कृषि बिलों का किसानों की आय में सुधार से कोई लेना-देना नहीं है: ICCFM

कृषि बिलों का किसानों की आय में सुधार से कोई लेना-देना नहीं है जिनमें से 80% से अधिक छोटे और सीमांत किसान हैं। इसके बजाय वे कृषि व्यवसाय को सशक्त करेंगे और हमारे खाद्य प्रणालियों पर कॉर्पोरेट नियंत्रण को बढ़ाएंगे, जिससे किसानों और उपभोक्ताओं के लिऐ न्याय की गुंजाइश नहीं रहेगी। भारतीय किसान आंदोलनों की समन्वय समिति के राष्ट्रीय समन्वयक युधवीर सिंह का लेख

Farmers Agitation,Farmers Bill 2020, (Farmers Agitation,Farmers Bill 2020, farmers protestकिसान विधेयकों के विरोध में 25 सितंबर को किसान विरोध प्रदर्शन करेंगे।

देश के कई अन्य किसान संगठनों के साथ-साथ ICCFM (भारतीय किसान आंदोलनों की समन्वय समिति, संगठन) भी किसान विरोधी बिलों के बारे में गंभीर रूप से चिंतित है, जो किसी भी संसदीय चर्चा के बिना किसी भी किसान संगठनों के साथ परामर्श के बिना अलोकतांत्रिक तरीके से अध्यादेश के आपातकालीन उपाय के माध्यम से अचानक लाये गए हैं। हम इन बिलों को लाने की प्रक्रिया और सार दोनों का विरोध करते हैं।

हम किसान पिछले चार दशकों से उचित और पारिश्रमिक मूल्य की मांग कर रहे हैं। भाजपा सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का चुनावी वादा किया था। उस वादे को पूरा करने के बजाय किसानों को उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए सरकारों की जिम्मेदारी को समाप्त करने के लिए पारित किए गए इन बिलों के द्वारा हमें थप्पड़ मारा जा रहा है।

पूरी तरीके से देखा जाये तो इन बिलों का किसानों की आय में सुधार से कोई लेना-देना नहीं है जिनमें से 80% से अधिक छोटे और सीमांत किसान हैं। इसके बजाय, वे कृषि व्यवसाय को सशक्त करेंगे और हमारे खाद्य प्रणालियों पर कॉर्पोरेट नियंत्रण को बढ़ाएंगे, जिससे किसानों और उपभोक्ताओं के लिऐ न्याय की गुंजाइश नहीं रहेगी।

ICCFM किसान आंदोलनों का एक अ-राजनैतिक राष्ट्रीय गठबंधन है जो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु, हरियाणा और पंजाब के 12 किसान संगठनों का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय किसान यूनियन, कर्नाटक राज्य रायतु संघ और तमिल व्यावसायिक संघम प्रमुख किसान आंदोलनों में से हैं।

हम नीचे संक्षिप्त रूप में इन बिलों में से प्रत्येक पर अपना विरोध प्रकट करते हैं: -

1. किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक, 2020

यह बिल 'वन कंट्री, टू मार्केट्स' दृष्टिकोण के जरिए एपीएमसी (APMC) सिस्टम को धीरे-धीरे खत्म करने के लिए बनाया गया है। सरकार जोर देकर कह रही है कि एपीएमसी प्रणाली अभी भी बनी रहेगी और यह बिल बिना व्यापार और करों के केवल एक अतिरिक्त 'व्यापार क्षेत्र' का निर्माण कर रही है, लेकिन, जब दो अलग और समानांतर मार्केटिंग सिस्टम बनाए जाते हैं, एक विनियमन और करों के साथ और एक बिना उसके तो यह स्पष्ट है कि निजी खिलाड़ी, एजेंट और व्यापारी बाद के सिस्टम का चयन करेंगे, जो समय के साथ - साथ एपीएमसी को निरर्थक बना देगा।

यह अपने आप में एपीएमसी की धीमी मौत को जन्म देगा। आज तक एपीएमसी के अस्तित्व के बावजूद एपीएमसी के भीतर केवल 36% उत्पादन का कारोबार होता था। देश भर में मंडियों की भारी कमी है। हम सहमत हैं कि इन एपीएमसी की कई समस्याएं हैं, लेकिन इन्हें सुधारा जाना चाहिए था।

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एपीएमसी मॉडल ने पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में किसानों के लिए अच्छा काम किया है। यह मौजूदा कमियों में सुधार के साथ विभिन्न फसलों के लिए देश भर में दोहराया जा सकता था, जहां किसानों को गारंटी के साथ एमएसपी (MSP) प्रदान किया जाता। कम से कम एपीएमसी में हम किसान विभिन्न प्रकार के शोषण के खिलाफ संगठित करके अपना बचाव कर सकते थे। यह अनियमित व्यापार क्षेत्रों के मामले में नहीं होगा। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि एमएसपी से ऊपर की कीमतों का भुगतान इन अनियमित बाजारों में किया जाएगा।

बिहार के मौजूदा उदाहरण को देखते हुए जहां 2006 में एपीएमसी को बहुत धूमधाम के साथ हटाया गया था। एक दशक बाद हम देखते हैं कि किसानों को एमएसपी की तुलना में बहुत कम दाम मिले हैं। इसलिए, हम मांग करते हैं कि पारिश्रमिक की कीमत का अधिकार हमारी गारंटी है और पूर्ण अनियमित बाजारों को अनुमति नहीं मिले।

2. आवश्यक वस्तु अधिनियम (संशोधन) बिल 2020

यह बिल निजी खिलाड़ियों और कृषि व्यवसाय कंपनियों को जमाखोरी और बाजार में हेरफेर की अनुमति देगा। सरकार का दावा है कि इस बिल से फसल कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ेगा और किसानों की आय में सुधार होगा। पर इस बिल के पहले भी किसानों पर स्टॉक होल्डिंग के लिए कोई प्रतिबंध नहीं था। खाद्यानों के जमाखोरी और सट्टेबाजी को रोकने के लिए सिर्फ निजी संस्थाओं पर सीमाएं और नियंत्रण था।

किसानों के नाम पर यह बिल अडानी और रिलायंस जैसी कृषि व्यवसायी कंपनियों को कम कीमत पर हमारी सारी उपज खरीदने या इससे भी बदतर दूसरे देशों से आयात करने और बड़ी मात्रा में स्वतंत्र रूप से जमा करने में मदद करेगा क्योंकि भंडारण की कोई सीमा नहीं होगी। वे आसानी से बाजारों में हेरफेर कर सकते हैं और ऐसे बड़े भंडारण के साथ बड़ा मुनाफा कमा सकते हैं, जिनके बारे में सरकार को कोई जानकारी भी नहीं होगी। देशभर में गरीबों को खाद्य कीमतों में इस तरह के जमाखोरी, सट्टेबाजी और उतार-चढ़ाव के कारण सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा। सरकार स्पष्ट रूप से बड़े निजी खिलाड़ियों/व्यापारियों के हितों की रक्षा कर रही है और वही सबसे अधिक लाभान्वित होंगे।

3. किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा विधेयक समझौता 2020

भारत के अधिकांश किसान छोटे और सीमांत जोत वाले हैं जिनमें से कई अनपढ़ हैं। भारत में किसानों के साथ अनुबंध खेती की व्यवस्था ज्यादातर अलिखित है और इसलिए अमल में नहीं लिया जा सकता है। जब वे लिखे जाते हैं तब भी हमेशा किसान समझ नहीं पाते हैं कि उन समझौतों में क्या लिखा है। एक बड़ी कंपनी की तुलना में व्यक्तिगत किसान अभी भी कमजोर हैं।

इस तरह के अनुबंध अक्सर बाजार उन्मुख वस्तुओं की ओर केंद्रित होते हैं जिन्हें गहन खेती की आवश्यकता होती है साथ ही साथ पारिस्थिति की से समझौता करते हैं। साक्ष्य से पता चलता है कि "प्रायोजक" कई छोटे और सीमांत किसानों के साथ सौदा पसंद नहीं करते हैं और केवल मध्यम और बड़े किसानों के साथ काम करने में रुचि रखते हैं। जब ऐसे खिलाड़ी अनुबंध को पूरा नहीं करते हैं, तो किसानों के पास उन्हें विवाद में घसीटने की कोई क्षमता नहीं है, खासकर जब ज्यादातर अनुबंध अलिखित और अप्राप्य हैं। यह बिल पूरे अनुबंध को स्वैच्छिक बनाता है, यह भी अनिवार्य नहीं है कि लिखित और औपचारिक समझौते किए जाएं।

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विधेयक का किसानों को सशक्त बनाने से कोई लेना-देना नहीं है। यह केवल उन्हें और कमजोर करेगा। इस बिल में एक तथाकथित "प्रोडक्शन एग्रीमेंट" प्रत्यक्ष कॉर्पोरेट खेती की अनुमति देने के लिए एक प्रॉक्सी मार्ग है, जो किसानों को अपने स्वयं के खेतों में मजदूर बना देता है। जो सटीक मानकों को पूरा करने के लिए किसानों पर बिना किसी न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी के बिना कठोर मांग करता है। यह खण्ड कॉरपोरेट्स की सुरक्षा के लिए तीसरे पक्ष के प्रवर्तन के लिए अनुमति देगा।

सरकार द्वारा पारित नये कानून भारतीय कृषि और इससे जुड़े करोड़ों लोगों को नष्ट कर देंगे। यह कदम संपूर्ण कृषि क्षेत्र को बड़े कृषि व्यावसायिकों को सौंपने की सुविधा प्रदान करेगा। यह किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को समाप्त करने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पूरी तरह से नष्ट करने, बेईमान व्यापारियों को बढ़ावा देने और खाद्य पदार्थों को जमा करने के लिए विशाल निगमों (कार्पोरेशनों) को बढ़ावा देगा। जिससे बाजार में कृत्रिम रूप से भोजन की कमी पैदा होगी और अनियमित कीमतें बढ़ेंगी। इन कानूनों से भारत की खाद्य संप्रभुता और सुरक्षा को गंभीर खतरा है। किसानों को अपनी उपज की कीमत तय करने की आजादी की जरूरत है न कि अपनी उपज को बड़े कॉर्पोरेट्स को बेचने की आजादी।

हम सभी किसानों और नागरिकों से 25 तारीख को भारत बंद में शामिल होने के लिए अपना विरोध और एकजुटता दिखाने का आह्वान करते हैं। किसानों को बचाने और राष्ट्र की खाद्य संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एकजुट हों।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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