इसलिए नहीं महंगी हुई दाल : बफर स्टॉक से नहीं गली व्यापारियों की दाल

इसलिए नहीं महंगी हुई दाल : बफर स्टॉक से नहीं गली व्यापारियों की दालप्रतीकात्मक तस्वीर।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। पिछले खरीफ सीज़न में दालों के अच्छे घरेलू उत्पादन और सरकार द्वारा देश में दाल आपूर्ति के लिए बनाए जा रहे 20 लाख टन के दलहनी बफर स्टॉक की मदद से इस वर्ष खुदरा बाज़ारों में दाल की आवक अच्छी रही है। इससे आम जनता को सस्ती दाल नसीब हो रही है और व्यापारियों को घाटा झेलना पड़ रहा है।

लखनऊ की पांडेयगंज गल्ला मंडी में इस समय दालें पर्याप्त मात्रा में हैं। बड़ी मात्रा में दाल का स्टॉक होने के कारण मंडी व्यापारी अब अपने मनमुताबिक लंबे चौड़े रेट न बताकर सस्ते रेट पर लोगों को दाल बेच रहे हैं।

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गल्ला मंडी में पिछले आठ वर्षों से दाल का व्यापार कर रहे राम गोपाल अग्रवाल (51 वर्ष) अधिकतर उत्तर प्रदेश के झांसी, जालौन सुल्तानपुर जिले, नागपुर (महाराष्ट्र) और मध्यप्रदेश राज्यों से आने वाली दालों का स्टॉक रखते हैं। राम गोपाल बताते हैं, “इस समय मंडी में दाल का बाज़ार डाउन चल रहा है। अप्रेल में अरहर का भाव अच्छा था, 6,500 रुपए प्रति कुंतल रेट पर दाल मंगवा ली थी, पर अब रेट डाउन हो गया है इसलिए 5,500 से 5,700 रुपए प्रति कुंतल रेट पर दाल बेचनी पड़ रही है।’’

‘सस्ते दाम पर बेचनी पड़ रही हैं दालें’

लखनऊ की रकाबगंज अनाज मंडी में दाल का व्यापार कर रहे व्यापरियों को दाल का पिछला स्टॉक निकलवाने के लिए सस्ते रेट पर दालें बेचनी पड़ रही है। अनाज मंडी में दाल के बड़े व्यापारी पियूष मिश्रा ने बताया,’’ दाल के व्यापार में डिमांड और सप्लाई का बड़ा खेल होता है। दाल जल्दी खराब हो जाती हैं, इसलिए हम पर हमेशा पुराना स्टॉक निकालने का दबाव रहता है। इस बार तो दाल का पैदावार भी अच्छी हुई थी, इसलिए दाम पिछले छह- सात महीनों से दाल के दाम कम ही रहे हैं।’’भारत में अनाजों की पैदावार बढ़ाने व दालों के व्यापार पर नज़र रख रही संस्था इंडियन पल्सेज एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (आईपीजीए) के मुताबिक, इस साल देश में दलहन फसलों की पैदावार तेज़ी से बढ़ी है। इसलिए देश में साल भर दालों का आपूर्ति में कोई कमी नहीं आएगी।

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‘दाल के रेट में कोई खास बदलाव नहीं आएगा’

बाज़ारों में दाल की पर्याप्त मात्रा को देखते हुए किसानों को दाल के साथ साथ अन्य फसलों की खेती करने की सलाह देते हुए बनारस हिंदू विश्व विद्यालय के कृषि अर्थशास्त्र विभाग के वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. चंद्र सेन मे बताया,’’ बाज़ारों में दाल के रेट कम हो गए हैं, इसे किसानों को गंभीरता से लेना चाहिए। आने वाले समय में दाल के दामों में कोई खास बदलाव नहीं आएगा, इसलिए बुदि्धमानी इसमें है कि किसान इस वर्ष दाल के साथ साथ कुछ ऐसी फसलों की भी खेती करें,जिनके दामों में अधिक उतार चढ़ाव नहीं होता हो। इसमें धान व मौसमी सब्जियों की खेती प्रमुख है।’’ कृषि मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 19 जुलाई तक 93.36 लाख हेक्टेयर में दलहन फसलों की बुवाई हो चुकी है, जबकि पिछले वर्ष इस समय तक देश में 90.33 लाख हेक्टेयर में दलहन फसलों की बुवाई हुई थी।

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बीस लाख टन दालों का बफर स्टॉक का है लक्ष्य

कृषि मंत्रालय भारत सरकार के मुताबिक केंद्र सरकार ने इस वर्ष 20 लाख टन दालों का बफर स्टॉक तैयार करने का लक्ष्य रखा है। बफर स्टाक की स्थिति की समीक्षा में यह पाया गया है कि इस वर्ष मार्च 2017 तक देश में 16.46 लाख टन दलहन की खरीद हुई है। इसमें पिछले खरीफ सत्र में आठ लाख टन अरहर दाल की खरीद किसानों से 50 रुपए प्रति किलोग्राम के समर्थन मूल्य पर की गई है। इससे किसानों ने दालों को अच्छे दाम पर बेचा है।

दाल के दामों में 30 प्रतिशत गिरावट आई

केंद्र सरकार द्वारा मार्च 2017 में नई दिल्ली में दलहन फसलों की खरीद पर हुई सीओएस बैठक में यह सामने आया है कि सरकार ने देश में पिछले खरीफ सत्र में अच्छे उत्पादन और विदेशों से लगातार हो रहे दालों के आयात के बलबूते पिछले आठ महीनों दालों के दामों में 30 प्रतिशत गिरावट आई है, जिससे दालों की काला बाज़ारी भी कम हुई है। भारत में दालों के उत्पादन व इसके बाज़ार पर काम कर रही सरकारी संस्था भारतीय दलहन अनुसन्धान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. पीके कटियार के मुताबिक आने वाले कई वर्षों तक देश में दालों के व्यापार में कोई भी कठिनाई नहीं आ सकती है।

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पीके कटियार बताते हैं, ‘’ देश में मौजूदा समय में दलहनी फसलों का उत्पादन 160 लाख टन से भी अधिक है। सरकार ने इस वर्ष इसे बढ़ाकर 240 लाख टन करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए हम प्रदेश के कुछ कृषि विश्वविद्यालयों और केवीके की मदद से किसानों को दलहनी फसलों की खेती के लिए विशेष ट्रेनिंग देने के लिए दलहन सीड हब्स बनाना रहे हैं।’’ वो आगे बताते हैं कि दलहनी फसलों को बढ़ावा मिलने से मंडियों व खुदरा बाज़ारों में दाल पर्याप्त मात्रा में बनी रहेगी, जिससे दाल के बढ़ते दामों पर काबू पाया जा सकेगा।

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