिन शीट बांधने की तकनीक। यह तरीका बहुत सस्ता, आसान और पर्यावरण के लिए सुरक्षित है। इसमें आम के पेड़ के मुख्य तने पर जमीन से लगभग एक से डेढ़ फुट ऊपर चिकनी पॉलीथिन शीट कसकर बांध दी जाती है। जब मिली बग के शिशु जमीन से निकलकर ऊपर चढ़ने की कोशिश करते हैं, तो यह पॉलीथिन उनके लिए दीवार की तरह काम करती है। वे इस अवरोध को पार नहीं कर पाते और नीचे ही रुक जाते हैं। अगर पॉलीथिन के ऊपरी किनारे पर हल्की सी ग्रीस या जली हुई मोबिल ऑयल की पतली परत लगा दी जाए, तो कीट और भी आसानी से फिसलकर नीचे गिर जाता है।
इस उपाय को अपनाने से बौर और फल गिरने की समस्या खत्म हो जाएगी।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी जहरीली दवा की जरूरत नहीं पड़ती। इससे मधुमक्खी, तितली जैसे परागण करने वाले मित्र कीट सुरक्षित रहते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे जलवायु-स्मार्ट और पर्यावरण-अनुकूल तरीका मानते हैं। बदलते मौसम के दौर में जब सर्दियाँ पहले जैसी ठंडी नहीं रह गई हैं और कीटों की सक्रियता बढ़ रही है, तब यह तरीका और भी ज्यादा जरूरी हो गया है।
कई बागवानों ने अनुभव किया है कि अगर जनवरी के पहले या दूसरे सप्ताह में यह पॉलीथिन बांध दी जाए और फरवरी तक इसे सही तरीके से संभालकर रखा जाए, तो मिली बग का हमला लगभग खत्म हो जाता है। इससे फूल ज्यादा समय तक टिकते हैं, फल गिरते नहीं हैं और आम का आकार भी अच्छा बनता है। फल की गुणवत्ता बढ़ने से बाजार में बेहतर दाम भी मिलते हैं।
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हालांकि सिर्फ पॉलीथिन बांध देना ही काफी नहीं है। अगर किसान इसे दूसरे अच्छे कृषि तरीकों के साथ अपनाए, तो असर और भी बेहतर होता है। जैसे पेड़ के आसपास की मिट्टी को हल्का खोदकर धूप में पलटना, ताकि मिट्टी में छिपे अंडे नष्ट हो जाएँ। बाग में घास और झाड़ियों को साफ रखना, क्योंकि ये कीटों को छिपने की जगह देती हैं। चींटियों का नियंत्रण करना भी जरूरी है, क्योंकि चींटियाँ मिली बग को बचाकर रखती हैं और उसे पेड़ पर फैलाने में मदद करती हैं। अगर बहुत ज्यादा प्रकोप दिखाई दे, तो नीम आधारित जैविक दवाओं या वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई सीमित मात्रा में कीटनाशक का उपयोग किया जा सकता है।
आज जब खेती की लागत बढ़ रही है और दवाइयों पर खर्च किसानों के लिए भारी बोझ बन चुका है, तब इस तरह के यांत्रिक और प्राकृतिक उपाय बहुत फायदेमंद साबित हो रहे हैं। एक बार पॉलीथिन लगाने का खर्च बहुत कम होता है, लेकिन इससे पूरे सीजन की फसल बच सकती है। यही कारण है कि कई प्रगतिशील किसान अब इस तकनीक को हर साल नियमित रूप से अपना रहे हैं।
अंत में यही कहा जा सकता है कि आम के बाग को मिली बग से बचाने के लिए जनवरी का महीना सोने जैसा मौका है। अगर किसान इस समय थोड़ी सी सावधानी बरत लें, पेड़ के तने पर सही तरीके से पॉलीथिन बांध दें और बाग की सफाई व देखभाल पर ध्यान दें, तो आने वाले महीनों में उन्हें फूल झड़ने, फल गिरने और उत्पादन घटने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। यह छोटा सा कदम बड़े फायदे की ओर ले जाता है और आम की खेती को ज्यादा सुरक्षित, टिकाऊ और लाभकारी बना देता है।
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