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'कोरोना वायरस से ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी होगी धराशायी'

Pushpendra SinghPushpendra Singh   26 March 2020 8:45 AM GMT

23 दिसंबर को पूरे भारत में मनाया जाता है राष्ट्रीय किसान दिवस। फोटो- अरविंद शुक्ला

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से विश्व भर में अब तक लगभग पांच लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं। 21 हज़ार से ज्यादा लोग अपनी जान गवां चुके हैं। भारत में भी अब तक इसके 600 से ज़्यादा मरीजों की पुष्टि हो चुकी है। देशव्यापी तीन सप्ताह का लॉकडाउन घोषित कर दिया गया है। पूरा विश्व तेजी से लॉकडाउन की तरफ बढ़ रहा है। शेयर बाज़ारों में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। रुपया गिरकर 76 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया है। औद्योगिक उत्पादन, निर्माण, पर्यटन, परिवहन, सेवा व अन्य क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। वैश्विक मांग, व्यापार और अर्थव्यवस्था पर बहुत ही नकारात्मक असर पड़ रहा है।

इस वायरस से हमारे ग्रामीण क्षेत्रों पर भी प्रभाव पड़ेगा। इस साल रबी की फ़सलों का बंपर उत्पादन होने का अनुमान है। सरसों, मटर, चना, प्याज़, आलू आदि फ़सलों की आवक बाज़ार में शुरू हो चुकी है। परन्तु कोरोना वायरस से बाज़ार में एक नकारात्मकता फैल गई है। चने के दाम गिरकर 3,650 रुपए प्रति कुंतल पर आ गए हैं, जबकि चने की एमएसपी 4,875 रुपए प्रति कुंतल है। सरसों के दाम गिरकर 3,600 रुपए प्रति कुंतल पर आ गए हैं जबकि सरसों की एमएसपी 4,425 रुपए प्रति कुंतल है। कपास की कीमत भी मंडियों में एमएसपी से 1000 रुपए प्रति क्विंटल तक नीचे चल रही है।

सभी देशों का आपसी आयात-निर्यात बहुत कम हो गया है। इसका प्रभाव हमारे देश में सोयाबीन, सरसों व अन्य तिलहनी फ़सलों के दामों पर भी पड़ा और इनके दाम गिर गए। हमारे चावल, कपास, रबर, मांस व अन्य कृषि जिंसों के निर्यात और कीमतों पर दबाव बढ़ गया है। हमारी चायपत्ती के बड़े आयातक ईरान और चीन ने हमारे देश से चायपत्ती का आयात भी रोक दिया है। इससे चायपत्ती के दाम 40 प्रतिशत तक गिर चुके हैं।

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चिकन से कोरोना वायरस फैलने की झूठी अफवाहों से चिकन की मांग में भी भारी कमी आई है। उपभोक्ता मांस, मछली, चिकन, अंड़े आदि से परहेज कर रहे हैं। इस कारण चिकन व अन्य मांस उत्पादों के दामों में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। इस साल मुर्गीपालन करने वाले हमारे किसानों को भारी नुकसान होने की संभावना है। एक लाख करोड़ रुपए के मुर्गीपालन और पोल्ट्री उद्योग पर लगभग दो करोड़ लघु और सीमांत किसान निर्भर हैं।

मक्का और सोयाबीन का इस्तेमाल मुख्यतः पोल्ट्री फीड के रूप में होता है। पोल्ट्री उत्पादों की मांग घटने से मक्का और सोयाबीन के दाम भी गिरे गए हैं, जिससे इनकी खेती करने वाले किसानों को नुकसान होगा। इसी प्रकार हमारे अन्य मांस उत्पादों, मत्स्य उत्पादों, सीफूड, झींगा आदि की मांग और निर्यात पर भी प्रभाव पड़ रहा है, जिससे इनके उत्पादक किसानों की आमदनी भी प्रभावित हो रही है। भारत मांस का एक प्रमुख निर्यातक है परन्तु आयातक देशों द्वारा आयात पर प्रतिबंध लगाने के कारण किसानों के बेकार पशुओं की कीमतें भी कम हो रही हैं।

आपूर्ति बाधित और मांग कम होने के कारण किसान स्तर पर दूध की कीमतें भी गिरने लगी हैं जिससे दुग्ध उत्पादक किसानों को नुकसान हो रहा है। होटल, भोजनालय, मंदिर आदि बंद होने, शादियों व अन्य समारोहों के स्थगन के कारण फल, सब्ज़ियों, मसालों, गेहूँ, चावल, दूध, आदि खाद्य पदार्थों की मांग तेजी से गिर रही है। इन परिस्थितियों में फूलों की मांग भी लगभग समाप्त हो गई है, इससे फूलों की खेती करने वाले किसानों को भारी नुकसान हो रहा है।

अच्छी पैदावार के बावजूद खाद्य पदार्थों की वितरण व्यवस्था बाधित हो रही है। लॉकडाउन के दौरान आवश्यक सेवाओं को ज़ारी रखने का आदेश है, फिर भी बड़े पैमाने पर आवश्यक खाद्य सामग्री ढो रहे वाहनों को भी बेवजह रोका जा रहा है। राज्यों की सीमाओं पर वाहनों की लंबी कतारें लग गई हैं। वाहन चालक और उनके सहयोगी कर्मचारियों को भोजन, पानी की किल्लत हो रही है। ढाबे आदि भी बंद करवा दिए गए हैं। ऐसे में ये लोग किस प्रकार अपना काम कर सकते हैं। इस कारण चालक वाहनों को लेकर चलने से मना कर रहे हैं। इस सख्ती और दुर्व्यवहार के कारण कुछ चालक अपने गांव भी पलायन कर चुके हैं।

ऑनलाइन होम डिलीवरी करने वाली कंपनियों की शिकायत है कि उनके कुछ गोदाम बंद करवा दिए गए हैं। उनके कर्मचारियों को होम डिलीवरी करते वक्त जगह-जगह पर दुर्व्यवहार कर रोका जा रहा है। इसका असर अंत में किसानों पर ही पड़ेगा क्योंकि उनके कृषि उत्पाद उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच पाएंगे। यदि तत्काल वितरण व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो भयंकर दुष्परिणाम होंगे। इस प्रकार की अनेक बाधाओं और बाज़ारों के बंद होने के कारण आपूर्ति ना होने के कारण भी मांग और गिरेगी। इससे कृषि उत्पादों की मांग और दाम दोनों घट जाएंगे।

विभिन्न उद्यमों के बंद होने के कारण बेरोजगारी बढ़ेगी, लोगों की आमदनी और क्रय-शक्ति घटेगी। परन्तु खाद्य पदार्थों की आपूर्ति बाधित होने, ज़रूरत से ज़्यादा संग्रह करने, स्थानीय विक्रेताओं द्वारा मुनाफाखोरी और कालाबाजारी के कारण बाज़ार में खाद्य सामग्री, फल और सब्जियां उपभोक्ता स्तर पर महंगी भी हो सकती हैं।

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों के प्रभावित होने और तेल उत्पादक देशों के बीच तेल को लेकर प्राइस वॉर छिड़ने से कच्चे तेल की कीमतें गिर गई हैं। इसका हमें लाभ होगा क्योंकि हम अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करते हैं। 2018-19 में हमने 112 अरब डॉलर (आज के मूल्यों में लगभग 8.40 लाख करोड़ रुपए) मूल्य के कच्चे तेल का आयात किया था।

कच्चे तेल के दाम गिरकर 25-30 डॉलर प्रति बैरल पर आ गए हैं। यदि यही स्तर रहा तो भारत को एक साल में लगभग 50 अरब डॉलर (लगभग 3.75 लाख करोड़ रुपए) का लाभ होगा। इससे हमें अपने चालू खाता घाटे और राजकोषीय घाटे को कम करने में भी मदद मिलेगी। सरकार के पास ग्रामीण क्षेत्रों की योजनाओं पर खर्च करने के लिए अधिक धन भी उपलब्ध होगा। डीज़ल, पेट्रोल, खाद सहित पेट्रोलियम क्षेत्र के अन्य उत्पादों के दाम भी कम होंगे।

भारत में असंगठित क्षेत्र में 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग काम करते हैं। शहरों में छोटे-मोटे काम करने वाले इन लोगों की आमदनी घटने, काम बंद होने, नौकरी जाने या मज़दूरों को काम ना मिलने के कारण ये लोग शहरों से गांवों की ओर पलायन करेंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले बाहर के मज़दूर भी

बीमारी के डर से पलायन कर रहे हैं। इस कारण गन्ने की छोल, अन्य रबी फ़सलों की कटाई, और अप्रैल में शुरू होने वाली गेहूँ की कटाई भी प्रभावित हो सकती है।

पलायन कर रहे दिहाड़ी मज़दूरों पर यह बहुत बड़ा संकट होगा। ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था, किसानों और मजदूरों को राहत देने के लिए सरकार को पीएम-किसान योजना के अंतर्गत राशि को 6,000 रुपए से बढ़ाकर 24,000 रुपए प्रति किसान परिवार प्रति वर्ष कर सारी राशि का एकमुश्त भुगतान तत्काल कर देना चाहिए। इससे एक तो ग्रामीण इलाकों में पलायन करने वाले अतिरिक्त लोगों को रोजगार मिलने में आसानी होगी। दूसरे, मांग बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था मंदी से जल्द बाहर निकल सकती है। देश को राजकोषीय घाटे की चिंता छोड़कर इस असामान्य परिस्थिति में असामान्य कदम उठाने होंगे।

ऐसी आपदा के वक्त खाद्यान्न उपलब्धता सरकार की सबसे

बड़ी चिंता होती है। शुक्र है कि भारतीय खाद्य निगम के पास बफर स्टॉक से भी 3.5 गुना ज्यादा लगभग 7.75 करोड़ टन का खाद्यान्न- गेहूँ और चावल के भंडार उपलब्ध है। एक महीने बाद गेहूँ की बम्पर लगभग 10 करोड़ टन फ़सल भी बाज़ार में और आ जायेगी। गोदामों के पहले से ही भरे होने के कारण इस फ़सल की खरीद और भंडारण सरकार के लिए बड़ी चिंता का विषय था।

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परन्तु अब सरकारें राशन कार्ड धारकों को पात्रता से अधिक कई महीनों की खाद्य सामग्री अग्रिम रूप से एक साथ वितरित करने का निर्णय ले रही हैं। इसके अलावा मुफ्त खाद्यान्न भी उपलब्ध करवाने के निर्णय लिए जा रहे हैं जिससे कोई भूखा ना रहे। इससे देश में अत्यधिक खाद्यान्न भंडार होने की समस्या का भी हल हो जाएगा। नाफेड के पास 22.5 लाख टन का दालों का स्टॉक भी मौजूद है। रबी की दालों- चना, मसूर और मटर की आवक भी जारी है। दूध और चीनी की भी कोई कमी नहीं है। अपनी आवश्यकता का दो-तिहाई खाद्य तेल हम आयात करते हैं, इसमें भी अभी कोई समस्या नहीं है। यदि लॉकडाउन लंबा भी चला तो भी जनता को खाद्यान्नों व अन्य खाद्य पदार्थों की कमी नहीं होगी।

इस आपदा में देश में खाद्यान्न की भरपूर उपलब्धता सरकार और नागरिकों के लिए एक बड़ी ही राहत की खबर है। रबी की फ़सलों की समय पर खरीद, भंडारण और खाद्य पदार्थों का वितरण बहुत ही सुचारू रूप से करने की आवश्यकता है, अन्यथा किसानों, उपभोक्ताओं और देश को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष है)

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