झाबुआ के गांधी: जिन्होंने ग्राम स्वराज को ज़मीन पर उतार दिया
Gaon Connection | Jan 17, 2026, 15:58 IST
महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज का सपना आज भी ज़िंदा है मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले में। पद्मश्री महेश शर्मा पिछले 25 वर्षों से आदिवासी गाँवों में पानी, खेती, शिक्षा और रोज़गार के ज़रिये आत्मनिर्भरता का मॉडल खड़ा कर रहे हैं।
महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की थी, ऐसे गाँव जहाँ लोग आत्मनिर्भर हों, अपने पैरों पर खड़े हों, अपनी ज़रूरतें खुद पूरी करें और मजबूरी में शहरों की ओर पलायन न करें। यह विचार किताबों में तो दर्ज है, भाषणों में दोहराया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले में एक व्यक्ति पिछले पच्चीस वर्षों से इसे ज़मीन पर उतारने में लगा हुआ है। उनका नाम है महेश शर्मा, जिन्हें लोग प्यार से “झाबुआ का गांधी” कहते हैं।
मूल रूप से मध्य प्रदेश के दतिया ज़िले के रहने वाले महेश शर्मा बचपन से ही समाज सुधारकों के बीच पले-बढ़े थे, जहाँ स्वतंत्रता सेनानियों और सामाजिक कार्यों का प्रभाव उनके विचारों पर गहरा पड़ा। इसी सोच के साथ वे 1998 में पहली बार झाबुआ ज़िले में पहुँचे, और वहीं बस गए। उस समय झाबुआ और अलीराजपुर एक ही बड़ा ज़िला था, जिसमें भील जनजाति की आबादी अधिक थी। बाहर वालों की सोच अक्सर इनके बारे में गलत धारणाएँ बनाती थी कि ये लोग शिक्षा या सरकारी योजनाओं को अपनाना नहीं चाहते। लेकिन महेश ने जब इन लोगों के साथ समय बिताया और उनकी समस्याएँ समझीं, तो उन्हें पता चला कि इन गाँवों में सबसे बड़ी कमी थी, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका की।
वे चाहते थे कि आदिवासी समाज की छवि बदले, दया के पात्र से आत्मनिर्भर नागरिक बनने तक। उन्होंने तय किया कि गांधी के ग्राम स्वराज को सिर्फ़ किताबों में नहीं, बल्कि गाँव की गलियों, खेतों और चौपालों में उतारना है। इसी सोच के साथ उन्होंने झाबुआ ज़िले के धर्मपुरी गाँव को अपना ठिकाना बनाया। लेकिन यह सफ़र आसान नहीं था। शुरुआती पाँच-छह साल गाँव वालों को उन्हें समझने में लगे और उन्हें गाँव वालों को समझने में। भरोसा धीरे-धीरे बना, रिश्ते धीरे-धीरे गहरे हुए।
इसी दौरान धर्मपुरी गाँव में शिवगंगा गुरुकुल की स्थापना हुई, एक ऐसा केंद्र जो सिर्फ़ प्रशिक्षण स्थल नहीं, बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता की प्रयोगशाला बन गया। यहाँ गांधी के विचारों को आधुनिक ज़रूरतों के साथ जोड़ा गया। कैसे गाँव में रहकर ही उद्यमिता विकसित की जाए, कैसे खेती से आमदनी बढ़े, कैसे पुराना ज्ञान सहेजा जाए और नई तकनीक को अपनाया जाए, इन सभी सवालों के जवाब यहाँ खेतों, तालाबों और प्रशिक्षण सत्रों में खोजे गए।
महेश शर्मा और उनकी टीम ने गाँव-गाँव जाकर लोगों को समझाया कि शहरों में पलायन ही एकमात्र रास्ता नहीं है। अगर पानी, खेती और स्थानीय संसाधनों को सही तरीके से संभाला जाए, तो गाँव खुद रोज़गार पैदा कर सकते हैं।
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झाबुआ का पहाड़ी इलाका लंबे समय से पानी की समस्या से जूझ रहा था। बारिश का पानी बहकर निकल जाता था और गर्मियों में खेत सूख जाते थे। महेश शर्मा ने गाँव वालों के साथ मिलकर तालाबों, जल-संरचनाओं और जल संरक्षण की योजनाओं पर काम शुरू किया। गाँव के लोग खुद तय करते थे कि कहाँ तालाब बनेगा, कितनी गहराई होगी, कितनी चौड़ाई रखी जाएगी। शिवगंगा धर्मपुरी प्रशिक्षण केंद्र में पाँच-पाँच दिन के प्रशिक्षण सत्र होते हैं, जहाँ ग्रामीणों को पानी रोकने की तकनीक, मिट्टी संरक्षण और प्राकृतिक ढलान के अनुसार संरचनाएँ बनाना सिखाया जाता है। जब पानी रुका, तो खेतों में हरियाली लौटी। जब हरियाली लौटी, तो लोगों की उम्मीदें भी हरी हुईं।
महेश शर्मा बताते हैं, "गाँव के व्यक्तियों ने अपने गाँव में जैविक खेती शुरू की और बहुत ही अच्छा विपणन उन्होंने शुरू किया, पुराने ज्ञान को संजोकर रखा, पुरानी कुरीतियाँ जो आई थीं उन्हें मिटाना शुरू किया और जो नया ज्ञान था उसे सीखने के लिए भारत में जहाँ-जहाँ अच्छा काम हो रहा है, जिन लोगों ने अच्छा काम किया है हम उनको भी यहाँ बुलाते हैं और हमारे यहाँ ग्रामीण लोग दूसरे गाँव में जहाँ कोई प्रेरक काम है वहाँ देखने जाते हैं।
खेती में भी बड़ा बदलाव आया। पहले किसान सिर्फ़ बारिश पर निर्भर रहते थे, बीज बो देते थे और किस्मत के भरोसे बैठ जाते थे। लेकिन अब उन्होंने तकनीकी ढंग से खेती करना सीखा- पौधों की सही दूरी, देसी खाद का उपयोग, रासायनिक उर्वरकों की मात्रा कम करना और मिट्टी की सेहत को प्राथमिकता देना। नारायण डामोर जैसे किसान बताते हैं कि महेश शर्मा से उन्होंने सीखा कि खेती सिर्फ़ बोने का नाम नहीं, समझदारी से उगाने का नाम है। आज धीरे-धीरे गाँवों में जैविक खेती बढ़ रही है, स्थानीय उत्पादों का विपणन हो रहा है और लोग अपने पुराने ज्ञान को फिर से सम्मान देने लगे हैं।
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महेश शर्मा आगे कहते हैं, "गाँव सिर्फ़ खेती तक सीमित नहीं हैं। यहाँ हस्तशिल्प, स्थानीय संसाधन, पर्यटन, पशुपालन और छोटे उद्योग, हर क्षेत्र में अपार संभावनाएँ हैं। इसी सोच के तहत वे देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे अच्छे कामों को झाबुआ लाते हैं और झाबुआ के लोगों को दूसरे गाँवों में प्रेरक उदाहरण दिखाने ले जाते हैं। यह ज्ञान का आदान-प्रदान गाँवों को आपस में जोड़ता है और आत्मनिर्भरता की श्रृंखला बनाता है।"
आज झाबुआ ज़िले के कई गाँवों में बदलाव दिखने लगा है। पलायन की मजबूरी कम हो रही है, पानी की स्थिति बेहतर है, खेती से आमदनी बढ़ रही है और सबसे बड़ी बात, लोगों में अपने गाँव को लेकर गर्व लौट रहा है। महेश शर्मा का यह मिशन सिर्फ़ एक व्यक्ति का प्रयास नहीं रह गया है, यह एक आंदोलन बन चुका है। एक ऐसा आंदोलन जो बताता है कि अगर गाँव मजबूत होंगे, तो देश खुद मजबूत होगा।
महेश शर्मा से जुड़े ग्रामीण नारायण डामोर बताते हैं, "हमने तकनीकी ढंग से खेती करना सीखा, मतलब पहले हम बो देते थे और बारिश के पानी पर निर्भर रहते थे, पौधे कितनी-कितनी दूरी पर होने चाहिए और खाद कैसे डालना चाहिए, ये भी हमने महेश जी से सीखा है। हमने धीरे-धीरे फर्टिलाइज़र डालना भी कम किया और देसी खाद का भी उपयोग हम करने लगे हैं।"
गांधी का ग्राम स्वराज कोई सपना नहीं, अगर उसे ज़मीन पर उतारने वाले लोग हों। महेश शर्मा उसी सपने को रोज़ अपने हाथों से गढ़ रहे हैं, तालाब बनवाकर, खेतों को हराभरा करके, लोगों को जोड़कर और उम्मीदें उगाकर। और यह बदलाव शुरू हो रहा है
महेश के इन प्रयासों के असर को कोरोना महामारी के समय भी देखा गया। जब बाहर मजदूरी करने वाले लोग लौटे, तो ग्रामीणों ने ही उन लौटे लोगों का 14 दिन क्वारंटाइन व्यवस्था में रखकर संक्रमण से सुरक्षा सुनिश्चित की, स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों को साथ लेकर तैयारी की और एक सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना दिखायी। यह दिखाता है कि महेश का काम केवल विकास तक सीमित नहीं रहा, यह समुदाय सुरक्षा और आपसी सहयोग का मॉडल बन गया है।
इन वर्षों में महेश शर्मा को उनके कार्यों के लिए पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया, भारत सरकार का चौथा उच्च नागरिक सम्मान। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वही है कि आज झाबुआ के गाँवों में पानी, खेती, युवा भागीदारी और आत्मनिर्भरता की एक नई धारा बह रही है। गाँव अब पलायन की मजबूरी नहीं, बल्कि विकास के अवसर बन रहे हैं।
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मूल रूप से मध्य प्रदेश के दतिया ज़िले के रहने वाले महेश शर्मा बचपन से ही समाज सुधारकों के बीच पले-बढ़े थे, जहाँ स्वतंत्रता सेनानियों और सामाजिक कार्यों का प्रभाव उनके विचारों पर गहरा पड़ा। इसी सोच के साथ वे 1998 में पहली बार झाबुआ ज़िले में पहुँचे, और वहीं बस गए। उस समय झाबुआ और अलीराजपुर एक ही बड़ा ज़िला था, जिसमें भील जनजाति की आबादी अधिक थी। बाहर वालों की सोच अक्सर इनके बारे में गलत धारणाएँ बनाती थी कि ये लोग शिक्षा या सरकारी योजनाओं को अपनाना नहीं चाहते। लेकिन महेश ने जब इन लोगों के साथ समय बिताया और उनकी समस्याएँ समझीं, तो उन्हें पता चला कि इन गाँवों में सबसे बड़ी कमी थी, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका की।
वे चाहते थे कि आदिवासी समाज की छवि बदले, दया के पात्र से आत्मनिर्भर नागरिक बनने तक। उन्होंने तय किया कि गांधी के ग्राम स्वराज को सिर्फ़ किताबों में नहीं, बल्कि गाँव की गलियों, खेतों और चौपालों में उतारना है। इसी सोच के साथ उन्होंने झाबुआ ज़िले के धर्मपुरी गाँव को अपना ठिकाना बनाया। लेकिन यह सफ़र आसान नहीं था। शुरुआती पाँच-छह साल गाँव वालों को उन्हें समझने में लगे और उन्हें गाँव वालों को समझने में। भरोसा धीरे-धीरे बना, रिश्ते धीरे-धीरे गहरे हुए।
महेश का काम सिर्फ़ तालाब और खेती तक सीमित नहीं है। वे जानवरों के संरक्षण और पशुपालन को भी ग्रामीण आजीविका का हिस्सा बनाते हैं।
इसी दौरान धर्मपुरी गाँव में शिवगंगा गुरुकुल की स्थापना हुई, एक ऐसा केंद्र जो सिर्फ़ प्रशिक्षण स्थल नहीं, बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता की प्रयोगशाला बन गया। यहाँ गांधी के विचारों को आधुनिक ज़रूरतों के साथ जोड़ा गया। कैसे गाँव में रहकर ही उद्यमिता विकसित की जाए, कैसे खेती से आमदनी बढ़े, कैसे पुराना ज्ञान सहेजा जाए और नई तकनीक को अपनाया जाए, इन सभी सवालों के जवाब यहाँ खेतों, तालाबों और प्रशिक्षण सत्रों में खोजे गए।
महेश शर्मा और उनकी टीम ने गाँव-गाँव जाकर लोगों को समझाया कि शहरों में पलायन ही एकमात्र रास्ता नहीं है। अगर पानी, खेती और स्थानीय संसाधनों को सही तरीके से संभाला जाए, तो गाँव खुद रोज़गार पैदा कर सकते हैं।
ये भी पढ़ें: इंजीनियर से किसान तक, एग्रोफॉरेस्ट्री के ज़रिए मिट्टी बचाने निकले सिद्धेश सकोरे
झाबुआ का पहाड़ी इलाका लंबे समय से पानी की समस्या से जूझ रहा था। बारिश का पानी बहकर निकल जाता था और गर्मियों में खेत सूख जाते थे। महेश शर्मा ने गाँव वालों के साथ मिलकर तालाबों, जल-संरचनाओं और जल संरक्षण की योजनाओं पर काम शुरू किया। गाँव के लोग खुद तय करते थे कि कहाँ तालाब बनेगा, कितनी गहराई होगी, कितनी चौड़ाई रखी जाएगी। शिवगंगा धर्मपुरी प्रशिक्षण केंद्र में पाँच-पाँच दिन के प्रशिक्षण सत्र होते हैं, जहाँ ग्रामीणों को पानी रोकने की तकनीक, मिट्टी संरक्षण और प्राकृतिक ढलान के अनुसार संरचनाएँ बनाना सिखाया जाता है। जब पानी रुका, तो खेतों में हरियाली लौटी। जब हरियाली लौटी, तो लोगों की उम्मीदें भी हरी हुईं।
महेश और उनकी टीम ने जैविक खेती, देसी बीजों का उपयोग और मिट्टी की संरचना को सुधारने के तरीकों पर प्रशिक्षण शुरू किया।
महेश शर्मा बताते हैं, "गाँव के व्यक्तियों ने अपने गाँव में जैविक खेती शुरू की और बहुत ही अच्छा विपणन उन्होंने शुरू किया, पुराने ज्ञान को संजोकर रखा, पुरानी कुरीतियाँ जो आई थीं उन्हें मिटाना शुरू किया और जो नया ज्ञान था उसे सीखने के लिए भारत में जहाँ-जहाँ अच्छा काम हो रहा है, जिन लोगों ने अच्छा काम किया है हम उनको भी यहाँ बुलाते हैं और हमारे यहाँ ग्रामीण लोग दूसरे गाँव में जहाँ कोई प्रेरक काम है वहाँ देखने जाते हैं।
खेती में भी बड़ा बदलाव आया। पहले किसान सिर्फ़ बारिश पर निर्भर रहते थे, बीज बो देते थे और किस्मत के भरोसे बैठ जाते थे। लेकिन अब उन्होंने तकनीकी ढंग से खेती करना सीखा- पौधों की सही दूरी, देसी खाद का उपयोग, रासायनिक उर्वरकों की मात्रा कम करना और मिट्टी की सेहत को प्राथमिकता देना। नारायण डामोर जैसे किसान बताते हैं कि महेश शर्मा से उन्होंने सीखा कि खेती सिर्फ़ बोने का नाम नहीं, समझदारी से उगाने का नाम है। आज धीरे-धीरे गाँवों में जैविक खेती बढ़ रही है, स्थानीय उत्पादों का विपणन हो रहा है और लोग अपने पुराने ज्ञान को फिर से सम्मान देने लगे हैं।
ये भी पढ़ें: आठवीं पास किसान जो अपनी गाड़ियों में पेट्रोल पंप से नहीं, गोशाला से भरते हैं ईंधन
महेश शर्मा आगे कहते हैं, "गाँव सिर्फ़ खेती तक सीमित नहीं हैं। यहाँ हस्तशिल्प, स्थानीय संसाधन, पर्यटन, पशुपालन और छोटे उद्योग, हर क्षेत्र में अपार संभावनाएँ हैं। इसी सोच के तहत वे देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे अच्छे कामों को झाबुआ लाते हैं और झाबुआ के लोगों को दूसरे गाँवों में प्रेरक उदाहरण दिखाने ले जाते हैं। यह ज्ञान का आदान-प्रदान गाँवों को आपस में जोड़ता है और आत्मनिर्भरता की श्रृंखला बनाता है।"
आज झाबुआ ज़िले के कई गाँवों में बदलाव दिखने लगा है। पलायन की मजबूरी कम हो रही है, पानी की स्थिति बेहतर है, खेती से आमदनी बढ़ रही है और सबसे बड़ी बात, लोगों में अपने गाँव को लेकर गर्व लौट रहा है। महेश शर्मा का यह मिशन सिर्फ़ एक व्यक्ति का प्रयास नहीं रह गया है, यह एक आंदोलन बन चुका है। एक ऐसा आंदोलन जो बताता है कि अगर गाँव मजबूत होंगे, तो देश खुद मजबूत होगा।
महेश इस बात को समझते हैं कि गाँव को प्रतिस्थानशीलता तभी मिलेगी जब लोग खुद की संसाधनों, ज्ञान और तकनीक को अपनाएँ।
महेश शर्मा से जुड़े ग्रामीण नारायण डामोर बताते हैं, "हमने तकनीकी ढंग से खेती करना सीखा, मतलब पहले हम बो देते थे और बारिश के पानी पर निर्भर रहते थे, पौधे कितनी-कितनी दूरी पर होने चाहिए और खाद कैसे डालना चाहिए, ये भी हमने महेश जी से सीखा है। हमने धीरे-धीरे फर्टिलाइज़र डालना भी कम किया और देसी खाद का भी उपयोग हम करने लगे हैं।"
गांधी का ग्राम स्वराज कोई सपना नहीं, अगर उसे ज़मीन पर उतारने वाले लोग हों। महेश शर्मा उसी सपने को रोज़ अपने हाथों से गढ़ रहे हैं, तालाब बनवाकर, खेतों को हराभरा करके, लोगों को जोड़कर और उम्मीदें उगाकर। और यह बदलाव शुरू हो रहा है
महेश के इन प्रयासों के असर को कोरोना महामारी के समय भी देखा गया। जब बाहर मजदूरी करने वाले लोग लौटे, तो ग्रामीणों ने ही उन लौटे लोगों का 14 दिन क्वारंटाइन व्यवस्था में रखकर संक्रमण से सुरक्षा सुनिश्चित की, स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों को साथ लेकर तैयारी की और एक सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना दिखायी। यह दिखाता है कि महेश का काम केवल विकास तक सीमित नहीं रहा, यह समुदाय सुरक्षा और आपसी सहयोग का मॉडल बन गया है।
इन वर्षों में महेश शर्मा को उनके कार्यों के लिए पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया, भारत सरकार का चौथा उच्च नागरिक सम्मान। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वही है कि आज झाबुआ के गाँवों में पानी, खेती, युवा भागीदारी और आत्मनिर्भरता की एक नई धारा बह रही है। गाँव अब पलायन की मजबूरी नहीं, बल्कि विकास के अवसर बन रहे हैं।
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