बिहार चुनाव में बेरोजगारी का मुद्दा हावी होने के बावजूद कैसे जीता एनडीए?

तमाम एग्जिट पोल्स को धता बताते हुए बिहार में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिला। इसके कारणों की पड़ताल गांव कनेक्शन से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार हेमंत कुमार पाण्डेय ने की है, जो पिछले कुछ महीनों से बिहार के अलग-अलग इलाकों खासकर सीमांचल व मिथिलांचल से लगातार रिपोर्टिंग कर रहे हैं। इन दोनों क्षेत्रों में द्वितीय और तृतीय चरण में चुनाव हुआ था, जहां पर एनडीए को निर्णायक बढ़त मिली है।

Hemant Kumar PandeyHemant Kumar Pandey   12 Nov 2020 2:33 PM GMT

बिहार चुनाव में बेरोजगारी का मुद्दा हावी होने के बावजूद कैसे जीता एनडीए?

"नौकरी को लेकर चुनावी वादे केवल इलेक्शन जीतने के लिए होते हैं, जीतने के बाद कोई हमारा हाल-चाल भी पूछने के लिए नहीं आता," मधुबनी जिले के झंझारपुर विधानसभा के स्नातक लेकिन बेरोजगार छात्र अजय कुमार कहते हैं। अजय कुमार रोजगार को लेकर राजनीतिक दलों द्वारा किए गए चुनावी वादों पर भरोसा करने से इनकार कर देते हैं।

मंगलवार देर रात आए बिहार चुनाव-2020 के नतीजों ने तमाम एक्जिट पोलों को गलत साबित कर दिया। बीते सात नवंबर को तीसरे चरण के मतदान की समाप्ति के बाद आए इन एक्जिट पोलों में राजद के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बनने की बात की गई थी। हालांकि अंतिम चुनावी नतीजे के मुताबिक बिहार में एक बार फिर एनडीए की सरकार बनने जा रही है।

वहीं, दूसरी ओर राज्य की जनता को एक मजबूत विपक्ष भी मिला है। चुनाव आयोग द्वारा जारी परिणाम के मुताबिक एनडीए को 125 और महागठबंधन को 110 सीटें मिली हैं।

इस चुनाव के नतीजे में जो मुख्य बातें रही हैं, वह यह है कि भाजपा ने जदयू से अधिक सीटें हासिल की है। इससे पहले बिहार में भाजपा की भूमिका हमेशा जदयू के पीछे ही रही है। बिहार चुनाव में भाजपा ने 74 और जदयू ने 43 सीटें हासिल की। वहीं, राजद 75 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी।

पूरे देश की नजर बिहार चुनाव पर थी, इसकी कई वजहे हैं। कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव था। वहीं, बीते मार्च में देशव्यापी लॉकडाउन लगने के बाद लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार हुए। इनमें बड़ी संख्या बिहार के मजदूरों की थी।


आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस बार चुनाव में प्रवासी मजदूर मतदाताओं की संख्या 16 लाख से अधिक थी। हालांकि, इनमें केवल वे मजदूर ही शामिल थे, जिन्हें क्वारांटीन किया गया था या फिर जिनका सरकारी रिकॉर्ड दर्ज था। माना जाता है कि सरकार की नजरों से बचकर दूसरे राज्यों से आने वाले मजदूरों की संख्या इससे कहीं अधिक थी।

बिहार में पर्याप्त रोजगार के अभाव में पलायन की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि प्रवासी मजदूर का परिवार अपनी जरूरतों के लिए पूरी तरह अपने कमाऊ सदस्यों पर ही निर्भर रहता है। ऐसी स्थिति में इन पर बेरोजगारी की मार पड़ने पर पूरे परिवार पर बुरा असर पड़ता है।

इन बातों को देखते हुए यह माना गया कि इन मजदूरों और इनके परिवार के सदस्यों के भीतर केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की नीतीश सरकार के खिलाफ गुस्सा है। इस गुस्से को भुनाने के लिए राजद के नेतृत्व में बेरोजगारी और इसके परिणामस्वरूप होने वाले पलायन को एक बड़ा मुद्दा विधानसभा चुनावों के दौरान बनाया गया।

वहीं, राज्य में जैसे-जैसे चुनावी पारा चढ़ता गया और विपक्ष के चेहरे तेजस्वी यादव की जनसभा में भीड़ बढ़ती गई, उसे देखकर माना गया कि इस चुनाव में रोजगार एक बड़ा मुद्दा है और इसके चलते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सत्ता में वापसी मुश्किल है।


हालांकि, गांव कनेक्शन ने अपनी चुनावी रिपोर्टिंग के दौरान इन मजदूरों और इनके परिवार के सदस्यों से बात करके पाया कि जिस तरह बात मीडिया और सोशल मीडिया में चल रही है, जमीन पर वह अधिक नहीं है। राजद समर्थक मतदाताओं के बीच यह एक बड़ा मुद्दा था।

मधुबनी के बिस्फी विधानसभा के 22 वर्षीय अब्दुल हन्नान अर्थशास्त्र से स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं और उन्होंने खुद को राजद समर्थक बताया था। अब्दुल का कहना था, "इस चुनाव में बेरोजगारी मुख्य मुद्दा है। बिहार में नीतीश सरकार ने नौकरी देने का वादा किया था, लेकिन जॉब नहीं मिला। जब तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरी का वादा किया तो भाजपा वाले भी 19 लाख रोजगार की बात करने लगे। इससे पहले कहते थे कि तेजस्वी इसके लिए पैसे कहां से लाएंगे?"

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इस चुनाव में कुल मतदाताओं की संख्या 7.29 करोड़ है। इनमें से आधे यानी 3.6 करोड़ मतदाताओं की उम्र 18 से 39 साल के बीच है। चुनावी नतीजों को देखकर कहा जा सकता है कि अगर इस चुनाव में रोजगार मुख्य मुद्दा होता तो राजद को 75 और महागठबंधन को 110 सीटों से संतोष नहीं करना पड़ता।

अब यहां सवाल उठता है कि शिक्षा सहित अन्य विभागों में बड़ी संख्या में पद खाली होने के बावजूद बेरोजगारी की मार झेलने वाले युवाओं ने रोजगार के मुद्दे पर वोट नहीं दिया तो फिर ये किनसे प्रभावित हुए?


इस पर गांव कनेक्शन ने पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइंस के प्रोफेसर डीएम दिवाकर से बात की। उन्होंने इस बारे में कहा, "बिहार चुनाव में एनडीए ने युवाओं को गैर-जरूरी मुद्दों में भटकाया है और राष्ट्रवाद ने युवा मतदाताओं को प्रभावित किया। नित्यानंद राय जिस सभा में गए उन्होंने घृणा की राजनीति की और हेटस्पीच दी। इसका असर मतदाताओं पर जरूर पड़ा है।"

हालांकि, डीएम दिवाकर का यह भी कहना है कि इसे तेजस्वी यादव और महागठबंधन की सफलता ही कही जाएगी कि रोजगार सहित अन्य बुनियादी मुद्दें बिहार चुनाव में छाए रहें।

बिहार चुनाव-2020 के दौरान रिपोर्टर ने सीमांचल और मिथिलांचल की अधिकांश सीटों पर मतदाताओं से बात की थी। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं। इन दोनों इलाके में दूसरे और तीसरे चरण के तहत मतदान हुए थे और इन्होंने एनडीए की जीत में बड़ी भूमिका निभाई है।

बिहार के इन दोनों हिस्सों की एक बड़ी आबादी पर्याप्त संसाधनों के बावजूद रोजगार के पर्याप्त मौके के अभाव में गरीबी और पलायन की समस्या से जूझ रही है। इसकी पुष्टि नीति आयोग की रिपोर्ट भी करती है। आयोग के मुताबिक देश के सबसे पिछड़े 101 जिलों में से 12 जिले बिहार के हैं। इनमें आधे यानी छह- बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, खगड़िया, पूर्णिया, कटिहार और अररिया- सीमांचल और मिथिलांचल के छह जिले हैं।

रोजगार और विकास सहित अन्य मुद्दों पर चुनाव केंद्रित होने के बावजूद इन क्षेत्रों में केंद्र और राज्य की सत्तासीन गठबंधन ने महागठबंधन को काफी पीछे छोड़ दिया। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले चरण में जिन 71 सीटों पर चुनाव हुए थे, उनमें एनडीए ने केवल 29.6 फीसदी सीटों पर कब्जा किया। वहीं, दूसरे चरण की 94 सीटों के लिए यह आंकड़ा 52.1 फीसदी और तीसरे चरण की 78 सीटों पर 66.7 फीसदी हो गया।

मिथिलांचल के तहत आने वाले मधुबनी जिले का बसीपट्टी पंचायत पलायन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले इलाकों में से एक है। यहां के सत्तो मंडल अपनी जवानी की दिनों से ही दूसरे राज्यों में मजदूरी का काम करते थे, लेकिन अब 60 से अधिक उम्र होने के चलते बाहर नहीं जा सकते हैं तो वह गांव में ही बंटाई पर थोड़ी बहुत खेती के लिए जमीन लेकर अनाज (धान-गेहूं) उगाते हैं। हालांकि, अब उनके बेटे अपनी आजीविका के लिए दूसरे राज्य जाने को मजबूर हैं। लेकिन बिहार में रोजगार की कमी को लेकर सरकार से उनके चहरे पर कोई शिकायत नहीं दिखी।


1990 के दशक में राजद समर्थक सत्तो मंडल ने बताया, "पहले हम लोग लालू यादव के आदमी थे। वे कहते थे कि यहां हेल (तैर) जाओ तो हम लोग बिना कुछ सोचे समझे हेल जाते थे। लेकिन उनसे हम लोगों को क्या मिला? हमें जो मिला नीतीश के समय मिला। अब नीतीश कुमार का साथ कैसे छोड़ देंगे?"

चुनावी गुणाभाग लगाने वालों को आंकलन ये भी था कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान जिस तरह से बिहार के प्रवासी कामगार और मजदूर दूसरे राज्यों से अपने घरों तक पहुंचे वो विधानसभा चुनावों मेें मुद्दा बनेगा लेकिन वक्त बीतने के साथ जमीन पर वैसा नजर नहीं आया।

सत्तो मंडल का यह भी मानना था कि सरकार ने लॉकडाउन लोगों को कोरोना से बचाने के लिए किया था और फैक्ट्रियां बंद हो गईं तो अब इसमें सरकार क्या कर सकती थी। सत्तो मंडल सहित बसीपट्टी के अन्य ग्रामीणों का यह मानना था कि अगर सरकार लॉकडाउन के दौरान फ्री अनाज और बैंक अकाउंट में पैसे नहीं देती तो उनकी स्थिति भूखमरी की हो जाती।

गांव कनेक्शन द्वारा 30 मई से 16 जुलाई 2020 के बीच 23 राज्यों के 25300 से ज्यादा लोगों के बीच कराए गए सर्वे सवाल किया गया था कि प्रवासियों के मुद्दे को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार और राज्य सरकारों का रवैया कैसा था? इसके जवाब में सर्वे में शामिल बिहार के 94 फीसदी ने नरेंद्र मोदी सरकार के प्रवासियों के प्रति रवैया को गुड (अच्छा) बताया था, पांच फीसदी ने खराब बताया था वहीं राज्य सरकारों के रवैये के बारे में बात करने पर बिहार के 90 फीसदी लोगों ने राज्य सरकार ( नीतीश सरकार) के कामकाज को सही बताया था। यानि प्रवासियों की मुश्किलें चुनाव में मुद्दा नहीं बन सकीं।

बसीपट्टी पंचायत फुलपरास विधानसभा क्षेत्र में आता है और यहां से जदयू की शीला कुमारी ने कांग्रेस के उम्मीदवार कृपानाथ पाठक को 11,198 मतों से मात दी।

बिहार के मतदाताओं के बीच हमने यह पाया कि रोजगार लोगों के लिए एक अहम मुद्दा जरूर है, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की नीतीश सरकार की योजनाओं और शराबबंदी ने भी मतदाताओं खासकर महिलाओं पर अपनी पकड़ मजबूती से बनाई हुई थी।

मधुबनी जिले के राजनगर विधानसभा क्षेत्र स्थित मल्लाहों की बस्ती में हमारी मुलाकात कला देवी से हुई थी। वह दूसरे की जमीन पर मखाना की खेती करती हैं। उनके दो बेटे हैं और दोनों बाहर काम करते थे, लेकिन पिछले लॉकडाउन के बाद इनके पास कोई काम नहीं है। इसके बावजूद कला देवी राज्य या केंद्र की सरकारों से नाराज नहीं हैं।

उन्होंने कहा, "हम लोग मोदी-नीतीश से नाराज क्यों होंगे? अभी हमको फ्री अनाज मिलता है। गैस चूल्हा भी मिला था। गांव में दो साल पहले बिजली नहीं था, अब घर में बिजली है। पानी के लिए पाइप भी बिछ रहा है।"

कला देवी के साथ मौजूद सलिता देवी का कहना था कि नीतीश कुमार ने शराबबंदी कर अच्छा काम किया है लेकिन अब इसमें ढील दे दी है। सलिता हमें बताती हैं कि शायद चुनावों को देखते हुए ऐसा किया गया है। लेकिन सरकार को शराबबंदी को और कड़ाई से लागू करना चाहिए।

बिहार में नए कृषि कानूनों का चुनावों पर असर रहा क्या? शायद नहीं। पंजाब और हरियाणा में जहां बिल को लेकर आज तक गहमागहमी है वहीं बिहार के किसान और किसान संगठन भी उदासीन नजर आए। कृषि कानूनों पर किसानों की राय और अवधारणा जानने के लिए गांव कनेक्शन ने 16 राज्यों में रैपिड सर्वे कराया था। गांव कनेक्शन का ये रैपिड सर्वे 3 से 9 अक्टूबर 2020 को 5000 से ज्यादा किसानों के बीच किया था। इस सर्वे में किसानों से सवाल किया गया था कि हलिया किसान कानूनों को देखते हुए उन्हें क्या लगता ह कि नरेंद्र मोदी सरकार समर्थन करती है विरोध करती है या फिर उदासीन है जिसके जवाब में देश के उत्तरी क्षेत्र (यूपी, बिहार, उत्तराखंड) के 53 फीसदी किसानों ने कहा कि किसान समर्थक है, 24 फीसदी ने कहा कि किसान विरोधी है,11 फीसदी ने कहा पता नहीं जबकि 10 फीसदी ने कहा था कि वो कुछ कह नहीं सकते हैं। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन का आंकड़ा 44 फीसदी था। यानि देश में एपीएमएसी खत्म करने वाले राज्य में तीनों नए कृषि कानूनों का भी ज्यादा असर नहीं था। जानकार भी मानते हैं ये चुनाव अगर बिहार की जगह पंजाब में होते तो नतीजे और होते।

बिहार किसान मंच के अध्यक्ष धीरेंद्र सिंह टुडू का कहना है, 'चुनाव में कृषि से जुड़े तीनों कानूनों को लेकर किसानों ने अपना विरोध जताया था, लेकिन चूंकि यहां की राजनीति में जाति और धर्म का मुद्दा इतना हावी हो जाता है कि इसके सामने दूसरे महत्वपूर्ण मुद्दे गायब हो जाते हैं। यहां के किसान भी बड़ी संख्या में जाति और धर्म के नाम पर वोट करते हैं. इसके चलते इस चुनाव में तमाम असंतोष और नाराजगी के बावजूद इसका फायदा एनडीए को मिला है।'

धीरेंद्र सिंह टुडू आगे जोड़ते हैं, "किसानों ने नीतीश कुमार के खिलाफ वोट दिया इसी का परिणाम है कि जदयू की सीटों की संख्या 71 से घटकर 43 पर पहुंच गई।' हालांकि, जब गांव कनेक्शन ने उनसे ये सवाल किया कि किसानों की नाराजगी या गुस्सा चुनावी नतीजे में भाजपा के खिलाफ क्यों नहीं दिखा तो उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। धीरेंद्र सिंह टुडू की के मुताबिक तो बिहार किसान मंच से राज्य के 22 जिलों के 5,000 से अधिक किसान जुड़े हुए हैं।

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