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World Cancer Day: 2% से भी कम भारतीय महिलाएँ करवा पाती हैं सर्वाइकल कैंसर की जांच

Preeti Nahar | Feb 04, 2026, 10:00 IST
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भारत में प्रजनन अंगों के कैंसर के बढ़ते आंकड़ें एक चिंता का विषय है, खासकर महिलाओं के बीच। 2012 से 2017 के बीच के कुल कैंसर मामलों में 14% प्रजनन कैंसर के थे वहीं महिलाओं में यह प्रतिशत 21.3% तक पहुँच गया। यह स्थिति हमारी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक गंभीर चुनौती है।
<p>World cancer awareness day 2026</p>
Cancer Day: हर साल विश्व कैंसर दिवस एक खास थीम के साथ मनाया जाता है, जिसका मकसद लोगों को यह समझाना है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई सिर्फ डॉक्टरों या अस्पतालों की नहीं, बल्कि पूरे समाज, सरकार और हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। इस दिन जागरूकता फैलाने के लिए सेमिनार, कैंपेन और हेल्थ चेकअप जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस बार की थीम 'United by Unique' है, जिसका मतलब है कि कैंसर से लड़ने की हर किसी की कहानी अलग है, पर हम सब एक मकसद के लिए साथ हैं।

'United by Unique'

इस साल की थीम यह बताती है कि कैंसर से प्रभावित हर व्यक्ति की यात्रा, ज़रूरतें और अनुभव अलग होते हैं, लेकिन हम सब मिलकर एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं। यह थीम यह भी बताती है कि कैंसर सिर्फ एक बीमारी नहीं है, बल्कि यह लोगों की ज़िंदगी, उनके सामाजिक और भावनात्मक अनुभवों का एक मेल है। दुनिया भर के मरीज़, उनकी देखभाल करने वाले, डॉक्टर, शोधकर्ता और परिवार मिलकर इस साझा लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं, ताकि हर व्यक्ति को उसकी ज़रूरत के हिसाब से मदद मिल सके।कैंसर दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक वादा है कि हम शहर और गाँव के बीच स्वास्थ्य की दूरी को कम करेंगे। जब गाँव जागरूक होगा, तभी देश स्वस्थ होगा। कैंसर से लड़ाई अस्पताल में नहीं, बल्कि जानकारी से शुरू होती है, और यह जानकारी हर गाँव तक पहुँचना बहुत ज़रूरी है।

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कैंसर जागरूकता की जरूरत

यह दिन सिर्फ शहरों में ही नहीं, बल्कि गाँवों तक कैंसर के बारे में सही जानकारी, समय पर जाँच और इलाज पहुँचाने का मौका देता है। भारत की ज़्यादातर आबादी गाँवों में रहती है, इसलिए कैंसर से लड़ने में उनकी भूमिका बहुत ज़रूरी है।सर्वाइकल, ओवेरियन और प्रोस्टेट कैंसर क्यों बन रहे हैं बड़ी चुनौतीभारत में कैंसर एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन गया है, खासकर प्रजनन अंगों से जुड़े कैंसर। महिलाओं में गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल), अंडाशय और गर्भाशय का कैंसर, और पुरुषों में प्रोस्टेट, लिंग और वृषण (टेस्टिस) का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है। (Population-Based Cancer Registries – PBCRs) के हालिया शोध बताते हैं कि इन कैंसरों की संख्या बढ़ रही है और इनका बोझ महिलाओं पर ज्यादा है। भारत के अलग-अलग इलाकों में इन कैंसरों के पैटर्न भी अलग-अलग हैं।

महिलाओं में प्रजनन कैंसर अधिक

(Population-Based Cancer Registries – PBCRs) के आंकड़ों पर आधारित है। इस अध्ययन के अनुसार, 2012 से 2017 के बीच भारत में कुल 4,36,223 कैंसर मामले सामने आए। इनमें से लगभग 61,190 मामले, यानी 14%, प्रजनन कैंसर से जुड़े थे। महिलाओं में, कुल कैंसर मामलों में से 21.3% प्रजनन कैंसर थे। वहीं, पुरुषों में यह आंकड़ा 6.9% रहा। यह साफ दिखाता है कि भारत में प्रजनन कैंसर का बोझ महिलाओं पर कहीं ज्यादा है। इसमें 2012 से 2017 के बीच दर्ज कैंसर मामलों का विश्लेषण किया गया। यह शोध पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर प्रजनन कैंसरों की पूरी तस्वीर दिखाता है।

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महिलाओं में कौन-से कैंसर सबसे ज़्यादा?

महिलाओं में प्रजनन कैंसर के मामलों में सबसे बड़ा हिस्सा सर्वाइकल कैंसर (गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर) का है।

सर्वाइकल कैंसर – 48.8%

अंडाशय का कैंसर (ओवेरियन कैंसर) – 28.7%

गर्भाशय का कैंसर (कॉर्पस यूटेरी) – 15.5%

इन तीनों कैंसरों का कुल योगदान महिलाओं के प्रजनन कैंसर मामलों में 90% से अधिक है। चिंता की बात यह है कि सर्वाइकल कैंसर पूरी तरह से रोकथाम योग्य और शुरुआती चरण में इलाज योग्य होने के बावजूद, आज भी भारत में महिलाओं में दूसरा सबसे आम कैंसर बना हुआ है।

कैंसर के बारे में जानकारी की कमी

गाँवों में अक्सर कैंसर का पता देर से चलता है। इसकी वजह है जानकारी की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं का कम होना, लोगों का झिझकना और यह सोचना कि कैंसर का कोई इलाज नहीं है। तंबाकू, शराब और खराब जीवनशैली की वजह से गाँवों में मुँह, फेफड़े, गर्भाशय और स्तन कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं।कैंसर दिवस हमें याद दिलाता है कि सही समय पर जानकारी और जाँच से कैंसर को रोका और ठीक किया जा सकता है।

NFHS-5 के अनुसार, सिर्फ 2% से भी कम भारतीय महिलाएं सर्वाइकल कैंसर की जांच करवा पाती हैं, जबकि यूरोपीय देशों में यह आंकड़ा 40–70% तक है। गाँवों में आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, स्कूल शिक्षक और पंचायतें इस काम में बहुत मदद कर सकती हैं। नुक्कड़ नाटक, ग्राम सभाएँ, स्वास्थ्य कैंप और स्थानीय भाषा में पोस्टर जैसी चीज़ों से लोगों को जागरूक किया जा सकता है।

गाँवों के लिए कुछ खास उपाय हैं:

नियमित स्वास्थ्य जाँच कैंप लगाना,

तंबाकू और नशा छोड़ने के लिए लोगों को साथ लाना,

महिलाओं के लिए स्तन और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की जाँच करवाना,

मोबाइल हेल्थ वैन और टेलीमेडिसिन की सुविधा देना।साथ ही,

कैंसर से ठीक हुए लोगों की कहानियाँ सुनाना ताकि लोगों का डर कम हो।

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