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गांव लौटने पर 64 प्रतिशत प्रवासी मजदूरों को किया गया क्वारंटाइन, लेकिन 10 में से 9 का नहीं हुआ कोविड टेस्ट

हजारों किलोमीटर की यात्रा करने के बाद गर्मी और भूख से तड़पते प्रवासी श्रमिक अपने-अपने गांव पहुंचे जिनमें से ज्यादातर को क्वारंटाइन कर दिया गया। इन केंद्रों में शौचालय, बिजली और भोजन तक की सुविधा नहीं थी।

Shivani GuptaShivani Gupta   30 Aug 2020 9:29 AM GMT

गांव लौटने पर 64 प्रतिशत प्रवासी मजदूरों को किया गया क्वारंटाइन, लेकिन 10 में से 9 का नहीं हुआ कोविड टेस्टउत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के एक क्वारंटाइन सेंटर में प्रवासी मजदूर

कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन की वजह से जॉन पॉलस हांसदा लेह-लद्दाख में दो महीने से भी ज्यादा दिनों तक फंसे रहे। जॉन वहां पर सड़क निर्माण का काम करते थे। जॉन की उम्र 25 वर्ष है और वह झारखंड के दुमका जिले के मोहालीगडापत्थर गांव के रहने वाले हैं।

उन्हें और अन्य श्रमिकों को झारखंड सरकार द्वारा 29 मई को एयरलिफ्ट किया गया। यह पहली बार था जब हांसदा और उनके साथी मजदूर विमान में सवार हुए थे। सभी घर जाने को लेकर काफी उत्साहित थे। रांची पहुंचते ही सभी दुमका के लिए रवाना हुए।

यहां से हांसदा के लिए एक और संघर्ष की शुरुआत हुई। वह जैसे ही अपने गांव पहुंचे उन्हें एक स्थानीय सरकारी स्कूल में भेज दिया गया, जिसे शहर से गांव लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों के लिए क्वारंटाइन सेंटर में तब्दील कर दिया गया था। प्रवासी मजदूरों को घर जाने और परिवार से मिलने से पहले यहां दो सप्ताह तक रुकना था।

झारखंड में अपने खेत में जॉन हांसदा. फोटो

हांसदा ने गांव कनेक्शन को बताया,"हम एक ऐसे स्कूल में रुके जहां ना कोई पंखा था ना बिजली। हम छत पर सोते थे और हमारे परिवार ने हमें बिस्तर उपलब्ध कराए। जिस दिन हम आए उस दिन हमें पहले से दूसरों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे गंदे शौचालयों को भी साफ करना पड़ा।"

उन्होंने आगे कहा, "क्वारंटाइन सेंटर में सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं था। यहां तक कि हमें एक दिन में दो वक्त का भोजन भी नहीं मिलता था। मेरा परिवार मेरे लिए खाना लाता था।"

ग्रामीण भारत और प्रवासी मजदूरों पर कोरोना महामारी के प्रभाव को समझने के लिए गांव कनेक्शन ने एक राष्ट्रीय ग्रामीण सर्वे किया। यह देश में किया गया अपनी तरह का पहला सर्वे था। इसके तहत 23 राज्यों के कुल 25,371 से अधिक ग्रामीण निवासियों का साक्षात्कार किया गया। सर्वे में हांसदा जैसे प्रवासी कामगारों के लिए एक पूरक प्रश्नावली भी थी जिससे यह समझा जा सके कि उनके जैसे तमाम लोगों ने लॉकडाउन और महामारी का कैसे मुकाबला किया।

सर्वे के परिणाम के अनुसार लगभग एक-चौथाई (23 प्रतिशत) प्रवासी कामगार तालाबंदी के दौरान पैदल चलकर घर लौटे जबकि 18 प्रतिशत बस से और 12 प्रतिशत ट्रेन से यात्रा कर घर लौटे। घर लौटने के दौरान 12 प्रतिशत को पुलिस द्वारा पीटा गया। वहीं अन्य 14 प्रतिशत ने बताया कि कुछ लोगों द्वारा उनके साथ बुरा व्यवहार किया गया और 67 प्रतिशत को अपने घर वापस आने के लिए कोई मदद नहीं मिली। इस दौरान बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर आर्थिक रूप से बुरी तरह टूट चुके थे और 40 प्रतिशत से अधिक को घर वापस आते समय भूख का सामना करना पड़ा।


प्रवासी श्रमिकों की पीड़ा उनके गांवों तक पहुंचने से ही समाप्त नहीं हुई। कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के लिए सरकार ने वापसी करने वाले प्रवासियों को 14 दिनों के लिए क्वारंटाइन सेंटर में जाने की सलाह दी। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार क्वारंटाइन सेटरों में अच्छी तरह से वेंटिलेशन, बिजली, सीलिंग फैन, पीने योग्य पानी, भोजन, नाश्ता और मनोरंजन की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।

हालांकि इनमें से अधिकांश सुविधायें ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित क्वारंटाइन सेंटरों में नहीं दिखी।

हाल ही में गांव कनेक्शन द्वारा किए गए सर्वे में पाया गया कि 64 प्रतिशत प्रवासी श्रमिकों को अपने राज्य लौटने पर क्वारंटाइन किया गया। इनमें से आधे अपने ही घरों में क्वारंटाइन थे जबकि अन्य को स्कूलों और क्वारंटाइन सेंटर में तब्दील किए गए संस्थानों में रखा गया।

गांव कनेक्शन ने प्रवासी मजदूरो से बात की जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे अप्रैल-जून की भीषण गर्मी में बिना पंखे के सोना पड़ा। मजदूरों को शौच के लिए खुले या गंदे शौचालय में जाना पड़ता था। वहां पर हाथ धोने के लिए साबुन, सोने के लिए बिस्तर या मच्छरदानी की भी सुविधा नहीं थी। इनमें से कुछ क्वारंटाइन सेंटरों में दो वक्त का भोजन मिलना भी मुश्किल था।

झारखंड के क्वारंटाइन सेंटर में श्रमिक मजदूर

दिलीप महतो झारखंड के बोकारो जिले के कोठी गांव के रहने वाले हैं। वह मुंबई में ड्राइवर का काम किया करते थे। लॉकडाउन के दौरान अपने राज्य में लौटने पर क्वारंटाइन सेंटर में रहने का उनका अनुभव काफी खराब रहा।

महतो ने गांव कनेक्शन को बताया," जिस आंगनवाड़ी (ग्रामीण बाल-देखभाल केंद्र) केंद्र में मुझे 10 दिनों के लिए रखा गया था वहां शौचालय तक नहीं था। हम खुले में शौच करने और पास की नदी में स्नान करते थे। केवल पुरुष ही नहीं बल्कि स्कूल की कई महिलाओं को भी खुले में शौच करने जाना पड़ता था। "

महतो कहते हैं, "मैं अपने आपको भाग्यशाली मानता हूं क्योंकि मेरी पत्नी मेरे लिए पीने का पानी और गर्म खाना लाया करती थी। अगर हमारे घरों में राशन नहीं होता, तो इन केंद्रों में हम भूखे ही रह जाते।"


इनमें से कई प्रवासी मजदूरों को क्वारंटाइन रखने के लिए उचित आश्रय तक नहीं मिला। लगभग 29 प्रतिशत मजदूरों को मौसम के भरोसे गांव के बाहर रखा गया था।

अब उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के मांगलूपुर गांव निवासी बबलू चौरसिया का ही मामला ले लिजिए। बबलू पंजाब में काम करते थे। उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया, "मैं जब पंजाब से अपने गांव लौटा तो मुझे 20 दिनों के लिए एक खुले मैदान में रहने के लिए कहा गया। मेरे वहां होने पर कोई मुझे देखने तक नहीं आया।"

दिलचस्प बात यह है कि गांव कनेक्शन ने अपने सर्वे में पाया कि आधे से ज्यादा प्रवासी मजदूर यानी लगभग 51 प्रतिशत को घर में ही क्वारंटाइन होना पड़ा।


राजस्थान के पाली जिले के जैतारण गांव के रहने वाले महेंद्र देवासी बताते हैं, "जब मैं पंजाब के लुधियाना से वापस आया तो गांव के प्रधान ने मुझे घर से बाहर रहने का सुझाव दिया।"

वहीं पाली जिले के एक अन्य निवासी, प्रदीप खुजा ने कहा, "हमें बताया गया कि स्कूलों में क्वारंटाइन सेंटर बनाए जाएंगे मगर ऐसा नहीं हुआ इसलिए प्रवासी कामगारों को घर में ही क्वारंटाइन रहने का सुझाव दिया गया।"

सर्वेक्षण के आंकड़े दर्शाते हैं कि राजस्थान में 34 प्रतिशत प्रवासी श्रमिक घर पर ही क्वारंटाइन थे।


होम क्वारंटाइन की अपनी ही चुनौतियां थीं। अधिकांश ग्रामीणों के घरों में एक या दो से अधिक कमरे नहीं होते हैं। पश्चिम बंगाल के बर्धमान के निवासी श्यामल प्रमाणिक कहते हैं, "मेरे गांव लौटने पर मेरा कोरोना टेस्ट हुआ जो निगेटिव आया इसलिए एक क्वारंटाइन सेंटर में तीन दिन बिताने के बाद गांव के अधिकारियों ने मुझे घर भेज दिया और होम क्वारंटाइन का पालन करने के लिए कहा। लेकिन मेरे घर में कोई अलग कमरा नहीं है इसलिए मुझे अपने परिवार के साथ रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।"

सर्वेक्षण के हिस्से के रूप में प्रवासी श्रमिकों से पूछा गया कि वह कितने दिन घर पर या क्वारंटाइन सेंटर में रहे? परिणाम में पाया गया कि छह प्रतिशत को कुछ दिनों के लिए क्वारंटाइन में रखा गया जबकि 14 प्रतिशत को एक सप्ताह के लिए, 44 प्रतिशत को दो सप्ताह के लिए और लगभग 28 प्रतिशत को दो सप्ताह से अधिक के लिए क्वारंटाइन रहना पड़ा।


घर लौटने पर इन प्रवासी श्रमिकों को भोजन की कमी का भी सामना करना पड़ा। वहीं कुछ ने शिकायत की कि उनकी कोरोना जांच भी नहीं की गई। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के धिकपुर निवासी लखन लाल ने गांव कनेक्शन को बताया, "मुझे घर लौटने के बाद हमारी ग्राम पंचायत से कोई सुविधा नहीं मिली। मुझे न तो राशन मिला है और ना ही किसी और तरीके की कोई सुविधा दी गई। उन्होंने आगे कहा,"मैं हिमाचल प्रदेश में काम करता था। जब मैं गांव लौटा तो मेरा कोई चेक-अप भी नहीं किया गया।"

गांव कनेक्शन के सर्वे में भी यह बात सामने आई जिसमें 88 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने दावा किया कि गांव लौटने पर उनका कोरोना टेस्ट नहीं किया गया। इनमें से अधिकांश लोगों ने कहा कि उनकी केवल थर्मल स्क्रीनिंग की गई थी।

इन प्रवासी मजदूरों को घर आने के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद 28 प्रतिशत प्रवासी श्रमिकों का कहना है कि वह काम करने के लिए शहरों में वापस जाना चाहते हैं। वहीं 26 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वह अपने गांव के घरों में ही रहना चाहते हैं। इनमें से 37 प्रतिशत लोग जिन्होंने घर रहने का निर्णय लिया हैं खेती करना चाहते हैं। जबकि 24 प्रतिशत लोग मजदूरी करना चाहते हैं।

एक तरफ जहां झारखंड के बोकारो के रहने वाले महतो अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए मुंबई वापस चले गए। वहीं दुमका के रहने वाले हांसदा ने घर पर रहकर खेती करने का निर्णय लिया।

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