डायन-बिसाही के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली छुटनी महतो होंगी पद्मश्री से सम्मानित

छुटनी महतो खुद भी डायन-बिसाही का शिकार हो चुकी हैं। वो तो बच गईं लेकिन उसके बाद उन्होंने दूसरी महिलाओं को इससे बचाने की ठान ली। उन्होंने अब तक डायन-बिसाही के शिकार 125 से अधिक महिलाओं को बचाया है। NCRB के आंकड़ों के अनुसार साल 2016 और साल 2019 के बीच झारखंड में अंधविश्वास से संबंधित डायन-बिसाही के मामलों में 79 लोगों की मौत हुई है।

डायन-बिसाही के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली छुटनी महतो होंगी पद्मश्री से सम्मानितफोटो- अश्विनी शुक्ला

- अश्विनी शुक्ला, उज्जवल पी.

अपने घर के दरवाज़े पर उनका इंटरव्यू लेने आए एक पत्रकार को देखकर छुटनी महतो हैरान रह गईं। उनके एक रिश्तेदार, उन्हें समझा रहे हैं कि उन्हें डायन-बिसाही के खिलाफ संघर्ष के लिए देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्मश्री दिया जा रहा है।

62 साल की महतो खुद एक बार डायन-बिसाही का शिकार हुई थीं। उन्हें उनके ससुराल वालों और ग्रामीणों ने डायन घोषित कर दिया था। उन्हें उनके पड़ोस में रहने वाली एक लड़की के बीमार पड़ने का जिम्मेदार ठहराया गया और उन पर उस लड़की पर 'बुरी नज़र' डालने का आरोप भी लगाया गया था।

इन ज्यादतियों से परेशान होकर 1995 में महतो अपने पति के घर से भाग गई, जो झारखंड की राजधानी रांची से 118 किलोमीटर दूर सरायकेला खरसावां जिले के मड़कमडीह गाँव में थी।

महतो ने अपने जीवन के उन दर्दनाक दिनों को याद करते हुए बताया, "गाँव की पंचायत ने भी मुझे 'डायन' घोषित कर दिया था।" छुटनी महतो को मारा-पीटा गया, प्रताड़ित किया गया और यहां तक कि उसके शरीर से कथित बुरी आत्माओं को भगाने के लिए ओझा को बुलाया गया।

हद तो तब हो गई जब ओझाओं और अन्य ग्रामीणों का एक समूह उन्हें ठीक करने की बात कहकर उन्हें इंसानी मल खाने के लिए मजबूर करने लगा। यही वह दिन था जब महतो अपने चार बच्चों के साथ रात के अंधेरे में अपने पति का घर छोड़कर निकल गई। अपने बच्चों के साथ तीन दिन तक पैदल चलकर वे बीरबांस, सरायकेला खरसावां जिले में स्थित अपने माता-पिता के घर पहुंची।

आज, महतो अपने मायके के पास बीरबांस पंचायत में ही एक पुनर्वास केंद्र चलाती हैं। यहां वह उन महिलाओं की मदद करती हैं जिन्हें डायन-बिसाही के मामले में प्रताड़ित किया जाता है। उन्होंने अब तक डायन-बिसाही की शिकार 125 से अधिक महिलाओं को बचाया है। उन्होंने बताया, "जब भी किसी महिला को डायन-बिसाही मामले में निशाना बनाया जाता है तो हम सबसे पहले मध्यस्थता के माध्यम से इसे सुलझाने की कोशिश करते हैं। लेकिन अगर इससे बात नहीं बनती तो हम पीड़ितों को कानूनी सहायता भी प्रदान करते हैं।"

यह डायन-बिसाही प्रथाओं के खिलाफ उनके संघर्ष की मान्यता और स्वीकार्यता ही है कि आज उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित करने का फ़ैसला किया है।

छुटनी महतो खुद डायन-बिसाही प्रथाओं का शिकार हो चुकी हैं। फोटो- अश्विनी शुक्ला

छुटनी महतो खुशकिस्मत थीं कि वह अपनी जान बचाकर भाग गई। देश में डायन-बिसाही मामलों में सबसे अधिक हत्याएं झारखंड में होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2019 में, डायन-बिसाही मामले में देश भर में कुल 102 लोगों की मौत हुई है, जिनमें से 15 लोग झारखंड से थे।

NCRB के आंकड़ों के अनुसार, साल 2016 से 2019 के बीच झारखंड में अंधविश्वास से संबंधित डायन-बिसाही मामले में कुल 79 लोगों की मौत हुई। इसी अवधि में देश भर में कुल 372 महिलाओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

डायन बिरसी अंधविश्वास के खिलाफ अभियान चलाने वाले गैर-लाभकारी संगठन, एसोसिएशन फ़ोर सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस के संस्थापक, अजय कुमार जायसवाल, ने बताया, "जनजातीय समुदायों में टोना और डायन जैसे अंधविश्वास काफ़ी फैले हुए हैं और यही झारखंड में डायन-बिसाही का एक मुख्य कारण है।"

जायसवाल कहते हैं, "कुछ मामलों में जब कोई संपत्ति का मामला होता है या पारिवारिक विवाद होता है, तो वे जमीन हड़पने के लिए महिला को टोनही या चुड़ैल बता देते हैं। या अगर कोई महिला यौन उत्पीड़न का विरोध करती है, तो अपराधी उसे डायन कहने लगता है।" एक महिला जो समाज के बीच अपनी बात रख सकती है, और बिना डरे अपनी बात कह सकती है, उसे भी इसी तरह डायन या चुड़ैल कह दिया जाता है। छुटनी महतो के साथ भी यही हुआ था।

महतो कहती हैं, "मैं काफ़ी मुखर थी। जो भी मुझे गलत लगता था, उसके बारे में मैं बिना डरे खुलकर बोलती थी। गांव वालों को यह पसंद नहीं था। गांव वालों से मेरी काफी बहस होती थी और फिर उन्होंने एक दिन मुझे डायन घोषित कर दिया।"

कुछ ऐसे कानून हैं जिसमें डायन-बिसाही के मामलों को लेकर इसके खिलाफ उचित प्रावधान किए गए हैं। 'द प्रिवेंशन ऑफ विच (डायन) प्रैक्टिस एक्ट (2001), यह निर्धारित करता है कि जो कोई भी, किसी अन्य व्यक्ति को 'चुड़ैल' साबित करने की कोशिश करता है, उसे 1,000 रुपए का जुर्माना और/या तीन महीने तक के कारावास की सजा दी जाएगी। इस अधिनियम में यह भी कहा गया है कि ऐसा कोई भी, जो किसी अन्य व्यक्ति को डायन (डायन) कहता है और वह "किसी भी तरह की शारीरिक या मानसिक यातना" का कारण बनता है, तो उसे 2,000 रुपये का जुर्माना और/या छह महीने तक के कारावास की सजा दी जा सकती है। ऐसे ओझा जो किसी के चुड़ैल होने का दावा करते हैं, उनके लिए भी एक साल के कारावास और/या 2,000 रुपए के जुर्माने की सजा का प्रावधान है। हालांकि महतो कहती हैं, "कुल पाँच ओझा थे जो मुझे ठीक करने आए थे। उनमें से किसी को भी दंडित नहीं किया गया, यहां तक कि पुलिस ने भी मेरी मदद नहीं की।"

कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन कानूनों की वजह से किसी भी तरह से महिलाओं के साथ हिंसा की घटनाओं पर अंकुश नहीं लगा है। जायसवाल कहते हैं, "जिस तरह से इन महिलाओं को मारा जाता है और उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है वह बहुत क्रूर है। कानून में इसकी सजा काफी कम है। इसके लिए कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए।"

छुटनी कहती हैं कि इस अमानवीय और क्रूर अंधविश्वास को मिटाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। "यह एक लड़ाई है और मैं इसके (डायन-बिसाही) खिलाफ अपने अंतिम सांस तक लड़ूंगी। अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है। मुझे डायन-बिसाही को रोकने के लिए पंचायत और सरकार से मदद की ज़रूरत है," छुटनी महतो ने कहा।

अनुवाद- शुभम ठाकुर

इस स्टोरी को मूल रूप से अंग्रेजी में यहां पढ़ें- Exorcising Evil: Chutni Mahato from Birbans in Jharkhand awarded the Padma Shri for her fight against witch-hunting

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