एंटी-हेल गन क्या है? ओलों से फसलों को बचाने वाली तकनीक पर क्यों हो रही बहस

Preeti Nahar | Jun 04, 2026, 19:34 IST
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World Environment Day: ओलावृष्टि से फसलों को बचाने के लिए हिमाचल प्रदेश में एंटी-हेल गन का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह तकनीक एसिटिलीन नाम की गैस और हवा के मिश्रण से शॉक वेव पैदा कर बादलों में ओलों के बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करने का दावा करती है। हालांकि इसकी प्रभावशीलता और पर्यावरणीय असर को लेकर बहस जारी है। जानिए एंटी-हेल गन कैसे काम करती है, इसकी लागत कितनी है और इसे लेकर क्या सवाल उठ रहे हैं।

Anti--Hail Gun से पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर क्या चिंताएं<br>
Anti--Hail Gun से पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर क्या चिंताएं
हर साल मार्च से मई के बीच हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादक इलाकों में ओलावृष्टि किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है। कई बार कुछ ही मिनटों में पूरी फसल तबाह हो जाती है और बागवानों को लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। इसी नुकसान को कम करने के लिए हिमाचल प्रदेश में एंटी-हेल गन (Anti-Hail Gun) तकनीक पर वर्षों से प्रयोग किए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में स्वदेशी एंटी-हेल गन विकसित करने की दिशा में भी काम हुआ है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता और पर्यावरणीय असर को लेकर बहस जारी है।

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क्या होती है एंटी-हेल गन?

एंटी-हेल गन एक विशेष मशीन होती है, जिसका उद्देश्य बादलों में ओलों के बनने की प्रक्रिया को बाधित करना होता है। यह एक लंबी सिलेंड्रिकल संरचना होती है, जिसका मुंह आसमान की ओर खुला रहता है। मशीन के निचले हिस्से में गैस और हवा के मिश्रण का विस्फोट कराया जाता है, जिससे तेज शॉक वेव (Shock Wave) पैदा होती है। दावा किया जाता है कि यह शॉक वेव बादलों तक पहुंचकर ओलों के विकास को रोकती है और पानी की बूंदों को ओलों की बजाय बारिश के रूप में गिरने में मदद करती है।

ओले आखिर बनते कैसे हैं?

ओले मुख्य रूप से क्यूम्यूलोनिंबस (Cumulonimbus) बादलों में बनते हैं। इन बादलों के भीतर तेज ऊपर उठती हवाएं पानी की बूंदों को ऊंचाई तक ले जाती हैं, जहां वे बर्फ में बदल जाती हैं। ये बर्फीले कण कई बार ऊपर-नीचे होते हुए और अधिक परतें जमा करते जाते हैं। जब उनका वजन बहुत बढ़ जाता है, तब वे ओलों के रूप में जमीन पर गिरते हैं। एंटी-हेल गन इसी प्रक्रिया को शुरुआती चरण में प्रभावित करने का दावा करती है।

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हिमाचल में क्यों बढ़ी इसकी जरूरत?

हिमाचल प्रदेश के सेब, नाशपाती और अन्य फलों के बागान हर साल ओलावृष्टि से प्रभावित होते हैं। कई इलाकों में एक ही ओलावृष्टि पूरी फसल को नष्ट कर सकती है। हिमाचल के शिमला जिले के सेब किसान अमन ठाकुर ने गाँव कनेक्शन को बताया "राज्य में हर वर्ष करोड़ों रुपये की फसली क्षति केवल ओलों की वजह से होती है। साल 2026 में भी हिमाचल के सेब उत्पादन में कमी आयी है। मार्च महीने में हुई बारिश के कारण सेब की फ्रूटिंग सही से नहीं हो पाई, जिस कराण सेब के पकने का समय गड़बड़ा गया। यही कारण है कि सरकार और वैज्ञानिक संस्थान लंबे समय से ओलावृष्टि नियंत्रण तकनीकों पर काम कर रहे हैं।"

अमन बताते हैं कि वो खुद कई साल पहले न्यूजीलैंड से इस मशीन का मंगाकर इस्तेमाल कर चुके हैं, लेकिन खेती के लिए कोई अधिक फायदेमंद नहीं रही, दो साल से इस वो खुद इस मशीन का इस्तेमाल बंद कर चुके हैं।

स्वदेशी एंटी-हेल गन कैसे बनी?

पहले हिमाचल प्रदेश में इस्तेमाल होने वाली कई एंटी-हेल गन विदेशों से आयात की गई थीं, जिनकी लागत काफी अधिक थी। बाद में IIT बॉम्बे और डॉ. वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, नौणी ने मिलकर स्वदेशी एंटी-हेल गन विकसित करने की पहल की। इसका उद्देश्य कम लागत वाली तकनीक तैयार करना था, ताकि अधिक किसान इसका उपयोग कर सकें।

एंटी-हेल गन कैसे काम करती है?

अमन ठाकुर के अनुसार एंटी-हेल गन में एसिटिलीन गैस और हवा के मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता है। मशीन के अंदर एक नियंत्रित और हल्का विस्फोट किया जाता है, जिससे तेज ध्वनि और शॉक वेव पैदा होती है। यह शॉक वेव लगभग 22 फीट लंबी गन के जरिए आसमान की ओर जाती है। दावा किया जाता है कि यह बादलों के अंदर की परिस्थितियों को प्रभावित कर ओलों के बनने की प्रक्रिया को कमजोर कर सकती है, जिससे फसलों को नुकसान कम हो सकता है।

क्या होती है एसिटिलीन गैस?

एंटी-हेल गन में एसिटिलीन नाम की गैस का इस्तेमाल होता है, जिसका उपयोग आमतौर पर वेल्डिंग और लोहे की कटाई जैसे कामों में किया जाता है। इस गैस और हवा के मिश्रण से मशीन में तेज धमाका किया जाता है, जिससे एक शक्तिशाली ध्वनि तरंग (शॉक वेव) पैदा होती है।

कितनी तेज होती है इसकी शॉक वेव?

शुरुआती परीक्षणों में पाया गया कि एंटी-हेल गन से निकलने वाली शॉक वेव बहुत तेज गति से ऊपर की ओर बढ़ती है। वैज्ञानिकों के अनुसार एक बार फायर करने में करीब 0.24 किलोग्राम गैस खर्च होती है। एक एलपीजी सिलेंडर से लगभग 500 से 600 बार गन चलाई जा सकती है।

विदेशी एंटी-हेल गन क्यों हैं महंगी?

हिमाचल प्रदेश में पहले जिन विदेशी एंटी-हेल गनों का इस्तेमाल किया गया, उनकी कीमत करीब 1 से 3 करोड़ रुपये तक थी। यही वजह है कि इन्हें सीमित संख्या में ही लगाया जा सका। वर्तमान में शिमला, कुल्लू और मंडी जैसे बागवानी क्षेत्रों में ऐसी कई गनें स्थापित हैं, जिनका उपयोग ओलावृष्टि से फसलों को बचाने के लिए किया जाता है। जबकि स्वदेशी एंटी-हेल गन का सेट अप में 10 लाख तक का खर्चा आ सकता है।

पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर क्या चिंताएं हैं?

सेब किसान अमन ठाकुर बताते हैं, "अभी ऐसे कोई पक्के सबूत नहीं हैं कि इससे निकलने वाली गैस लोगों की सेहत को सीधे नुकसान पहुंचाती है, लेकिन इसके तेज धमाकों और आवाज को लेकर चिंताएं जरूर हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बार-बार होने वाली तेज आवाज से परेशानी, तनाव और बेचैनी महसूस हो सकती है। वहीं पशुओं, पक्षियों और जंगली जीवों पर भी इसका असर पड़ने की आशंका जताई जाती है, क्योंकि अचानक होने वाले धमाके उनके सामान्य व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।"

एंटी-हेल गन के विकल्प क्या हैं?

एंटी-हेल नेट (जाल), फसल बीमा, मौसम आधारित चेतावनी प्रणाली और जलवायु-अनुकूल बागवानी तकनीकें फिलहाल किसानों के लिए अधिक भरोसेमंद विकल्प मानी जाती हैं। हिमाचल में बड़ी संख्या में बागवान एंटी-हेल नेट का उपयोग भी कर रहे हैं, हालांकि अत्यधिक मौसम की स्थिति में इनकी भी सीमाएं सामने आती हैं।

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