'किसानों पर मौसम की मार, फ़सल बीमा योजना को बनाना होगा और प्रभावी'

Pushpendra SinghPushpendra Singh   14 March 2020 9:30 AM GMT

किसानों पर मौसम की मार, फ़सल बीमा योजना को बनाना होगा और प्रभावी

हाल में पूरे उत्तर भारत में बेमौसम बारिश, आंधी और ओलावृष्टि के कारण बहुत बड़े क्षेत्र में फसलों की बर्बादी हुई है। यह रबी की फ़सलों की कटाई और बाज़ार में आवक का समय है। गेहूँ, सरसों, चना, आलू आदि फ़सलों का बड़े पैमाने पर नुकसान होने की खबरें आ रही हैं। किसानों को इस वर्ष अच्छी फ़सल होने और अच्छे दाम मिलने की पूरी उम्मीद थी। परन्तु अब किसान फ़सलों को हुए नुकसान के आंकलन और उचित बीमा राहत, नुकसान के दावों के भुगतान और मुआवजे के लिए परेशान हैं। इन हालातों में 'प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना' पुनः चर्चा में आ गई है।

2016-17 में केन्द्र सरकार ने इस नई योजना की घोषणा की थी। इस योजना में प्रतिकूल मौसम के कारण बुवाई बाधित होने या फ़सल को सूखे, बाढ़, तूफान, ओलावृष्टि आदि से हुए नुकसान की आर्थिक भरपाई करने का प्रावधान है। हमारे देश में कुल 14 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से लगभग 55 प्रतिशत रकबा अब भी असिंचित है। हर साल औसतन 1.25 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में फसलें किसी न किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हो जाती हैं। इस कारण करोड़ों किसानों की आय और आजीविका प्रभावित होती है। 2018-19 में इस योजना के अंतर्गत 5.64 करोड़ किसानों का पंजीकरण कर 30 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में 2.35 लाख करोड़ रुपए का फ़सलों का बीमा किया गया। आगामी वित्त वर्ष के लिए इस योजना में केन्द्र सरकार ने 15,695 करोड़ रुपए का बजट आवंटन किया है।

यह एक सराहनीय योजना है, परन्तु कई तरह की शिकायतें आने के बाद केन्द्र सरकार ने पिछले दिनों इस योजना में कई बदलाव किये हैं। इन संशोधनों से पहले इस योजना में संस्थागत ऋण लेने वाले किसानों को अनिवार्य रूप से फ़सल बीमा देने का प्रावधान था। इस विषय में किसानों की शिकायत थी कि बगैर उनकी सहमति के आवश्यकता ना होने पर भी उन्हें फ़सल बीमा दिया जा रहा है और बिना सूचना के उनके खाते से प्रीमियम की राशि भी काट ली जाती है। अक्सर उन्हें अपनी फ़सल का बीमा होने की जानकारी भी नहीं होती और ना ही उन्हें बीमा संबधी कोई कागज़ात या बीमा पॉलिसी दी जाती है। अतः किसान बीमा होते हुए भी इसके लाभ से वंचित रह जाते थे।

अब आगामी खरीफ सीजन से इस योजना के अंतर्गत बीमा लेना स्वैच्छिक कर दिया गया है। इस योजना में सरकार ने यह एक बड़ा सुधार कर दिया है। परन्तु इस योजना के अंतर्गत पंजीकृत किसानों में से अभी लगभग 58 प्रतिशत किसान ऋणी किसान ही हैं। अब सरकार को यह देखना होगा कि स्वैच्छिक होने के कारण यदि इस योजना में किसानों की संख्या कम होती है तो कहीं बीमा कंपनियां अपना प्रीमियम अनावश्यक रूप से बढ़ा ना दें।


इस योजना के अंतर्गत खरीफ सीजन की फ़सलों के लिए बीमा राशि का दो प्रतिशत, रबी सीजन की फ़सलों के लिए डेढ़ प्रतिशत और वाणिज्यिक व बागवानी फ़सलों के लिए पांच प्रतिशत प्रीमियम राशि किसानों द्वारा देय है। बाकी प्रीमियम राशि का भुगतान राज्य तथा केन्द्र सरकार को बराबर-बराबर करना होता है। इस विषय में अब केन्द्र सरकार ने एक और सुधार करते हुए अपने हिस्से के प्रीमियम की राशि को गैर-सिंचित क्षेत्रों के लिए अधिकतम 30 प्रतिशत प्रीमियम तक और सिंचित क्षेत्रों के लिए अधिकतम 25 प्रतिशत प्रीमियम तक ही सीमित करने का निर्णय लिया है। उदाहरण के लिए, पहले यदि गैर-सिंचित क्षेत्र की किसी खरीफ़ की फ़सल का एक लाख रुपए का बीमा और प्रीमियम 40 प्रतिशत होता तो 40 हज़ार रुपए का प्रीमियम बनता। इसमें से किसान उपरोक्त बीमा राशि एक लाख रुपए के दो प्रतिशत के हिसाब से दो हज़ार रुपए देता, बाकी 38 हज़ार का केन्द्र व राज्य सरकार बराबर-बराबर यानी उन्नीस-उन्नीस हज़ार रुपए का प्रीमियम भुगतान बीमा कंपनी को करते।

परन्तु अब केन्द्र सरकार ने केवल 30 प्रतिशत तक ही बराबर सहभागिता करने का निर्णय लिया है अतः अब किसान को पहले की तरह दो हज़ार रुपए, केन्द्र सरकार को 14 हज़ार रुपए और राज्य सरकार को 24 हज़ार रुपए देने होंगे। इस प्रकार 30 प्रतिशत से ज़्यादा प्रीमियम होने पर अतिरिक्त राशि के भुगतान की केवल राज्य सरकार की ही ज़िम्मेदारी होगी। यानी केन्द्र सरकार अब अधिकतम 14 प्रतिशत तक ही प्रीमियम का भुगतान करेगी, जो इससे पहले असीमित होता था।

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2018-19 में राष्ट्रीय स्तर पर फ़सलों का औसत प्रीमियम लगभग 12.32 प्रतिशत रहा। इसको देखते हुए 30 प्रतिशत प्रीमियम की सीमा कम भी नहीं है और इस सीमा में अधिकांश फ़सलों का बीमा आसानी से हो जायेगा। कभी-कभी अपरिहार्य कारणों से इससे ज़्यादा प्रीमियम भी हो सकता है परन्तु केन्द्र सरकार द्वारा एक सीमा तक ही प्रीमियम वहन करने के निर्णय से कंपनियों की अत्यधिक प्रीमियम वसूलने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगेगा। ऋणी किसान को अनिवार्य बीमा देने से कंपनियों को कम जोखिम वाली फ़सलों से भी प्रीमियम की बड़ी राशि बैठे-बिठाए मिल जाती थी। परन्तु अब स्वैच्छिक होने के कारण केवल उन्हीं किसानों से प्रीमियम मिलेगा जिनकी फ़सलों को वास्तविक जोखिम होगा। इस कारण कंपनियां बहुत सोच समझ कर ही इस क्षेत्र में काम करेंगी।

एक अन्य सुधार करते हुए केन्द्र सरकार ने अब अपने क्षेत्र और फ़सलों के अनुसार जोखिम कारकों को देखकर बीमा लेने की सुविधा भी दी है। अब किसान उन्हीं आपदाओं के लिए बीमा ले सकते हैं जिनसे उनके क्षेत्र में नुकसान होने की ज़्यादा संभावना रहती है। उदाहरण के लिए जिन क्षेत्रों में बाढ़ का प्रकोप होने की संभावना ज्यादा रहती है, परन्तु सूखे की बहुत कम, वहां के किसान केवल बाढ़ के लिए ही बीमा ले सकते हैं। उन्हें सभी तरह के कारकों के लिए बीमा लेने और प्रीमियम भरने की आवश्यकता नहीं है। अतः जोखिम कारक कम होने से प्रीमियम राशि भी कम होने की आशा है।

किसानों की शिकायत रहती है कि आपदा के समय उनकी फ़सलों के नुकसान का त्वरित आंकलन और दावों का जल्द भुगतान होना अति आवश्यक है। परन्तु बीमा कंपनियां ना तो दावों का सही आंकलन करती हैं और ना ही समय से दावों का भुगतान। इससे फ़सलों का नुकसान अक्सर और ज्यादा हो जाता है। उदाहरण के लिए हाल में खुदाई के लिए तैयार आलू के खेतों में बारिश का पानी भर गया। अब किसान यदि आलू के नुकसान का आंकलन होने तक इंतज़ार करें तो ज़मीन में आलू सड़ जायेगा, जिससे नुकसान और बढ़ जाएगा। यदि सर्वे से पहले ही खुदाई कर लें तो नुकसान का आंकलन उचित प्रकार नहीं हो सकेगा। सरकार ने अब सुधार करते हुए फ़सलों के नुकसान के त्वरित आंकलन एवं दावों के भुगतान हेतु अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग करने का प्रावधान किया है। इस विषय में 'फ़सल कटाई प्रयोग' एवं उपज के नतीजों में पारदर्शिता लानी होगी। इसके सारे प्रावधान और बीमा दावों के भुगतान की शर्तों को किसानों को लिखित रूप में स्थानीय भाषा में उपलब्ध कराना आवश्यक है। बीमा पॉलिसी को वेबसाइट पर और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किसानों को उपलब्ध करवाया जाना चाहिए।

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केन्द्र सरकार ने उत्तर-पूर्व के राज्यों में फ़सल बीमा को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रीमियम भुगतान की राशि के हिस्से को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 90 प्रतिशत कर दिया है। इससे एक तो उन राज्यों पर बहुत अधिक आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा और दूसरा फ़सल बीमा का लाभ भी अधिकांश किसानों तक पहुंच जाएगा। इसके अलावा सरकार सभी हितधारकों के परामर्श कर ज्यादा जोखिम और अधिक प्रीमियम वाले क्षेत्रों और फसलों के लिए अलग योजना भी तैयार करेगी।

कुछ राज्य सरकारें बीमा कंपनियों को अपने हिस्से के प्रीमियम भुगतान में विलंब कर देती हैं। इस कारण भी किसानों को अपने नुकसान के दावों का भुगतान नहीं हो पाता। इसमें अब सुधार करते हुए सरकार ने खरीफ़ सीज़न के लिए अगले साल 31 मार्च और रबी सीजन के लिए अगले साल 30 सितम्बर तक प्रीमियम भुगतान की अंतिम तिथि का प्रावधान किया है। इस तिथि तक भुगतान करना अनिवार्य होगा, ऐसा ना करने पर अगले सीज़न से उस राज्य में यह योजना कार्यान्वित नहीं होगी। इस प्रावधान से आशा है कि किसानों को अपने दावों का भुगतान अब समय से हो सकेगा।

प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना में 2016-17 से 2018-19 के बीच तीन वर्षों में सभी पक्षों द्वारा कुल 76,331 करोड़ रुपए का प्रीमियम का भुगतान कंपनियों को किया गया है। इस अवधि में किसानों को 60,000 करोड़ रुपए का बीमा दावों का भुगतान किया गया। प्रीमियम और दावों के भुगतान के आंकड़े बता रहे हैं कि उपरोक्त सुधारों को यदि ठीक नियत से ज़मीन पर उतारा जाए तभी किसानों के लिए यह एक सफल योजना साबित होगी।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)


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