0

आठवीं पास किसान जो अपनी गाड़ियों में पेट्रोल पंप से नहीं, गोशाला से भरते हैं ईंधन

Gaon Connection | Jan 10, 2026, 16:52 IST
Share
मध्य प्रदेश के शाजापुर ज़िले के एक छोटे से गाँव में गाड़ियाँ पेट्रोल पंप से नहीं गोशाला से चलती हैं। देवेंद्र सिंह परमार एक साधारण डेयरी किसान ने गोबर से बायोगैस और फिर CNG बनाकर ट्रैक्टर, बाइक और गाड़ियों को चलाना शुरू किया।
गाँव से निकला समाधान: गोबर से चलती गाड़ियाँ
जब देश में पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ते हैं, तो शहरों में लोग परेशान होते हैं, बहस होती है, शिकायतें होती हैं। लेकिन इस गाँव में कुछ गाड़ियाँ ऐसी हैं, जिन्हें ईंधन भरवाने के लिए पेट्रोल पंप नहीं जाना पड़ता। यहाँ ट्रैक्टर, बाइक और पिकअप गोशाला से निकलते हैं, क्योंकि इनका ईंधन गोबर से बनता है। यह कोई प्रयोगशाला या बड़ी कंपनी की कहानी नहीं है, बल्कि एक साधारण किसान की समझ और ज़िद की कहानी है। इन्होंने साबित कर दिया कि नवाचार किताबों से नहीं, ज़मीन से भी पैदा हो सकता है।

मध्य प्रदेश के शाजापुर ज़िले के पटलावदा गाँव के देवेंद्र सिंह परमार हमेशा से इनोवेटर नहीं थे। वे भी दूसरे किसानों की तरह खेती करते थे, मौसम के भरोसे रहते थे और घाटे से जूझते थे। कभी बारिश कम हो जाती, कभी ज़्यादा, कभी फसल का दाम नहीं मिलता। खेती की यही अनिश्चितता उन्हें लगातार सोचने पर मजबूर करती रही कि क्या जीवन भर यही चक्र चलता रहेगा। तभी उन्होंने खेती के साथ-साथ पशुपालन का रास्ता चुना।

देवेंद्र सिंह परमार बताते हैं, "2002 से पशुपालन का काम कर रहे हैं, हमारे यहाँ स्टार्टिंग में चार–पाँच पशु थे, उसके साथ हमने बायो गैस और दूध दोनों पर काम किया, धीरे–धीरे हमने इसको विस्तार देते गए, आगे–आगे बढ़ाते गए और आज हम घी बना रहे हैं, दूध से पनीर बना रहे हैं, मावा बना रहे हैं।

जब गोबर बना ताक़त, मध्य प्रदेश के एक किसान का कमाल
जब गोबर बना ताक़त, मध्य प्रदेश के एक किसान का कमाल


वो आगे कहते हैं, "हमने 180 पशुओं को पालने के लिए जैसा हमारे पास पाँच एकड़ जमीन है, उसमें हमने नैपियर ग्रास लगा रखा है, तो जो नैपियर का उत्पादन होता है, उससे हमारे पशुओं का पालन पोषण होता है, बाकी गेहूँ का भूसा हम उनको खिलाते हैं और पशु आहार, कच्चा माल लाकर, जैसे तुड़ी वगैरह लाकर घर पर बनाते हैं।

शुरुआत में गोबर सिर्फ खाद तक सीमित था, लेकिन देवेंद्र ने उसमें संभावना देखी। उन्होंने बायोगैस के बारे में जाना, खुद सीखा, छोटे-छोटे प्रयोग किए और अपने स्तर पर एक बायोगैस प्लांट खड़ा किया। लेकिन उनकी सोच यहीं नहीं रुकी।

ये भी पढ़ें: जब स्वाद बचाने निकली एक महिला, मेघालय का Mei-Ramew Café

देवेंद्र बताते हैं, "जो गैस निकलती है, उसे वे वाटर टावर के ज़रिए साफ़ करते हैं, फिर उसे कंप्रेस करके CNG में बदल देते हैं। आज उसी CNG से उनकी बाइक, ट्रैक्टर, दो लोडिंग पिकअप और एक सवारी गाड़ी चलती हैं। यानी गाँव में गाड़ियाँ पेट्रोल पंप से नहीं, गोबर से चल रही हैं।"

खेती, डेयरी और ऊर्जा, तीनों में आत्मनिर्भरता की मिसाल
खेती, डेयरी और ऊर्जा, तीनों में आत्मनिर्भरता की मिसाल


देवेंद्र आठवीं पास हैं। उन्होंने कभी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं देखा, लेकिन जो काम उन्होंने ज़मीन पर किया है, वही आज बड़े कॉलेजों की प्रयोगशालाओं में पढ़ाया जाता है। उनके फार्म पर अब दूसरे किसान, छात्र और अधिकारी सीखने आते हैं कि गाँव में ऊर्जा आत्मनिर्भरता कैसे लाई जा सकती है। उन्होंने साबित कर दिया कि पढ़ाई की डिग्री से ज़्यादा ज़रूरी है देखने और समझने की नज़र।

आज देवेंद्र के पास करीब 180 पशु हैं। पाँच एकड़ ज़मीन में उन्होंने नैपियर घास उगा रखी है, जिससे पशुओं का मुख्य पोषण होता है। इसके साथ गेहूँ का भूसा और घर पर तैयार किया गया पशु आहार दिया जाता है। वो बताते हैं, "स्वस्थ पशु ही अच्छा दूध देते हैं, इसलिए हम सफ़ाई, खान-पान और देखभाल पर सबसे ज़्यादा ध्यान देते हैं।"

ये भी पढ़ें: डिजिटल दौर में आदिवासी ज्ञान की पाठशाला: जहाँ धनुर्विद्या सीखते हैं बच्चे

इसी का नतीजा है कि आज उनकी डेयरी हर दिन सैकड़ों लीटर शुद्ध दूध देती है, जो शाजापुर, उज्जैन और इंदौर जैसे शहरों तक पहुँचता है। दूध से वे घी, पनीर और मावा भी बनाते हैं, जिससे उनकी आमदनी के कई रास्ते खुलते हैं।

अपनी पत्नी के साथ देवेंद्र सिंह परमार
अपनी पत्नी के साथ देवेंद्र सिंह परमार


देवेंद्र का मॉडल सिर्फ डेयरी का नहीं है, बल्कि एक पूरा चक्र है, पशु दूध देते हैं, गोबर से गैस बनती है, गैस से गाड़ियाँ चलती हैं और बचा हुआ स्लरी फिर खेतों में खाद बनकर जाती है। इससे न सिर्फ़ ईंधन की लागत बचती है, बल्कि पर्यावरण को भी फायदा होता है। खुले में सड़ने वाला गोबर मीथेन जैसी खतरनाक गैस छोड़ता है, लेकिन बायोगैस प्लांट में वही गैस ऊर्जा बन जाती है। यानी प्रदूषण कम होता है और आत्मनिर्भरता बढ़ती है।

सबसे अहम बात यह है कि देवेंद्र अपनी तरक्की तक सीमित नहीं हैं। वे दूसरे किसानों को भी बताते हैं कि पशुपालन कोई छोटा काम नहीं है। यह रोज़गार, ऊर्जा और सम्मान, तीनों का रास्ता बन सकता है। उनका मानना है कि अगर गाँव का हर डेयरी किसान बायोगैस अपनाए, तो गाँव पेट्रोल-डीज़ल पर निर्भर ही नहीं रहेगा। यही असली आत्मनिर्भरता है।

देवेंद्र ने साबित कर दिया कि समाधान अक्सर हमारे आसपास ही होता है। जो चीज़ हमें रोज़ दिखाई देती है, जैसे गोबर, वही भविष्य का ईंधन बन सकती है, अगर हम उसे अलग नज़र से देखें। आत्मनिर्भर भारत की बात जब होती है, तो उसकी सबसे सशक्त तस्वीर शायद यहीं दिखती है, एक किसान, उसकी गायें और गोबर से चलती गाड़ियाँ।

ये भी पढ़ें: जुर्माने से जागरूकता तक: एक ग्राम प्रधान ने अपनी पंचायत में कैसे जीती प्लास्टिक से जंग?
Tags:
  • iogas to CNG India
  • Cow dung fuel innovation
  • Rural energy solutions India
  • Dairy farming and biogas
  • Sustainable fuel from biogas
  • Farmer innovation Madhya Pradesh
  • Compressed biogas plant India
  • Renewable energy village model
  • CNG from cow dung
  • Self reliant rural energy

Follow us
Contact
  • Gomti Nagar, Lucknow, Uttar Pradesh 226010
  • neelesh@gaonconnection.com

© 2025 All Rights Reserved.