ज़मीनी हकीकत : बंद करनी होगी कॉर्पोरेट टैक्स में छूट की परंपरा

ज़मीनी हकीकत : बंद करनी होगी कॉर्पोरेट टैक्स में छूट की परंपराकॉरपोरेट टैक्स और किसान

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय ने एक बयान देकर विवादों को हवा दे दी है। अपने बयान में उन्होंने कहा, जीडीपी के 5 पर्सेंट जितना राजस्व कॉर्पोरेट टैक्स छूट की भेंट चढ़ गया है। देबरॉय ने यह भी जोड़ा कि जब तक इस तरह की टैक्स छूट को खत्म नहींकिया जाएगा तब तक जीडीपी की तुलना में टैक्स अनुपात में बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं है।

यहां यह भी जानना जरूरी है कि यह टैक्स छूट है कितनी। संसद में दिए गए एक जवाब के मुताबिक, अकेले 2015-16 में ही 6.11 लाख करोड़ की टैक्स छूट दी गई। 2004 से 2015-16 के बीच के 12 बरसों के समयकाल में उद्योग क्षेत्र को दी गई कुल टैक्स राहत 50 लाख करोड़ के बराबर थी। इसे बजट में रेवेन्यू फॉरगॉन या भूल चुके राजस्व की श्रेणी में रखा गया था।

यहां 2016-17 के आंकड़ों को नहीं जोड़ा गया है, क्योंकि अब बजट दस्तावेजों से यह श्रेणी ही हटा दी गई है। ऐसा कुछ जाने-माने अर्थशास्त्रियों के जबर्दस्त दबाव के बाद किया गया, क्योंकि इन लोगों का कहना था कि इससे उद्योग जगत की बदनामी होती है। वित्त मंत्रालय ने उनकी बात मान ली, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि टैक्स में राहत देने पर रोक लग गई, क्योंकि देबरॉय आगे कहते हैं, अगर यह टैक्स छूट हटा दी जाती तो जीडीपी की तुलना में टैक्स अनुपात या टैक्स-टु-जीडीपी रेशो 22% होता।

किसान को कब मिलेगा उसका हक।

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लंबे समय से मैं इस बात पर जोर देता आ रहा हूं कि हर साल इस तरह दी जाने वाली कर रियायतों को खत्म करना जरूरी है। कुछ अर्थशास्त्री दलील देते हैं कि इस तरह की छूट से उद्योगों और विनिर्माण क्षेत्र के विकास में तेजी आती है, निर्यात बढ़ते हैं और रोजगार के नए अवसरों का निर्माण होता है। लेकिन हम देख रहे हैं कि इंडस्ट्री में मंदी बरकरार है, विनिर्माण क्षेत्र की चाल भी सुस्त है, निर्यातों को सब्सिडी पर सब्सिडी दी जा रही है और पिछले 10 बरसों (2004-5 से 2013-14) में सिर्फ 1.5 करोड़ लोगों को रोजगार मिला, 2014 से 17 के बीच तो सिर्फ 6.5 लाख लोगों को नौकरियां मिली हैं।

अगर टैक्स में छूट देने की परंपरा खत्म कर अतिरिक्त राजस्व का उपयोग भूख, कुपोषण और गरीबी हटाने जैसे लोक कल्याणकारी कार्यक्रमों में किया जाता तो मुमकिन है भारत गरीबी से मुक्त हो जाता। एक अनुमान है कि, एलपीजी सिलिंडरों पर दी जाने वाली कुल सालाना सब्सिडी खत्म करने से 48,000 करोड़ रूपयों की बचत होगी जिनसे देश की गरीबी एक साल के लिए खत्म हो सकती है। इस हिसाब से अगर 50 लाख करोड़ की टैक्स छूट खत्म हो जाए तो देश 100 बरसों के लिए गरीबी से आजाद हो जाएगा।

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भुला दिए गए इस राजस्व का एक अंश भी अगर कृषि क्षेत्र में लगा दिया जाए तो देश में व्याप्त गंभीर कृषि संकट का समाधान खोजा जा सकता है। खेती में वित्तीय संसाधनों की निरंतर कमी बनी हुई है, साल दर साल सरकारी निवेश कम होता जा रहा है। देश में पिछले 21 बरसों में 3.3 लाख किसानों ने आत्महत्या की है। इनमें से 16 हजार किसान (सन 2000 के बाद) तो अकेले पंजाब से हैं। पंजाब के 98 फीसदी ग्रामीण परिवार कर्ज के तले दबे हुए हैं, इनमें से 94 फीसदी का खर्च उनकी आय से कहीं ज्यादा है।

इसका परिणाम यह है कि गिरती आय के साथ कर्ज बढ़ता जा रहा है। जैसे-जैसे बढ़ता कर्ज किसानों की जान ले रहा है, बकाया कर्ज को माफ करने की मांग का विरोध भी तेज होता जा रहा है। याद कीजिए, कुछ महीनों पहले बैंक ऑफ अमेरिका मैरिल लिंच ने अंदाजा लगाया था कि, 2019 के आम चुनावों की लहर में 2.57 लाख करोड़ के कृषि ऋण माफ कर दिए जाएंगे। यह रकम देश की जीडीपी का लगभग 2 पर्सेंट है। मैरिल लिंच का आंकलन महज एक अनुमान था जो कभी भी हकीकत नहीं बनेगा। अभी तक केवल यूपी, महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक और तमिलनाडु के किसानों के 80 हजार करोड़ के कर्ज को माफी मिली है। अभी यह फैसला आंशिक रूप से ही लागू हो पाया है।

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अकेले इसी साल, वित्तीय वर्ष के शुरूआती छह हफ्तों में देश के कॉर्पोरेट जगत को 55,356 करोड़ रुपयों के कर्ज को माफी मिली है। हालांकि, ना तो मैरिल लिंच ने हमें यह बताया है कि कॉर्पोरेट टैक्स को मिलने वाली यह छूट टैक्स-टु-जीडीपी अनुपात में कितनी होगी, ना ही मीडिया में इसकी चर्चा हुई है, पिछले 10 बरसों (2007 से 2017) में सरकारी बैंकों ने कुल 3.60 लाख रूपयों का कॉर्पोरेट टैक्स माफ किया है जो जीडीपी का 2.8 पर्सेंट है।

इसके अलावा 10 करोड़ रूपया ऐसा है जिसे बैंकें अपने खाते से हटा चुकी हैं उसे स्ट्रेस्ड लोन का दर्जा दिया गया है। मतलब इस लोन की शर्तों और दरों वगैरह में बदलाव किया गया है ताकि उसे आसानी से चुकाया जा सके। एक खबर के अनुसार, 2004 में असेट स्टेबलाइजेशन फंड बनाया गया था जिसके जरिए आईडीबीआई बैंक के ऐसे लोन की शर्तों वगैरह में बदलाव किया गया था जिसके चुकाए जाने की कोई उम्मीद नहीं थी। कर्ज की यह पुनर्संरचना या बदलाव 90 फीसदी से ज्यादा थी। यह मेरी समझ के बाहर है कि पंजाब के छोटे किसानों के मामले में इस तरह की पुनर्संरचना क्यों नहीं की जा सकती। पंजाब में छोटे किसानों (5 एकड़ से कम जोत वाले) को 2 लाख तक की कर्ज माफी दी गई थी। लेकिन कुछ ऐसे किसान जिनका बकाया इस सीमा से महज 100 रूपये ज्यादा था उन्हें माफी नहीं मिली। इस तरह की विसंगतियों को दूर करने के लिए अर्थव्यवस्था की पुनर्संरचना जरूरी है। करों में छूट की समाप्ति इस दिशा में पहला कदम होगा।

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(गांव कनेक्शन में जमीनी हकीकत देविंदर शर्मा का लोकप्रिय कॉलम है, गांव कनेक्शऩ में प्रकाशित लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...)

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