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झारखंड के बोकारो में भूमि अधिग्रहण: जमीन के लिए भिड़ गए जमीन मालिक और अधिकारी

झारखंड के बोकारो जिले के एक गांव गोड़ाबाली में 12.2 एकड़ की संपत्ति निजी भूमि मालिकों और झारखंड औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (JIADA) के बीच विवाद का कारण बन गई है। दोनों पक्ष संपत्ति पर अपना दावा कर रहे हैं, इसके लिए कानूनी लड़ाई चल रही है।

Shivani GuptaShivani Gupta   27 July 2020 8:58 AM GMT

झारखंड के बोकारो में भूमि अधिग्रहण: जमीन के लिए भिड़ गए जमीन मालिक और अधिकारीविवादित जमीन स्थल पर निर्माण कार्य चल रहा है। फोटो: अमित कुमार सिंह

सितंबर 2018 में, 29 साल के अमित कुमार सिंह ने झारखंड के बोकारो जिले के गोड़ाबाली गांव में अपने 12.2 एकड़ (लगभग-5 हेक्टेयर) भूमि पर तेजी से चल रहा निर्माण कार्य देखा। जिस भूमि पर निर्माण चल रहा था, उस भूमि का वह और उनके चचेरे भाई सह-मालिक थे। यह संपत्ति अमित और उसके चचेरे भाई को उनके दिवंगत दादा धनु सिंह से विरासत के रुप में मिली थी।

अमित और उनके चचेरे भाई पंकज कुमार, वीरेंद्र कुमार और अरुण कुमार, ने इस जमीन पर कोई निर्माण नहीं किया था क्योंकि यह जमीन एक औद्योगिक क्षेत्र में था।

कोलकाता की एक निजी कंपनी, दिग्विजय प्राइवेट लिमिटेड उस जमीन पर निर्माण कार्य करवा रही थी। सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत वकील पंकज ने आरोप लगाया कि झारखंड औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (JIADA), बोकारो ने अवैध रूप से हमारी पैतृक संपत्ति निजी कंपनी को दे दिया।

JIADA पहले बोकारो औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (BIADA) के नाम से जाना था। उनके अधिकार क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण और बुनियादी सुविधाओं में विकास करने की जिम्मेदारी है।

इसके बाद चार याचिकाकर्ता रांची हाईकोर्ट के तरफ रुख किए। वहां, उन्होंने रिट याचिका C 551 दाखिल की। याचिका का उद्देश्य संपत्ति पर आगे से किसी तरह का विकास कार्य रोके जाने के लिए किया गया था। वे एक जगह से दूसरे जगह तक भाग-दौड़ कर रहे हैं, ताकि उन्हें उनकी संपत्ति वापस मिल जाए।

निर्माण स्थल पर अमित फोटो खींचते हुए

जून 2020 में याचिकाकर्ताओं ने देखा कि संपत्ति पर निर्माण कार्य फिर से शुरू हो गया है। गाँव कनेक्शन ने याचिकाकर्ताओं, बोकारो के भूमि अधिग्रहण अधिकारी और विकास प्राधिकरण के सचिव से इस मुद्दे पर विस्तार से बात की। गौरतलब है कि सभी पक्षों के पास बताने के लिए अपनी अलग-अलग कहानियां हैं।

JIADA के सचिव संदीप कुमार ने गांव कनेक्शन को बताया, "याचिकाकर्ताओं का दावा पूरी तरह से गलत है। भूमि को बीपीसीएल (भारत पेट्रोलियम कोल लिमिटेड) द्वारा बहुत पहले ही अधिग्रहित कर लिया गया था। यह भूमि परियोजना निदेशक और भूमि पुनर्वास की है और यह भूमि 1974 से हमारे अधिकार के दायरे में आ गया था।"


भूमि विवाद अब तक

याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, विवादित भूमि का अधिग्रहण राज्य सरकार द्वारा कभी नहीं किया गया और मूल रूप से भूमि मालिकों को कोई मुआवजा भी नहीं दिया गया है।

याचिकाकर्ताओं में से एक पंकज ने दावा किया, "2017 में हमारी भूमि लगभग 13 एकड़ (लगभग 5.3 हेक्टेयर) को कोयला उत्सर्जन परियोजना के लिए बोकारो में ONGC को आवंटित किया गया था। भूमि आवंटन पत्र पर ONGC और JIADA के बीच हस्ताक्षर हुआ था। सितंबर 2018 में जब हमारी जमीन पर निर्माण शुरू हुआ, तब हमें इस परियोजना के बारे में पता चला।"

पिछले साल की शुरुआत में याचिकाकर्ताओं ने झारखंड के रांची में स्थित हाईकोर्ट से मांग किया कि भूमि के अनाधिकृत प्रवेश पर रोक लगाई जाए। 13 फरवरी 2019 को रांची हाईकोर्ट ने जमीन पर किसी भी तरह के प्रवेश और निर्माण कार्य को रोकने का निर्देश दिया और कहा कि इस जमीन पर कुछ भी निर्माण कार्य हुआ हो तो उसका परीक्षण न्यायालय करेगा।

न्यायालय का आदेश


24 दिसंबर 2018 को भूमि अधिग्रहण कार्यालय द्वारा जारी अनापत्ति प्रमाण पत्र।

इस बीच, ONGC ने परियोजना से अपना हाथ वापस खींच लिया। पंकज ने आरोप लगाया, " विकास प्राधिकरण ने दिग्विजय फेरोमैट नामक निजी कंपनी को संपत्ति आवंटित की।" उन्होंने दावा किया कि उनके पास 2018 में भूमि अधिग्रहण कार्यालय द्वारा जारी किया गया अनापत्ति प्रमाण पत्र था। हालांकि, JIADA के सचिव ने गाँव कनेक्शन को बताया कि 2018 के अनापत्ति प्रमाणपत्र में संशोधन किया गया है और भूमि का अधिग्रहण किया गया।


22 फरवरी 2019 को संशोधित NOC

उनके मुताबिक फेरोमैट ने 60 प्रतिशत कार्य पूरा कर लिया है। पंकज ने यह भी आरोप लगाया कि विवादास्पद स्थल पर चल रहे निर्माण कार्य को रोकने के लिए पुलिस याचिकाकर्ताओं की मदद नहीं कर रही हैं।

विवादित स्थल

विकास प्राधिकरण के अलावा, याचिकाकर्ताओं ने दिग्विजय फेरोमैट कंपनी के निदेशकों से संपर्क किया, जो जमीन पर निर्माण कार्य कर रहे है। कंपनी के तरफ से पत्र के माध्यम से सूचित किया गया कि कंपनी के चार में से तीन निदेशक पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं और याचिकाकर्ताओं को JIADA से इस मामले को सुलझाने की मांग करनी चाहिए।

गाँव कनेक्शन ने JIADA के भूमि अधिग्रहण अधिकारी जेम्स सुरिन से संपर्क किया, जो कि बोकारो में कार्यरत हैं। उन्होंने बताया, "यह भूमि 1954-56 में अधिग्रहित की गई थी और उसी दौरान याचिकाकर्ता के परिवार को मुआवजा दिया गया था। उनका दावा झूठा है।" इस बात की पुष्टि JIADA के सचिव ने भी की।


इस बीच, कुछ और स्थानीय लोगों ने JIADA द्वारा बोकारो में भूमि अधिग्रहण का आरोप लगाया। स्थानीय लोगों में से एक मोहम्मद आलम ने भी भूमि अधिग्रहण का विरोध किया था। इस विरोध के चार महीने बाद उनकी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। मोहम्मद आलम की 45 वर्षीय विधवा पत्नी ने गांव कनेक्शन को बताया, "मेरे पति देवबाली गांव में लगभग 5 एकड़ (लगभग 2 हेक्टेयर) भूमि के मालिक थे, जिसमें वे खेती करते थे। दो साल पहले विकास प्राधिकरण ने अवैध तरीके से हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया था। प्राधिकरण ने हमारी जमीन को जेसीबी से खोदना शुरू कर दिया, तब मेरे पति ने विरोध किया था।"

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को मोहम्मद आलम ने पत्र लिखा था, जिनकी बाद में सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी

जब गांव कनेक्शन ने मोहम्मद आलम के मामले में पूछा तो सुरिन ने कहा, "हमें यह देखना होगा। चूंकि, यह एक पुराना मामला है, जोकि 1980-81 के आसपास का है।"

इस बीच, बोकारो के गोड़ाबली गांव में विवादास्पद जमीन की कानूनी लड़ाई को लेकर याचिकाकर्ताओं ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन को पत्र के माध्यम से अपनी परेशानी बताई। याचिकाकर्ताओं ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। उन लोगों ने पत्र में लिखा, "JIADA बोकारो ने सभी निजी भूमि को दिग्विजय फेरोमैट प्राइवेट लिमटेड कंपनी को आवंटित किया है। यह आवंटन मिलीभगत, साजिश, धोखाधड़ी और गलत बयानबाजी के आधार पर किया गया है।"

अनुवादक- आनंद कुमार

इस स्टोरी को मूल रूप से अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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