महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए जरूरी हैं पुलिस सुधार

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को रोकने के लिए पुराने कानूनों के नवीनीकरण, आवंटित फंड का पूरा उपयोग, स्टाफ की कमी व अपर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर को दूर करना और पुलिस फोर्स में बड़े सुधार की जरूरत है।

Shivani GuptaShivani Gupta   11 Nov 2020 2:37 PM GMT

महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए जरूरी हैं पुलिस सुधार

21 साल की निकिता तोमर हरियाणा के बल्लभगढ़ में एक कॉलेज की छात्रा हैं, जो भारत में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों की शिकार हैं। 21 अक्टूबर को वह बी. कॉम की परीक्षा देने गई थी। तभी कुछ बदमाशों ने उनके अपहरण का प्रयास किया। जब निकिता ने इसका विरोध किया तो फरीदाबाद के एक कॉलेज के बाहर उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमला करने वाले दोनों आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उनके परिवार का कहना है कि आरोपी निकिता का पीछा करते थे। बदमाशों ने दो साल पहले उनका अपहरण भी कर लिया था तब इसकी पुलिस में शिकायत दर्ज की गई थी।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहा है। इसकी नवीनतम रिपोर्ट 'क्राइम इन इंडिया 2019' के अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले साल 2017 में 3,45,989 थे जो साल 2019 में बढ़कर 3,91,601 हो गए।

ज्यादातर मामले ऐसे हैं जहां पीड़ितों ने किसी बड़ी घटना से पहले ही पुलिस से संपर्क किया था और छेड़छाड़ या पीछा करने की शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन अक्सर इन शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है और फिर यही आगे चलकर किसी बड़े अपराध का रूप ले लेता है।

बलात्कार के मामलों में पीड़ितों की स्थिति और खराब है। जब वे पहली सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने के लिए पुलिस से संपर्क करते हैं तो उन्हें उपहास और अपमान का सामना करना पड़ता है। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के पित्तोरा के रहने वाले दलित आदिवासी मंच के राजिम केतवास गाँव कनेक्शन से कहते हैं, "बलात्कार पीड़िता से बार-बार असंवेदनशील और अनुचित प्रश्न पूछे जाते हैं, और इस तरह उन्हें और परेशानी में डाल दिया जाता है।"

बेंगलुरु, कर्नाटक में स्थित सार्वजनिक स्वास्थ्य चिकित्सक सिल्विया कर्पगम गाँव कनेक्शन से कहती हैं, "कई बार ऐसा होता है कि पुलिस बलात्कार के लिए पीड़िता को ही गलत ठहराती है। उन्हें तुच्छ व अनैतिक समझा जाता है। इस दौरान भद्दी भाषा का प्रयोग भी किया जाता है।" '

वॉयस अगेंस्ट कास्ट इम्प्यूनिटी' नाम के निबंध के एक संग्रह में दलित महिलाओं से संबंधित कथाओं का ज़िक्र करते हुए कर्पगम कहती हैं कि कथित प्रमुख जातियों के प्रभाव को देखते हुए उन्हें ऐसा लगता है कि वे बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में भी जाँच के बावजूद बच कर निकल जाते हैं। NCRB 2019 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 2019 में हर दिन औसतन बलात्कार के 88 मामले सामने आए हैं। साल में बलात्कार के कुल 32,033 मामलों में से 11 प्रतिशत दलित समुदाय से संबंधित थे। यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सामाजिक बदनामी के डर से ज्यादातर मामले दबा दिए जाते हैं और पुलिस तक नहीं पहुंच पाती।

अपराधियों को सजा न मिलने के सामान्य कारणों में से एक कमजोर पुलिस जांच का होना है। हाल ही में, हाथरस मामले में पुलिस के व्यवहार को लेकर राष्ट्रीय आक्रोश था, जहां बलात्कार पीड़िता के शव को परिवार की सहमति के बिना ही कथित तौर पर जल्दबाजी में अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस पूरे प्रकरण में पुलिस का रवैया काफी असंवेदनशील था।


उत्तर प्रदेश के सेवानिवृत्त पुलिस महानिरीक्षक आर के चतुर्वेदी गाँव कनेक्शन से कहते हैं, "पुलिस के व्यवहार से उनमें प्रशिक्षण की कमी झलकती है। इसके पहले दरोगा व सिपाही दोनों के लिए संस्थान में एक साल के प्रशिक्षण व क्षेत्र में छह महीने के प्रशिक्षण का आदेश था। अब उन्हें केवल छह महीने का ही प्रशिक्षण दिया जाता है।" NCRB 2019 के आंकड़ों से पता चलता है कि बलात्कार के मामलों के लिए सजा की दर 27.8 फीसदी है। दूसरे शब्दों में प्रत्येक 100 आरोपियों में से केवल 28 ही दोषी पाए जाते हैं। पुलिस द्वारा बलात्कार के मामलों में महत्वपूर्ण फोरेंसिक सबूतों का संग्रह, परिवहन और भंडारण अक्सर खराब तरीके से संचालित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप कुछ अपराधी भी बचकर निकल जाते हैं।

उदाहरण के लिए मई महीने में, उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के संडीला गांव की रहने वाली सुगना वाल्मीकि (बदला हुआ नाम) जब स्कूल से लौट रही थीं, तभी उसके गांव के चार पुरुषों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। वाल्मीकि पुलिस स्टेशन के अपने अनुभव के बारे में बताती हैं, "मैं शाम 7 बजे पुलिस के पास गई। उन्होंने मुझे उस हालत में रात 11 बजे तक बैठाए रखा, फिर भी किसी ने एफआईआर नहीं लिखी। उन्होंने मुझ पर झूठ बोलने का आरोप लगाया। इसके बाद अगले दिन प्राथमिकी दर्ज की गई।

सुगना वाल्मिकी (फोटो- नीतू सिंह, गांव कनेक्शन)

उन्नाव बलात्कार मामले में भी 23 वर्षीय पीड़िता को प्राथमिकी दर्ज करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। वह दिसंबर 2018 में कथित रूप से सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई थी। उसके अगले दिन पुलिस द्वारा एक शिकायत दर्ज की गई, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं की गई। अदालत के निर्देश पर आखिरकार तीन महीने बाद मार्च 2019 में एफआईआर दर्ज की गई।

बलात्कार के मामलों से निपटते वक्त पुलिस के व्यवहार से उनकी असंवेदनशीलता का पता चलता है। केतवास बताते हैं, "पिछले साल, भैरोपुर गांव में सड़क के किनारे एक 17 वर्षीय लड़की मिली। वह चल नहीं पा रही थीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें महिला पुलिस के साथ अपराध स्थल तक जाने के लिए मजबूर किया गया।" पूछताछ के निर्मम तरीके के बारे में बात करते हुए केतवास कहते हैं, "इस दौरान पीड़िता से काफी अजीब सवाल किए गए, जैसे - 'तुम कहाँ थे?', 'तुम्हारे साथ ऐसा किसने किया?', 'उन्होंने यह कैसे किया'...। और पूछताछ के अंत में सभी ने यह कहा कि पीड़िता ने यह सब पैसे के लिए किया होगा।"

हालाँकि, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक पुलिस कांस्टेबल ने गाँव कनेक्शन को नाम ना छापने की शर्त पर बताया, "हम सामान्य प्रश्न पूछते हैं जैसे – 'आप वहाँ क्यों गए?', 'यह कैसे हुआ?', 'आप कहाँ गए थे?' कई बार यह आवश्यक होता है कि हम पीड़िता से कुछ चीजें बार-बार पूछें ताकि हम उनके बयान को दर्ज करने में कोई गलती न करें।"

35 वर्षों से अधिक समय तक पुलिस बल में काम करने वाले चतुर्वेदी के अनुसार अगर महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर अंकुश लगाना है तो पुलिस सुधारों की तत्काल आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश पुलिस के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा, "यूपी पुलिस में 6,000 - 8,000 से अधिक भर्तियों को प्रशिक्षित करने की क्षमता नहीं है, इसके बावजूद वे 30,000 लोगों को फोर्स में ले रहे हैं।"

रिपोर्ट्स बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले को निपटने में पुलिस बुरी तरह असफल रही है। फोटो- गांव कनेक्शन

पुलिस सुधार की जरूरत

भारतीय पुलिस व्यवस्था अपनी सदियों पुरानी भर्ती प्रक्रिया से ग्रस्त है। प्रशिक्षण प्रक्रिया के दौरान, पूरा ध्यान प्रशिक्षुओं की शारीरिक शक्ति बढ़ाने पर होती है, लेकिन अन्य आवश्यक कौशल जैसे फोरेंसिक, कानून, साइबर-अपराध, वित्तीय धोखाधड़ी को नजरअंदाज किया जाता है।

चतुर्वेदी के अनुसार पुलिस से संबंधित कानून भी निराशाजनक रूप से काफी पुराने हैं। वह कहते हैं "हम अभी भी 1861 के पुलिस अधिनियम और 1872 के पुलिस विनियमन का पालन करते हैं। हमने तब से पुलिस के कामकाज के तरीके को नहीं बदला है।"

एक रिपोर्ट के अनुसार पुलिस अधिनियम 1861: कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव द्वारा हमें इसे बदलने की आवश्यकता है क्योंकि यह लोकतांत्रिक पुलिस के संचालन समेत लगभग सभी मापदंडों पर कमजोर है। इसकी वजह से पुलिस संगठन का दुरुपयोग करना आसान हो गया है।

पुलिस बल की जरूरतों को पूरा करने के लिए पुलिस का मौजूदा बुनियादी ढांचा अपर्याप्त है। इसकी एक वजह पुलिस विभाग में एक बड़ी मानव शक्ति की कमी भी है।

गृह मंत्रालय, 2019 के ब्यूरो पुलिस अनुसंधान एवं विकास के अनुसार, वर्तमान में देश में प्रति लाख आबादी पर 198 पुलिस अधिकारी हैं, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनुशंसित 222 पुलिस अधिकारी प्रति लाख जनसंख्या के पैमाने के मुकाबले काफी कम है। इसके परिणामस्वरूप पुलिस कर्मियों के लिए काम बढ़ जाते हैं और उनकी दक्षता में कमी आती है। इसके साथ ही उन पर इसका मनोवैज्ञानिक दबाव भी होता है। यही वजह है कि आए दिन पुलिस बल द्वारा भी किए जाने वाले विभिन्न अपराधों की खबरें सामने आती रहती है।

आबादी के आधार पर भारत में पुलिस बल की भारी कमी है। फोटो- पिक्साबे

एक अन्य समस्या पुलिस बल के लिए अच्छे संचार नेटवर्क का नहीं होना भी है। पुलिस संगठन के प्रभावी कामकाज के लिए एक अच्छा विश्वसनीय संचार प्रणाली महत्वपूर्ण है। ब्यूरो पुलिस अनुसंधान और विकास 2019 के आंकड़ों से पता चलता है कि सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 200 पुलिस स्टेशन ऐसे हैं, जहां वायरलेस/मोबाइल नहीं हैं।

यह डेटा पुलिस बलों के आधुनिकीकरण (MPF) योजना के तहत आवंटित धन के ठीक से उपयोग नहीं होने पर भी प्रकाश डालता है। 2017-18 में सभी राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों में पुलिस को आवंटित कुल बजट 1,27,275.27 करोड़ रुपये था, लेकिन इसमें से केवल 1,18,211.24 करोड़ रुपये का ही व्यय हो सका। इससे पता चलता है कि बजट को पूरी तरह से उपयोग नहीं किया जा सका।

चौबीस साल पहले साल 1996 में दो सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशकों प्रकाश सिंह और एन के सिंह ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की थी। इसके तहत सुधारों के लिए सात निर्देश दिए गए थे।

इन सात निर्देशों में राज्य सुरक्षा आयोग की स्थापना शामिल है, जिसके तहत यह सुनिश्चित होता है कि राज्य सरकार पुलिस को अनुचित तरीके से प्रभावित ना करे। इसके अलावा DGP का कार्यकाल और चयन, पुलिस महानिरीक्षक का न्यूनतम कार्यकाल, जांच और कानून व्यवस्था को अलग करना, पुलिस स्थापना बोर्ड स्थापित करना, पुलिस शिकायत प्राधिकरण बनाना और राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग का गठन करना भी शामिल है।

साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को इन निर्देशों का पालन करने के लिए कहा था। साल 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशों का पालन नहीं करने के लिए चार राज्यों- महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल को नोटिस जारी किया।

राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल 2020 (CHRI) की रिपोर्ट के अनुसार, एक भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश ऐसा नहीं है जो शीर्ष अदालत के निर्देशों का पूरी तरह से पालन कर रहा हो। यानी अधिकांश राज्य ऐसे हैं जो इनमें से ज्यादातर निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं।

चतुर्वेदी कहते हैं, "ये सुधार बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पुलिस की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करते हैं, बोर्ड को स्थानांतरण और पोस्टिंग तय करने का अधिकार देते हैं, और इसके साथ ही ये उचित प्रशिक्षण मॉड्यूल परिवर्तन को भी सुनिश्चित करते हैं।" चतुर्वेदी आगे कहते हैं, "अगर हम वास्तविक बदलाव चाहते हैं तो हमें सुधारों के साथ-साथ मानसिकता को भी बदलना होगा। यह एक लंबी प्रक्रिया है।"

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो- CDO, कानपुर

पुलिसकर्मियों की स्थिति

परंपरागत रूप से पुलिस को पुरुषों की नौकरी माना जाता है, और पुरुष व महिलाएं दोनों ही इस क्षेत्र में महिलाओं की क्षमता को लेकर पितृसत्तात्मक विचार रखते हैं। स्टेटस ऑफ़ पोलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट, 2019 के मुताबिक भारत के पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी केवल 7.28 प्रतिशत है। इन महिलाओं में से 90 फीसदी कांस्टेबल हैं, जबकि एक फीसदी से कम ही पर्यवेक्षी जैसे उच्च पदों पर हैं।

द स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2019 के मुताबिक प्रत्येक पांच में से एक महिला पुलिसकर्मी का कहना है कि उनके स्टेशन पर महिलाओं के लिए अलग शौचालय नहीं है। ज्यादातर महिला पुलिसकर्मी रजिस्टरों को मेंटेन करने, एफआईआर दर्ज करने और अन्य छोटे काम करते हैं, जबकि उनके समकक्ष के पुरुष पुलिसकर्मी इनवेस्टिगेशन करने, गश्त करने व वीआईपी सुरक्षा प्रदान करने जैसा कार्य करते हैं। ज्यादातर गंभीर अपराध ऐसे हैं जिनसे निपटने के दौरान पुलिस ने ठीक से काम नहीं किया और वे बुरी तरह से विफल रहे। यह लापरवाही खासतौर पर महिलाओं से संबंधित अपराधों में देखने को मिलती है।

कर्पगम कहती हैं,"अगर हिंसा और आक्रामकता पितृसत्तात्मक पुलिस के व्यवहार का हिस्सा है, तो इस बात की बहुत कम संभावना हो जाती है कि महिला पुलिस पीड़ितों के साथ बहुत संवेदनशील तरीके से पेश आएगी। महिला पुलिस होने का एकमात्र फायदा यह है कि पीड़िता पर यौन शोषण का खतरा कम हो जाता है।"

अनुवाद- शुभम ठाकुर

इस स्टोरी को मूल रूप से अंग्रेजी में यहां पढ़ें- Gender violence survivors will benefit only if the police force adopts reforms

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