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बिहार में इस साल क्यों काबू में है चमकी बुखार?

इस साल चमकी बुखार का काफी कम प्रकोप देखने को मिल रहा है। बिहार स्वास्थ्य विभाग की तरफ से हासिल किए गए आंकड़ों के मुताबिक, पहली जनवरी से 22 जून तक बिहार में एईएस के कुल 92 मामले सामने आए, जिनमें से 11 बच्चों की मौत हुई। पिछले साल यह संख्या 130 थी।

Umesh Kumar RayUmesh Kumar Ray   24 Jun 2020 5:50 AM GMT

बिहार में इस साल क्यों काबू में है चमकी बुखार?साल 2019 में चमकी बुखार से पीड़ित एक बच्ची और देख-रेख करती उसकी मां (फाइल फोटो)

पिछले साल ठीक इसी वक्त बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (एसकेएमसीएच) एक ऐसे अस्पताल के तौर पर जाना जा रहा था, जहां रोजाना बच्चों की जानें जा रही थीं। बेजान बच्चे अस्पताल के आईसीयू में आते और कुछ देर बाद उनके परिजन रोते-बिलखते उनकी लाश लेकर निकलते थे।

पिछले साल के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 3 जून से 28 जून के बीच अकेले मुजफ्फरपुर जिले में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) या चमकी बुखार की शिकायत लेकर 426 बच्चे अस्पताल में भर्ती हुए थे, जिनमें से 90 बच्चों की मौत हो गई थी। पूर्वी चम्पारण में चमकी बुखार से मरने वाले बच्चो की संख्या 20 और सीतामढ़ी में 10 थी। इस अवधि में पूरे बिहार में 598 बच्चे चमकी बुखार से बीमार पड़े थे, जिनमें से 130 बच्चों की जान गई थी।

लेकिन, इस साल चमकी बुखार का काफी कम प्रकोप देखने को मिल रहा है। बिहार स्वास्थ्य विभाग की तरफ से हासिल किए गए आंकड़ों के मुताबिक, पहली जनवरी से 22 जून तक बिहार में एईएस के कुल 92 मामले सामने आए, जिनमें से 11 बच्चों की मौत हुई।

बिहार के 12 जिलों खासकर मुजफ्फरपुर, पूर्वी और पश्चिमी चम्पारण, वैशाली और सीतामढ़ी में एईएस का प्रकोप ज्यादा होता है। ये कब से शुरू हुआ कोई नहीं जानता। अलबत्ता वर्ष 1995 में इस बीमारी से बहुत सारे बच्चों की मौत के बाद शोधकर्ताओं और सरकार की नजर इस ओर गई। तब से अब तक कई शोध हुए और इन शोधों में बताया गया कि कुपोषण और ज्यादा गर्मी के चलते ये बीमारी बच्चों को जकड़ लेती है।

कुछ शोधों में यह भी बताया गया कि कच्ची या सड़ी हुई लीची का खाली पेट सेवन इस रोग को बढ़ा देता है क्योंकि लीची में एक रसायन होता है, जो ग्लूकोज का लेवल कम कर देता है। एईएस के अंतर्गत एक दर्जन से ज्यादा बीमारियां आती है, जिनमें एक हाइपोग्लाइसेमिया है। चमकी बुखार से मरने वाले बच्चों में से 90 प्रतिशत में हाइपोग्लाइसेमिया के लक्षण मिलते हैं।


तुलनात्मक तौर पर देखें, तो इस साल चमकी बुखार के मामले पिछले साल के मुकाबले 85 फीसदी कम हैं। वहीं, इस बीमारी से बच्चों की मृत्यु का आंकड़ा देखें, इसमें पिछले साल के मुकाबले लगभग 91.5 प्रतिशत की कमी आई है।

आंकड़ों का विश्लेषण ये भी बताता है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल मृत्युदर भी बेहद कम है। पिछले साल चमकी बुखार की चपेट में आए कुल मरीजों में से 21.73 प्रतिशत (130 मरीज) की मौत हो गई थी, लेकिन इस साल इस बीमारी की चपेट में आए मरीजों में से 11.95 प्रतिशत (11 मरीज) की ही मौत हुई।

इस बार चमकी बुखार के मामले कम होने की वजहों की पड़ताल करें, तो पता चलता है कि सरकार की तरफ से इस बार समय रहते एहतियाती कदम तो उठाए ही गए, लेकिन इसके अलावा और भी वजहें हैं, जिन्होंने चमकी बुखार को काबू में रखा।


जागरूकता अभियान

मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी ब्लॉक के रूप पटाही गांव निवासी प्रशांत पासवान की 4 साल की बेटी अनुष्का कुमारी को पिछले साल 11 जून को चमकी बुखार हो गया था। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था और 14 जून ठीक होकर वह घर चली गई थी।

प्रशांत पासवान ने गांव कनेक्शन को बताया, "मार्च में आशा (एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) हमारे गांव में आई थी और बच्चों को नमक, चीनी और पानी का घोल देने को कहा था। उन्होंने ये सलाह भी दी थी कि रात को बच्चों को खाली पेट नहीं सोने देना है।"

"इसके बाद से मैं लगातार अपने बच्चो को नमक-पानी-चीनी का घोल दे रहा हूं और रात को खाना खिलाकर ही सोने देता हूं। मेरे चार बच्चे हैं। सभी की उम्र 7 साल से नीचे ही है। पिछले साल के चमकी बुखार के बाद से हमलोग ज्यादा सतर्क भी है", प्रशांत ने कहा।

प्रशांत गांव में ही रहते हैं और दीवारों को रंगने का काम करते है। लॉकडाउन के कारण उनका काम ठप है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि कभी ऐसा दिन न गुजरे कि बिना खाए रहना पड़े। वह कहते हैं, "सरकार की तरफ से सिर्फ एक बार फ्री राशन मिला था, जो बहुत पहले खत्म हो गया। मेरी पत्नी को हेपेटाइटिस-बी की बीमारी है। उसके इलाज के लिए 30 हजार रुपए कर्ज लिया था। उसी कर्ज में से अभी खा रहे हैं। खाने-पीने पर 18 हजार रुपए खर्च हो गए हैं।"


मुजफ्फरपुर जिले के ही कांटी ब्लॉक के मुस्तफापुर की रहने वाली सोहागवती देवी ने भी गांव कनेक्शन को बताया कि उनके गांव में आशा वर्कर चमकी बुखार के बारे में बताने आई थीं। उन्होंने कहा, "मार्च-अप्रैल में आशा वर्कर आई थीं और उन्होंने नमक, चीनी और पानी का घोल बच्चों को पिलाने की सलाह दी थी।"

सलाना एईएस से बच्चों की मौत के मद्देनजर वर्ष 2015 में यूनिसेफ के साथ मिलकर बिहार के स्वास्थ्य विभाग ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स (एसओपी) तैयार किया था। इसमें जागरूकता अभियान चलाने से लेकर लोगों में ओआरएस वितरित करना, एईएस के लक्षणों की पहचान आदि शामिल हैं।

मुजफ्फरपुर में काम करने वाली आशा वर्कर अनीता देवी ने गांव कनेक्शन को बताया, "इस साल मार्च में ही स्वास्थ्य विभाग से हमें आदेश दे दिया गया था कि चमकी बुखार को लेकर जागरूकता फैलाना है। पहले जब भी जागरूकता अभियान चलता था, तो प्रतिवेदन तैयार नहीं किया जाता था, लेकिन इस बार जागरूकता अभियान के बाद प्रतिवेदन तैयार करना अनिवार्य कर दिया गया था। इसमें जागरूकता अभियान चलाने के बाद रिपोर्ट देनी थी, जिसमें उन परिवारों के मुखिया के हस्ताक्षर कराना होता था, जिनके घर हम लोग गए थे।"

एक आशा वर्कर ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, "हम लोगों को तो स्वास्थ्य विभाग से ये धमकी भी मिली थी कि अगर हमने जागरूकता अभियान सही से नहीं चलाया और इस बार एईएस से ज्यादा बच्चों की मौत हुई, तो हम पर कार्रवाई होगी।"

बिहार के स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. एमपी शर्मा ने गांव कनेक्शन से कहा, "इस बार हमने जागरूकता अभियान बहुत जल्दी शुरू कर दिया था और इसकी बकायदा मॉनीटरिंग की जा रही थी। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग ने 445 एमबीबीएस डॉक्टरों, 749 आयुष चिकित्सकों और 604 स्वास्थ्य कर्मचारियों को एईएस को लेकर प्रशिक्षित किया।"

"हमने एईएस के प्रभाव वाले 12 जिलों का चयन किया है। इन जिलों के हेल्थ सेंटरों का दो बार गैप असेसमेंट कर चुके हैं", उन्होंने कहा।


लॉकडाउन का असर

कोविड-19 दुनिया के तमाम देशों के लिए खौफ का कारण बना हुआ है। भारत में भी दिनों दिन कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की तादाद दिनों दिन बढ़ रही है। 23 जून तक भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या 178014 थी। वहीं बिहार में कोरोना पॉजिटिव मरीज 7974 हैं।

कोरोना वायरस के संक्रमण की रफ्तार पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने 24 मार्च से देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की थी, जो दो महीने से भी ज्यादा वक्त चला। बिहार में भी लॉकडाउन लगा रहा।

इस लॉकडाउन के चलते लोगों को घरों मे कैद हो जाना पड़ा। इससे लोगों का रोजगार पूरी तरह ठप हो गया, लेकिन लॉकडाउन के कारण यह भी हुआ कि सामान्य दिनों की तरह न तो लोग घरों से निकल पाए और न उनके बच्चे। इसका फायदा ये हुआ कि बच्चे गर्मी के प्रकोप से बचे रहे।

मुजफ्फरपुर के मुसहरी ब्लॉक के अली नेउरा गांव के रहने वाले अरुण राम की दो बेटियां थीं। इनमे से एक की मौत पिछले साल चमकी बुखार से हो गई थी। उन्होंने गांव कनेक्शन से कहा, "आशा वर्करों के मशविरे पर अमल करने के अलावा इस बार लॉकडाउन के कारण हम लोग खुद भी घर से नहीं मिकलते थे और न ही अपनी बेटी को ही निकलने देते थे। अभी भी मैं बेटी के घर से निकलने नहीं देता हूं।"

जिले के कांटी ब्लॉक के पंडित पकड़ी गांव बालेश्वर राम की दो पोतियां हैं। उन्होंने कहा, "लॉकडाउन के कारण पहले की तरह बच्चों को बाहर खेलने-धूपने नहीं दिया और घर में भी उन पर नजर रखा कि वे भूखी तो नहीं रह रही हैं।"


मौसम का साथ

जानकारों की मानें, तो एईएस का कुपोषण और भीषण गर्मी से गहरा ताल्लुक है। कुपोषित बच्चों में ग्लूकोज की मात्रा कम रहती है और अगर वे धूप में या गर्म आबोहवा में रहें व खाना न खाएं, तो ग्लूकोज की मात्रा गिरने लगती है और वे हाइपोग्लाइसेमिया के शिकार हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि गर्मी और अत्यधिक नमी के कारण शरीर मे मेटाबोलिक क्रिया तेज हो जाती है और इसमें ग्लूकोज की जरूरत होती है। बच्चे खाली पेट होते हैं, तो उनमें ग्लूकोज लेवल वैसे ही कम रहता है। तिस पर गर्मी के कारण मेटाबोलिक क्रिया बढ़ने से ग्लूकोज का लेवल और कम होने लगता है, जिससे हाइपोग्लाइसेमिया हो जाता है।

एईएस पर कई शोध करने वाले मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ अरुण शाह कहते हैं, "चमकी बुखार का प्रकोप मुख्य रूप से मई और जून के महीने में देखने को मिलता है, क्योंकि इस वक्त मौसम गर्म और आर्द्र रहता है। इस साल मौसम भी अनुकूल रहा और सरकार की तरफ से जागरूकता अभियान भी सही तरीके से और समय से पहले चलाया गया।"

पिछले साल बिहार में मई-जून के महीने में भीषण गर्मी पड़ी थी और दो हफ्ते में ही 142 लोगों की लू लगने से मौत हो गई थी और 1000 से ज्यादा लोग बीमार पड़ गए थे। गर्मी के चलते हालात ऐसे बन गए थे कि बिहार सरकार ने राज्यभर में निषेधाज्ञा जारी कर दी थी। बिहार के इतिहास में संभवतः ऐसा पहली बार हुआ था कि पूरे बिहार में गर्मी के कारण निषेधाज्ञा जारी की गई थी। निषेधाज्ञा में दोपहर के वक्त लोगों को घरों से बाहर निकलने पर पाबंदी थी और खुले क्षेत्र में किसी भी तरह के काम पर रोक लगा दी गई थी।


लेकिन, इस साल ऐसा नहीं हुआ। इस साल तो अप्रैल से ही बारिश शुरू हो गई और मौसम भी अनुकूल रहा। पिछले साल मॉनसून 20 जून के बाद आया था, लेकिन इस बार निर्धारित समय से दो दिन बाद यानी 14 जून को आ गया, जिससे तापमान में और भी गिरावट आई।

दक्षिण बिहार सेंट्रल यूनिवर्सिटी के एनवायरमेंटल साइंसेज विभाग के प्रोफेसर प्रधान पार्थ सारथी ने गांव कनेक्शन से कहा, "बारिश आर्द्रता को खत्म करती है। पिछले साल मई-जून में नहीं के बराबर बारिश हुई थी, जिससे आर्द्रता बढ़ गई थी। लेकिन, इस साल अप्रैल से ही बारिश हो रही थी, जिस कारण तापमान कम रहा।"

उन्होंने कहा, "हमने कुछ सालों के मौसम और एईएस के मामलों का तुलनात्मक अध्ययन किया था। इसमें पाया था कि आर्द्रता और गर्मी बढ़ने से एईएस के मामलों में इजाफा होता है। ऐसे में इस साल एईएस के मामले कम होने के पीछे मौसम एक अहम फैक्टर हो सकता है।"

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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