कड़ाके की ठंड, खुला आसमान और कोहरा, किसी के पास कम्बल तो किसी के पास रजाई, कैसे कट रही हैं किसानों की रातें

खुले आसमान और सरसराती हवा, ओस के बीच हजारों किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए पिछले एक पखवाड़े से दिल्ली के सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर डेरा डाले हुए हैं। उनका कहना है कि उन्हें ठंड के कारण भले ही कई दिक्कतें आ रही हैं लेकिन वे बिना कानून वापस कराये अपने घरों को नहीं लौटने वाले हैं।

shivangi saxenashivangi saxena   12 Dec 2020 11:37 AM GMT

कड़ाके की ठंड, खुला आसमान और कोहरा, किसी के पास कम्बल तो किसी के पास रजाई, कैसे कट रही हैं किसानों की रातें

सिंघु बॉर्डर/ टिकरी बॉर्डर (दिल्ली)। सत्तर साल के जगरुप सिंह हरियाणा के फतेहाबाद जिले, गाँव चांदपुरा के रहने वाले हैं और पिछले एक हफ्ते से कड़ाके की सर्दी में दिल्ली के टिकरी बॉर्डर पर कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन में शामिल हैं। रात में कई बार तापमान 10 डिग्री तक पहुंच जाता है लेकिन देश के कई राज्यों के हजारों किसान खुले आसामान के नीचे जमीन पर, ट्रैक्टर ट्राली में बने तंबू में रातें बिताकर अपनी मांगों के लिए डटे हैं।

जगरूप अपने अन्य साथियों, सेहन सिंह (65 वर्ष ) और छज्जू सिंह (60 वर्ष ) के साथ ज़मीन पर एक पतला सा गद्दा बिछाकर सोते हैं। तकिया नहीं है। वे अपनी पगड़ी का रुमाल सर के नीचे लगाकर सोते हैं। सुबह उठकर सर भारी लगता है लेकिन जगरूप कहते हैं उन्हें ईश्वर से शक्ति मिलती है। नहाने जाने के लिए उन्हें सुबह तीन बजे उठना पड़ता है क्योंकि पांच बजे के बाद टॉयलेट के बाहर भीड़ लगनी चालू हो जाती है। जगरूप सुबह ठंडे पानी से नहाकर गुरूद्वारे में मत्था टेकते हैं और फिर अपने साथियों के लिए चाय बनाते हैं।

मिग सिंह (65 वर्ष ) 27 नवंबर को उदयपुर, अम्बाला, हरियाणा से टिकरी बॉर्डर पहुंचे हैं। सर्दियों में रात कैसे बीतती हैं, इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं, " रात को ओस गिरती है। मच्छर भी बहुत हो जाते हैं। इसके लिए रात को अपने मुँह तक कम्बल ओढ़कर सोते हैं।" सर्दियों में बुजुर्ग लोगों को खासकर सावधानी बरतनी होती है। शहरों में रहने वाले तमाम लोग रजाई और कंबल के साथ कई बार रूम हीटर जलाते हैं, लेकिन खुले आसमान और सरसराती हवा, ओस के बीच हजारों किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए पिछले एक पखवाड़े से दिल्ली के सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर डेरा डाले हैं।

टिकरी बॉर्डर पर ही मिग सिंह के पास बैठे दयाल सिंह (70 वर्ष) मोड़ मंण्डी, पंजाब से आये हैं। वह बताते हैं, "रात को ठण्ड बढ़ जाती है। कभी-कभार रात को लकड़ी जला लेते हैं। सोना मुश्किल होता है। सामान चोरी का भी डर लगा रहता है लेकिन भगवान उनकी निगरानी कर रहा है।"


किसानों के लिए हाईवे पर रात गुज़ारना किसी चुनौती से कम नहीं है। खुले आसमान और कड़कड़ाती ठण्ड में रात गुज़ारना मुश्किल हो गया है लेकिन किसान हर मुसीबत से लड़ने को तैयार हैं। रात को तरह- तरह की व्यवस्थाएं करनी पड़ती हैं। रात को ट्रॉली में गद्दे बिछाकर उसमे जगह के हिसाब से 8 से 15 लोगों के सोने की जगह बनाई जाती है। 27 नवंबर से ये काम दिल्ली के सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर चल रहा है। लेकिन दिल्ली तक पहुंचने से पहले भी हजारों किसान अपनी रातें ऐसे ही बिता चुके हैं।

पंजाब और हरियाणा के ज्यादातर किसान ट्रैक्टर ट्रालियों में आए हैं। ये आंदोलन पहले से निर्धारित था और किसानों को भी पता था उनकी लड़ाई आसान नहीं है इसलिए वो ट्रैक्टर ट्रालियों को लंबे आंदोलन के लिए तैयार करके लाएं हैं। ट्रालियों में राशन, लकड़ी, गद्दे, पानी, दवा, जनरेटर समेत दूसरे रोजमर्रा के इंतजाम करके आए हैं। ट्रालियों के ऊपर तिरपाल और पॉलीथीन भी लगाई हैं। शाम को चार बजे से सिंघु बॉर्डर पर गद्दे, चादरे और कम्बल बंटने शुरू हो जाते हैं, लेकिन किसानों की संख्या के आगे वो कम पड़ जाते हैं।

हर ट्रॉली के आकार के हिसाब से लोग उसमे सोते हैं। इनमे से ज़्यादातर 16 फीट लंबी और साढ़े सात फीट चौड़ी हैं जिनमें 15 से 20 लोग सोते हैं। वहीं छोटी ट्रॉली में 6 -7 लोगों की सोने की जगह होती है। ट्रॉली में पहले पराली बिछाई जाती है। फिर उस पर गद्दे लगाए जाते हैं। कुछ युवा कैंपिंग टेंट लगाकर उनमें सोते हैं। शाम को हर ट्रॉली-ट्रक को प्लास्टिक शीट से ढक दिया जाता है ताकि सोते समय किसानों पर ओस या पानी ना गिरे।


अमरिंदर सिंह (38 वर्ष ) हरियाणा से 20 लोगों के साथ 26 तारीख को सिंघु बॉर्डर पहुंचे थे। उन्होंने बॉर्डर पर एक कोने में अपने सोने- बैठने की व्यवस्था की है। रात को उनके साथ 25 - 30 लोग ज़मीन पर दरी बिछाकर सोते हैं। गाँव कनेक्शन से हुई बातचीत में उन्होंने बताया, "रात को कई तकलीफों का सामना करना पड़ता है। रात को ओस गिरी थी जिसके कारण पानी उनके ऊपर गिरना शुरू हो गया। साथ ही उनके कपड़े भीग गए।"

बुज़ुर्गों के लिए रात बिताना जितना मुश्किल है, उतनी ही कठिन स्थितियां महिलाओं के लिए भी बनी हुई हैं। तापमान दिन-प्रतिदिन गिर रहा है। मिन्दर कौर (60 वर्ष ) और जरनैल कौर (70 वर्ष ) मानसा, पांजाब से आयी हैं। रात को वो दस औरतों के साथ एक ट्रॉली मे सोती हैं। जिनको जगह नहीं मिलती वे रास्ते पर बिस्तर बिछाकर सोने को मजबूर हैं। सुबह तड़के उठ जाती हैं ताकि किसी के उठने से पहले किसी तरह ट्रालियों, तंबू आदि की ओट लेकर नहा सकें।

मिन्दर बताती हैं, "कपड़े पहन कर नहाना पड़ता है। औरतों के नहाने और टॉयलेट की कोई व्यवस्था नहीं है। रात को जल्दी सोकर चार बजे उठना पड़ता है। उसके बाद मर्दों के नहाने का समय हो जाता है। हम कपडे पहने ही अपने ऊपर ठंडा पानी डाल लेती हैं और कोई चारा नहीं है। ठण्ड लगती है पर हम डटे रहेंगे जब तक हमारी मांगे पूरी नहीं हो जाती। "

70 साल की पूरो भी पंजाब के मानसा जिले से आई हैं और 16 दिन से नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में प्रदर्शन कर रही हैं। रात को वो बीस अन्य औरतों के साथ ट्राली में सोती हैं। अपने दुपट्टे को ही तकिया बना लिया है। सुबह को बदन टूटता है मगर दवा खाने के बाद कुछ ठीक महसूस करती हैं।

बसंत कौर 90 साल की हैं। वो बेलता गाँव, जाखल (पंजाब) से आई हैं और तीन दिन से टिकरी बॉर्डर पर मौजूद हैं। बसंत कौर बताती हैं, "महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। रात को जिस ट्राली में सोते हैं, उसमें जगह नहीं होती, एक दूसरे के पैर पर पैर रखे होते हैं। कुछ महिलाओं के पैरों में छाले पड़ गए हैं।"


देश में अपनी तरह के इस अनोखे आंदोलन में किसान परिवारों की तीन तीन पीढ़ियां शामिल हैं। 20-40 साल के जवान हैं तो 90 साल के बुजुर्ग तक शामिल हैं। वहीं 5 से लेकर 15 साल तक के बच्चे शामिल हैं। तेरह साल की इश्दीप अपने पिता के साथ प्रदर्शन का हिस्सा बनी हैं। वो मोगा, पंजाब से आयी हैं। इश्दीप के मुताबिक वो रात को स्वेटर पहनकर सोती हैं ताकि ठण्ड से खुद को बचा सकें।

सिंघु बॉर्डर पर काफी लोग पेट्रोल पम्प पर ही सो जाते हैं। करीब 200 से ज़्यादा लोग गद्दे- रज़ाई बिछाकर पेट्रोल पम्प के फर्श पर सोते हैं। इसके अलावा अलग- अलग संगठनों और पंचायतों द्वारा विश्राम गृह बनाए गए हैं। इन टेंट में 200-200 लोगों के सोने की व्यवस्था है। औरत, बच्चे और पुरुष सभी इन टेंट में सो सकते हैं।

सर्दी के अलावा यहां मच्छर बड़ी समस्या हैं। मच्छरों और ठण्ड से बचने के लिए किसानों ने कई तरीके खोजे हैं। ट्रक-ट्रैक्टर के दरवाज़ों पर मच्छरदानी लगाई जाती है। सिंघु बॉर्डर पर दिन में दो बार मच्छर मारने की दवा का छिड़काव किया जाता है। बहुत सारे लोग मच्छर भगाने वाली क्रीम और अगरबत्तियां बांट जाते हैं। लेकिन टिकरी बॉर्डर पर ज्यादातर बार ये सुविधा उपलब्ध नहीं मिल पाती है।


सिंघु बॉर्डर और टिकरी दोनों जगह पर लाइट की बड़ी समस्या है। अँधेरे से निपटने के लिए किसानों ने जेनरेटर सेट की व्यवस्था के साथ ही अपनी गाड़ियों में भी रौशनी का इंतजाम किया है।

इस आंदोलन में अब तक कई किसानों की जान जा चुकी है, जिसकी बड़ी वजह सर्दी बताई जाती है। ज़्यादातर मौतें टिकरी बॉर्डर पर हुईं हैं। खातरा गाँव, लुधियाना से आये गज्जन सिंह (55 वर्ष ) ने 29 दिसंबर को टिकरी बॉर्डर पर अपनी आखिरी साँसें भरी। उनके साथ आये एक किसान नेता ने बताया कि हरियाणा सरकार द्वारा वो वाटर कैनन की चपेट में आ गए थे। बार बार कपड़े गीले होने से वो बीमार हो गए थे। रविवार को गज्जन सिंह टॉयलेट में गिर पड़े जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। किसान नेताओं ने उनके शव का अंतिम संस्कार करने से इंकार कर दिया व हरियाणा सरकार के अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की है। गज्जन सिंह की तरह गुरजंत सिंह की सोनीपत के अजय मोरे (32 वर्ष ) की भी आंदोलन के दौरान मौत हो गई, जिसके लिए किसान ठंड को बड़ी वजह बता रहे।

डॉ.सुखचैन सिंह (33 वर्ष ) पंजाब के हज़ालिका में डिस्पेंसरी चलाते हैं। किसानों के समर्थन में वो भी टिकरी बॉर्डर पहुंचे हैं। गाँव कनेक्शन से हुई बातचीत में को कहते हैं, "यहां सर दर्द, बदन दर्द और पेट खराब होने के मरीज़ ज़्यादा हैं। पानी बदलने से लोगों का पेट खराब हो रहा है। यहाँ सोने का कोई समय नहीं है। स्लीप साइकिल (सोने का समय) बदलने से लोगों को बीपी की परेशानियां आ रही हैं।"


पंजाब के मोगा जिले से 25 नवंबर को चले सरजीत सिंह (70 वर्ष) अपने साथ एक कंबल और पतली रजाई के लेकर चले थे। वह कहते हैं, "बॉर्डर पर रात बिताना मुश्किल होता जा रहा है। रात को टॉयलेट जाने के लिए 1.5 किमी चलकर जाना पड़ता है। टॉयलेट गंदा है। उसमे पानी भी नहीं आता। अपने साथ पानी लेकर जाना पड़ता है। कई बार सर्दी और बाहर सुरक्षा के चलते मैं रात में पेसाब करने नहीं जाता।"

रात को चोरी- जासूसी का डर रहता है। हर दिन लोगों की ड्यूटी लगाई जाती है जो रात को पहरा देते हैं। इस बात का खासा ध्यान रखा जाता है कि रात को चोरी या कोई आपराधिक घटना घटित ना हो। साथ ही रात को यदि किसी को टॉयलेट जाना हो तो उनके साथ जा सकता है। टिकरी बॉर्डर पर मिले गुरप्रीत (23 वर्ष, मुख़्तसर पंजाब) ने गांव कनेक्शन को बताया कि रात को दो-दो घंटे के हिसाब से सबकी नियमित ड्यूटी लगती है। शाम को खाने के बाद पहरा देना शुरू हो जाता है। हर ट्रॉली की दो लोग रखवाली करते हैं। कुछ दिन पहले बदमाशों ने किसी ट्रक का टायर पंक्चर कर दिया था। ऐसे में पहरा कड़ा कर दिया गया है।"

इतनी मुश्किलों के बावजूद किसानों का हौसला टूटने का नाम नहीं ले रहा। कई बुज़ुर्ग हंसकर कहते हैं कि उन्हें रात को ठण्ड नहीं लगती। ठंडी हवाओं और कोहरे में बदन ठिठुरता है पर उन्हें ऊपर वाले पर विश्वास है। वही उनको शक्ति देता है। वो उनका हौसला डगमगाने नहीं देगा।

दिल्ली की ठण्ड देशभर में मशहूर है। इस समय रात का पारा 10 डिग्री तक गिर जाता है। वहीं शाम से कोहरा फैलने लगता है। ऐसे में किसान एक गद्दे और रज़ाई के साथ सड़कों पर रात गुज़ार रहे हैं। इस बार वो अपनी मांगे पूरी करवाए बिना नहीं हिलेंगे, ऐसा उनका हर बार कहना है।

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