आजादी के 70 साल से भारत के किसानों का कभी न खत्म होने वाला इंतजार 

आजादी के 70 साल से भारत के किसानों का कभी न खत्म होने वाला  इंतजार स्वतंत्रता दिवस पर विशेष- किसानों का इंतजार कब खत्म होगा।

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने एक विशेष सीरीज में किसान और खेती की दशा और दिशा को समझाने की कोशिश की है। ये इस सीरीज का पहला भाग है। दूसरा भाग खबर के अंत में पढ़िए-

"वो सुबह कभी तो आएगी"

जब भी मेरे सामने किसी किसान का चेहरा आता है तो मेरे कानों में राजकपूर की फिल्म का ये पुराना नग़मा गूंजने लगता है । चेहरे पर दर्द और विषाद के भाव स्पष्ट तैरते हुए दिखते हैं । पर जहां राजकपूर ने गीत गाते हुए कहानी का एक खुशनुमा अंत खोज लिया वहीं भारत के किसान चक्रव्यूह के शिकंजे में गहरे धंसते जा रहे हैं।

ये एक अंतहीन इंतज़ार बन गया है। 70 वर्षों से किसान बम्पर फसल उगाने की आस में कड़ी मेहनत करते आए हैं। साल दर साल अच्छी फसल के रिकॉर्ड टूटे हैं लेकिन हर साल किसान परिवार के हालात बद से बदतर ही हुए हैं। देश को कुछ वर्षों पहले अपनी आबादी की एक बड़े भाग को भुखमरी से बचाने के लिए बाहर से सहायता मांगनी पड़ती थी जिसे सामान्यत: 'शिप टु माउथ' यानी 'जहाज से मुंह तक' जैसे-तैसे चलाया गया जीवन कहा जाता था। हमारे हिम्मतवर किसानों ने भुखमरी की कगार से देश को वापस खींचा है। कई लेखकों के अनुसार उस समय की स्थिति सामूहिक मृत्यु की स्थिति बन चुकी थी।

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तत्कालीन खाद्य मंत्री सी. सुब्रमण्यम ने बाद में मुझे बताया कि एक समय ऐसा आ गया था जब देश में मात्र सात दिनों का खाद्य भंडारण बाकी रह गया था। सब ओर हाय तौबा मच गई।बढ़ते हुए खाद्य संकट को देखते हुए शास्त्री जी ने देशवासियों से सोमवार को उपवास करने की अपील की थी।

एक समय पर देश की शान कहलाये जाने वाले किसान आज देश के लिए आर्थिक बोझ बन गए हैं। कृतघ्न देश उनसे जान छुड़ाने के मौके का इंतज़ार कर रहा है। 1965 की बात है जब अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री की बात पर बिफर गए थे। एक अमरीकी अखबार को दिए गए साक्षात्कार में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अमेरिका द्वारा वियतनाम में चलाए गए युद्ध को 'आक्रामकता का कार्य' बताया था पर बात अमेरिका को नागवार गुज़री। एक भूखा राष्ट्र अमेरिका को आक्रमणकारी कैसे कह सकता है? अमेरिका ने भारत को खाद्यान्न भेजने पर पाबन्दी लगा दी और भारत सरकार मुश्किल में पड़ गयी । तत्कालीन खाद्य मंत्री सी. सुब्रमण्यम ने बाद में मुझे बताया कि एक समय ऐसा आ गया था जब देश में मात्र सात दिनों का खाद्य भंडारण बाकी रह गया था। सब ओर हाय तौबा मच गई।

बढ़ते हुए खाद्य संकट को देखते हुए शास्त्री जी ने देशवासियों से सोमवार को उपवास करने की अपील की थी। देश में खाद्य आत्म-निर्भरता लाने में किसानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को समझते हुए उन्होंने जय जवान जय किसान का लोकप्रिय नारा उद्घोषित किया।

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लाल बहादुर शास्त्री जी के दुग्ध संघों के माध्यम से सफ़ेद क्रांति के पश्चात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने एक तरह से स्वयं ही हरित क्रांति के बीज बोये। एक ओर सरकार ने मेक्सिको से ड्वार्फव्हीट की उच्च उत्पादक प्रजाति आयात की तो दूसरी ओर सिंचाई एवं रासायनिक खाद और कीटनाशक जैसी बाह्य सुविधाएं उपलब्ध करवाई । बाकी काम किसानों ने संभाल लिया। 1967 में हरित क्रांति के बाद की पहली फसल की पैदावार पिछली पैदावार से रिकॉर्ड पांच मिलियन टन अधिक थी। तब से देश ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

खाद्यान्न के लिए आयात पर निर्भर देश अब स्वावलम्बी है लेकिन जो बात जगजाहिर नहीं है वो है सरकार द्वारा किसानों को उपलब्ध कराया गया आर्थिक प्रोत्साहन।1970 में जब सरकारी शिक्षक की तनख्वाह 90 रू प्रतिमाह थी तब गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रू प्रति क्विंटल था। नीति निर्धारकों की ये बात सराहनीय है कि किसानों के लिए सुनिश्चित कीमत में इजाफा करके और साथ में सुनिश्चित बाजार (भारतीय खाद्य निगम की स्थापना के माध्यम से) उपलब्ध करवाकर उन्होंने भुखमरी की आशंका समाप्त करने की रणनीति तैयार कर ली थी । जिस देश ने ब्रिटिशकाल के दौरान 28 अकाल देखे थे उसके लिए इतना बड़ा बदलाव किसानों की हिम्मत से ही संभव हो पाया था।

सभी प्रकार की भविष्यवाणियों को धता बताते हुए भुखमरी भारत में बीते इतिहास का हिस्सा बन गई थी। किसानों का ये श्रेष्ठकाल कोई पंद्रह साल तक था। हालांकि हरित क्रांति का लाभ छोटे किसानों को नहीं मिल पाया था फिर भी समृद्धि की एक खुशनुमा तस्वीर पेश करने की कोशिश की गयी थी। एक आधुनिक किसान की ट्रैक्टर चलते हुए तस्वीर को समृद्धि के द्योतक की तरह प्रस्तुत किया गया था। वास्तव में, उत्पादन में बढ़त के फलस्वरूप खेती से आय में बढ़ोतरी नहीं हो पायी थी। आगे आने वाली सरकारें उत्पादन में वृद्धि से संतुष्ट थी पर किसान समुदाय अवहेलित रह गया। सार्वजनिक क्षेत्र में निवेशक न होने के साथ- साथ 1980 के मध्य तक खेती का हाल भी बद से बदतर होने लगा।

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मुझे याद है 1983 -84 में जब पंजाब और हरियाणा, जिन्हें भारत के फ़ूड बाउल के नाम से जाना जाता था, वहां से खाद्यान्न की कम खरीद हो पाई थी तो इंदिरा गांधी प्लेन से चंडीगढ़ पहुंच गई थी। वो इस बात से स्पष्ट रूप से खफा थी और एयरपोर्ट पर ही उन्होंने ये बात पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों दरबारा सिंह और भजनलाल को जतला दी थी। खाद्यान्न के खरीद के लक्ष्य पूरे न होने पर वह अत्यंत नाराज़ हुई थी।

इसके बाद ही गिरावट का दौर शुरू हुआ। 1991 में वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूटीओ) की स्थापना के बाद से आत्म संतुष्ट राष्ट्र का ध्यान खेती से हटने लगा। इसी समयावधि में यूरोप और अमेरिका भी खाद्यान्न, दूध और मक्खन के आधिक्य भंडार एकत्र कर रहे थे और आर्थिक सोच वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर केंद्रित हो गई जिसके कारण आयात की दरें घटाकर सस्ते आयात पर ज़ोर दिया जाने लगा। इसी समय खाद्य पदार्थों में महंगाई को नियंत्रण में रखने का समस्त बोझ किसानों के कन्धों पर डाल दिया गया। खेती से प्राप्त उत्पादों की मुख्य की कीमतें वैश्विक स्तर पर स्थिर बनी रही । यूएनसीटीएडी के एक अध्ययन के अनुसार 1990 से 2010 की 20 साल की अवधि के दौरान उत्पादक मूल्यों (फार्म गेट मूल्य) में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

तबसे यही निराशाजनक प्रवृत्ति जारी है।

शेष अंश यहां पढ़ें- भाग दो- अपने हक की‍ आय भी नहीं मिलती किसानों को

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके निजी विचार हैं। ट्विटर हैंडल @Devinder_Sharma ) उनके सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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