लेबर पेन: जम्मू-कश्मीर में गुर्जर और बकरवाल समुदाय को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए करना पड़ रहा संघर्ष

जम्मू और कश्मीर में रहने वाले बकरवाल और गुर्जर समुदाय की गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कुछ महिलाएं स्वास्थ्य केंद्र पर पहुंचने से पहले ही रास्ते में बच्चे को जन्म दे देती हैं।

Bisma BhatBisma Bhat   23 Feb 2021 9:12 PM GMT

लेबर पेन: जम्मू-कश्मीर में गुर्जर और बकरवाल समुदाय को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए करना पड़ रहा संघर्ष

- बिस्मा भट

श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर. 5 जनवरी, 2021 को दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के जरकन शालीदार गांव में गुर्जर समुदाय की 20 वर्षीय अख्तर जन ने अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया। जब अख्तर को उसके पति व उसके 15 दोस्तों द्वारा घर से भारी बर्फ के बीच से लकड़ी के स्ट्रेचर पर उप-जिला अस्पताल ले जाया जा रहा था, उसी दौरान उसने बच्चे को जन्म दिया। अस्पताल से अख्तर का घर पांच किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। अच्छी बात है कि मां और बच्चा दोनों ठीक हैं।

"4 जनवरी की रात को मेरा लेबर पेन शुरू हो गया था। इसके बाद मेरे पति पास के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर की तलाश में गए, लेकिन वहां कोई नहीं था। अगले दिन सुबह मेरे पति ने एम्बुलेंस के लिए फोन किया, लेकिन भारी बर्फबारी के चलते कोई नहीं आया। मुझे शर्म आ रही थीं कि मैंने अपने पति के दोस्तों के सामने अपने बच्चे को जन्म दिया," अख्तर ने गांव कनेक्शन को बताया।

जम्मू और कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले गुर्जर और बकरवाल जनजातियों से जुड़ी अख्तर जैसी हजारों महिलाओं की बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक कोई पहुंच नहीं है। ये जनजातियां अपने पशुओं के लिए घुमक्कड़ जीवन जीते हैं और अस्थायी टेंट बनाकर रहते हैं, इनके पास स्थायी घर नहीं होते हैं।

सर्दियों में कश्मीर की ज्यादातर सड़कें बर्फ से ढक जाती हैं, इसके चलते स्थानीय लोगों को इमरजेंसी स्थिति में मरीजों को अपने कंधों के सहारे लकड़ी के स्ट्रेचर पर लंबी दूरी तक ले जाना पड़ता है। Photo: By arrangement

कश्मीरी और डोगरा के बाद बकरवाल और गुर्जर जम्मू-कश्मीर में तीसरा सबसे बड़ा समुदाय है। 2011 की जनगणना के अनुसार, गुर्जरों और बकरवालों की आबादी राज्य में 11.9 प्रतिशत है। इन समुदाय के लोगों का कहना है कि वह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के किसी भी सुविधा का फायदा उठा पाने में असमर्थ हैं। अख्तर के पति पोसवाल ने बताया कि इमरजेंसी स्थिति में उप-जिला या जिला अस्पताल में जाने के लिए ट्रांसपोर्ट की कोई सुविधा नहीं है क्योंकि सड़कें ऊबड़-खाबड़ हैं।

"हर साल हम मरीजों को स्ट्रेचर पर अस्पताल ले जाते हैं। कभी-कभी मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। हमारे गांव में स्वास्थ्य केंद्र नहीं है, इसके चलते आदिवासी लोगों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है," पोसवाल ने गांव कनेक्शन को बताया।

भारी बर्फबारी के कारण स्थानीय लोग प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं पहुंच पाते हैं Photo: By arrangement

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सुविधाओं का अभाव

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) पहला बेस है, जो 6 उप-केंद्रों के रूप में काम करता है। ये सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के तहत आते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के बाद उप-जिला और जिला अस्पताल की सुविधा है फिर मेडिकल कॉलेज और तृतीयक स्तरीय स्वास्थ्य देखभाल केंद्र है जैसे कि श्रीनगर में शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसकेआईएमएस) और एसएमएचएस अस्पताल हैं।

2019 में जारी Traversing the margins: Access to healthcare by Bakarwals in remote and conflict-prone Himalayan regions of Jammu and Kashmir नामक रिपोर्ट में पता चला कि पीएचसी में 51 फीसदी भौतिक आधारभूत संरचनाएं और सुविधाएं उपलब्ध थीं। सप्लाई चेन में बाधा आने के कारण पीएचसी में दवाओं की कमी हुई है। सर्वे की तारीख पर आवश्यक दवा की लिस्ट में से सिर्फ 42.2 फीसदी दवाएं उपलब्ध थीं।

सर्दियों में कश्मीर की ज्यादातर सड़कें बर्फ से ढक जाती हैं, इसके चलते आदिवासी लोगों को इमरजेंसी स्थिति में मरीजों को अपने कंधों के सहारे लकड़ी के स्ट्रेचर पर लंबी दूरी तक ले जाना पड़ता है, ताकि वह मरीज को स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती करा सकें।

जम्मू और कश्मीर के गुर्जर और बकरवाल समुदाय की हजारों महिलाओं तक बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच नहीं है Photo: By arrangement

अख्तर जन की तरह 24 साल की गर्भवती सूफिया जन को भी जनवरी महीने में भारी बर्फबारी के बीच में 12 लोगों ने लकड़ी के स्ट्रेचर पर अस्पताल पहुंचाया था। सूफिया के पति जुबैर अहमद ने बताया कि लोकल पीएचसी उनके घर से सिर्फ आधा किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है, लेकिन वहां पर कोई डॉक्टर या नर्स नहीं था, न ही कोई एंबुलेंस थी।

"यह सर्दियों के दौरान आम बात हो गई है। मेरे पड़ोस की ही दो गर्भवती आदिवासी महिलाओं को भी पिछले महीने इसी तरह से अस्पताल ले जाया गया था।" जुबैर अहमद ने गांव कनेक्शन को बताया।

श्रीनगर के पहाड़ी फकीर गुजरी गांव में मंजूर अहमद खटाना अपनी गर्भवती पत्नी के साथ हर महीने 25 किलोमीटर की यात्रा करके मातृत्व देखभाल केंद्र, लाल डेड अस्पताल में गर्भवती पत्नी को दिखाने के लिए जाते हैं।

मंजूर अहमद ने बताया कि डॉक्टर महीने में दो या तीन बार पीएचसी आते हैं। इस पहाड़ी इलाके में चार गांव मिलाकर चार हजार गुर्जर परिवार के लोग रहते हैं और हमें इस तरह के पीएचसी पर निर्भर रहना पड़ता है।

कुछ महिलाएं स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने से पहले ही बच्चे को जन्म दे देती हैं Photo: By arrangement

मंजूर अहमद ने दावा किया कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटने से पहले पीएचसी पर एक एम्बुलेंस हुआ करती थी। "हमें इसरजेंसी के समय में एक निजी टैक्सी की व्यवस्था करनी पड़ती है। टैक्सी से आने और जाने का करीब एक हजार रुपया खर्च आता है।" मंजूर अहमद ने गांव कनेक्शन को बताया।

केंद्र सरकार की जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) के तहत ग्रामीण इलाके की गर्भवती महिलाओं को 1,400 रुपये दिए जाते हैं, लेकिन इस राशि को लेने के लिए यहां के लोगों को 3,000 रुपये खर्च करके श्रीनगर जाना पड़ता है।

नाम न छापने की शर्त पर श्रीनगर जिले के एक बेसिक हेल्थ वर्कर ने बताया कि पीएचसी में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है। तीन साल पहले अल्ट्रासोनोग्राफी मशीन लगाई गई थी, लेकिन आज तक किसी ने इस मशीन का प्रयोग नहीं किया है, क्योंकि इसे चलाने के लिए कोई तकनीशियन नहीं है। एक्स-रे और ईसीजी जैसी बुनियादी मशीनें भी यहां उपलब्ध नहीं हैं। सरकार गर्भवती महिलाओं को आयरन और कैल्शियम की गोलियों देती है और पीएचसी में पेरासिटामोल टैबलेट भी दिया जाता है, बाकी अन्य दवाएं लोगों को खरीदना पड़ता है।

अस्थायी टेंट और ठंड का प्रकोप

गर्भवती आदिवासी महिलाओं के अलावा गुर्जर और बकरवाल समुदाय के बच्चे भी पीड़ित हैं.। पिछले महीने 18 और 19 जनवरी को शून्य से 8 डिग्री सेल्सियस नीचे तापमान होने के चलते जुबैर अहमद मंदार के दो नाबालिग बच्चे बीमार हुए और उनकी मौत हो गई। बकरवाल समुदाय के जुबैर अहमद मंदार 21 सदस्यीय परिवार के साथ कुलगाम जिले के ब्रिनाल लामर गांव में अस्थायी टेंट बानकर रहते हैं। भारी बर्फबारी होने के चलते परिवार 3 किलोमीटर दूर स्थित पीएचसी में दोनों बच्चों को इलाज के लिए नहीं ले जा पाया. बच्चों की मौत के बाद जिला प्रशासन ने परिवार को मुफ्त में रहने के लिए किराए का मकान दिया।

भारी बर्फबारी के बाद इलाका Photo: By arrangement

समाजिक कार्यकर्ता चौधरी इरशाद खटाना ने कहा कि अगर सरकार यह मकान पहले दे देती तो बच्चे जिंदा होते। "गांव में पीएचसी बेकार हालात है। यहां डॉक्टर हमेशा उपलब्ध नहीं होते हैं। रात में यह घटना घटी थी, उस समय पीएचसी बंद थी। रात में पीएचसी बंद रहती है।" इरशाद खटाना ने गांव कनेक्शन को बताया।

बकरवाल समुदाय के स्वास्थ्य को लेकर रिसर्च करने वाले वीणापानी राजीव वर्मा ने कहा, "सरकार को उन जगहों के लिए उपग्रह-आधारित टेलीमेडिसिन नेटवर्क विकसित करने की जरूरत है, जहां आसानी से पहुंचा नहीं जा सकता है। दूरदराज के इलाकों में आधारभूत संरचना स्थापित करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) पहले ही कई राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करने के लिए समझौता कर चुका है।"

गुर्जर और बकरवाल समुदायों की शिकायत है कि वे पीएचसी के किसी भी सेवा का लाभ उठाने में असमर्थ हैं Photo: By arrangement

उन्होंने आगे कहा कि इस मॉडल को हब और स्पोक कहते हैं। यह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और छोटे अस्पतालों को बड़ी तृतीयक स्तरीय स्वास्थ्य देखभाल केंद्र से जोड़ता है। इसके अलावा यह एम्बुलेंस को नेटवर्क भी प्रदान करता है।

राजीव वर्मा ने सुझाव दिया कि गुर्जर और बकरवाल समुदाय के लोग जिस इलाके में रहते हैं, वहां के रास्तों में मोबाइल औषधालयों को बढ़ाया जाना चाहिए और सरकार को प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मचारियों की तैनाती करनी चाहिए।

जम्मू और कश्मीर गुर्जर बकरवाल युवा कल्याण सम्मेलन के अध्यक्ष जाहिद परवाज चौधरी ने कहा कि सरकार लोगों के घर के दरवाजे पर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का दावा करती है, लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ नहीं दिखता है। यहां तक ​​कि पीएचसी में बुखार के लिए भी दवा उपलब्ध नहीं है।

केंद्र शासित प्रदेश में आदिवासी मामलों के निदेशक मोहम्मद सलीम ने स्वास्थ्य विभाग को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि हमारे अधिकार में स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा तैयार करना है, न कि मैनपावर की व्यवस्था करना।

इस मामले को लेकर गांव कनेक्शन ने कश्मीर के स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक डॉ. समीर मट्टू और प्रमुख सचिव स्वास्थ्य अटल डुल्लो को कई बार कॉल और मैसेज किया, लेकिन उनका जवाब नहीं आया।

अनुवाद- आनंद कुमार

इस स्टोरी को मूल रूप से अंग्रेजी में यहां पढ़ें- Labour Pains: Gujjar and Bakarwal tribal communities in J&K struggle to access basic health facilities

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