क्या किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बचा पाएगा भारत ?

क्या किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बचा पाएगा भारत ?क्या होगा किसानों का भविष्य?

विश्व व्यापार संगठन के मंत्रिमंडलीय सम्मेलन के फैसले भारत के किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकते हैं.. जानिए क्यों

किसानों को जागरूक होना होगा। उन्हें दिसंबर 12-13 तक अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में आयोजित मंत्रिमंडलीय सम्मेलन में हो रहे फैसलों पर निगाह रखनी होगी।

मैं उन्हें नज़र रखने को इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह महत्वपूर्ण वार्ता भारत में कृषि को प्रभावित करेगी। ऐसे समय में, जब किसानों के नाराज़ संगठन न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी की मांग रहे हैं, भारत के सामने विश्व व्यापार संगठन में अपने खद्यान्न खरीदने की प्रक्रिया का बचाव करने की चुनौती है। असल में, किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मुहैया कराने वाला तंत्र ही दांव पर है। यह सब किसानों को सीधे-सीधे प्रभावित करेगा।

अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया और जापान उन देशों में से हैं जो विकासशील देशों में पब्लिक स्टॉक होल्डिंग कार्यक्रमों का स्थाई समाधान खोजने की मांग कर रहे हैं। आसान शब्दों में, अमीर देश भारत पर अपनी खरीद नीति को खत्म करने पर जोर डाल रहे हैं। अब चूंकि किसानों को दिए जाने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य की गिनती कृषि सब्सिडी में होती है, भारत पहले ही इसकी सीमा को लांघ चुका है। भारत और दूसरे विकासशील देशों को एग्रीगेट मैजर ऑफ सपोर्ट (एएमएस) प्रावधानों के तहत 10 फीसदी कृषि सहायता की मंजूरी दी गई है। अमेरिका, यूरोपियन यूनियन समेत कुछ देश मानते हैं कि भारत धान के मामले में पहले ही इस सीमा को 24 फीसदी से भी ज्यादा लांघ चुका है।

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4 साल पहले, दिसम्बर 2013 में बाली में आयोजित विश्व व्यापार संगठन की मंत्रिमंडलीय बैठक में भारत ने एक अस्थायी "शांति अनुच्छेद" प्रस्तुत किया था। इसके तहत वह अपने न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रावधानों को स्थाई समाधान खोजे जाने तक जारी रखने में कामयाब हुआ था। इसकी समय सीमा दिसंबर 2017 मानी गई, इसलिए जो थोड़ी राहत मिली थी, वह अब खत्म हो रही है। इस अस्थाई " शांति अनुच्छेद" की बदौलत भारत ने अपना कृषि खरीद कार्यक्रम जारी रखा हुआ था। इसमें छोटे और मझोले किसानों से फसलें, जैसे गेंहू, चावल आदि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदकर जनता के एक बड़े तबके के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। इस 'शांति अनुच्छेद" की वजह से कोई भी देश विश्व व्यापार संगठन में कृषि खरीद के मुद्दे पर भारत का विरोध नहीं कर सकता था, चाहे वो सब्सिडी की उच्चतम सीमा 10 % को पार कर जाये।

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पिछले 12 बरसों से ये मुद्दा लटका हुआ है। अमीर देश यह भी चाहते हैं कि भारत कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में कमी करके अपना बाज़ार और खोले। लेकिन भारत ने बाज़ार में अधिक पहुंच देने से मना करके किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की अपनी नीति की रक्षा करने का फ़ैसला किया है। दूसरी तरफ अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, उरूग्वे और पाकिस्तान आदि ने स्पष्ट कर दिया कि पब्लिक स्टॉक होल्डिंग पर वे कोई स्थायी हल तब तक नहीं स्वीकारेंगे, जब उसमें पारदर्शिता और उनके हितों की सुरक्षा सुनिश्चित न की जाए। विशेष तौर पर वे यह चाहते हैं कि भारत अपने इस तरह खरीदे गए खाद्यान्न का निर्यात न कर सके क्योंकि उनके हिसाब से इससे अंतर्राष्ट्रीय अन्न व्यापार पर बुरा असर पड़ता है।

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जी-33 देशों के समूह, जिसमें मूलत: इंडोनेशिया के नेतृत्व में 45 विकासशील देश शामिल हैं, ने इस मुद्दे को हल करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था । एएमएस में पब्लिक स्टॉक होल्डिंग को शामिल न किये जाने का उनका यह प्रस्ताव अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और उनके मित्र देशों ने नामंजूर कर दिया। इसलिए यह मंत्रिमण्डलीय बैठक भारत के लिए और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उस पर अपनी खाद्यान्न् खरीद नीति को खत्म करने का दबाव बढ़ता जा रहा है। भारत को इस मुद्दे पर अपना पक्ष जबर्दस्त तरीके से रखना होगा और खाद्यान्न खरीद की प्रक्रिया को किसी भी तरह की कटौती से बचाना होगा। एक तरफ देश में बढ़ते कृषि संकट और न्यूनतम समर्थन मूल्य को दूसरी फसलों तक पहुंचाने की मांग के मद्देनजर, इसमें नाकामयाबी राजनैतिक आत्महत्या साबित होगी। हालाँकि भारत ने 23 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया हुआ है, लेकिन यह केवल गेहूं, धान और कुछ हद तक गन्ने और कपास तक ही लागू है।

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सही वक्त पर कठोर निर्णय न लेकर भारत पहले ही एक मौका गंवा चुका है। 2013 के बाली की मंत्रिमंडलीय बैठक में भारत के पास अपनी खाद्यान्न खरीद प्रणाली के स्थायी समाधान का विकल्प था लेकिन उसने दबाव में आकर ट्रेड फेसिलिटेशन सन्धि पर दस्तख़त कर दिए । उस वक्त भारत के पास मौका था कि वह अपनी इस प्रणाली को एएमएस के बाहर रखे जाने के प्रस्ताव पर दुनिया को राजी कर लेता। परन्तु भारत अपने अधिकारों की सुरक्षा में विफल रहा। अगर इस वक्त भी वह नाकाम रहता है तो इसका मतलब भारत गम्भीर समस्याओं में घिरने जा रहा है जिसका असर घरेलू कृषि पर भी पड़ेगा।

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मुझे एकमात्र उम्मीद भारत-चीन के जवाबी हमले के संकल्प में दिखाई दे रही है। इसमें भारत-चीन ने अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, कनाडा, नॉर्वे, स्विट्जरलैंड, जापान और दूसरे देशों द्वारा दी जा रही सब्सिडी को खत्म करने की मांग की है। इस सब्सिडी से 160 बिलियन डॉलर का व्यापार प्रभावित हो रहा है। हालांकि, करीब 100 विकासशील देश इस मांग का समर्थन कर रहे हैं लेकिन अमीर देशों के खिलाफ अतीत में हुई ऐसी कार्यवाहियों का कोई असर नहीं दिखाई दिया।

खाद्यान्न सब्सिडी की बात करें तो अमेरिका अपनी 47 लाख की भूखी आबादी के लिए हर साल 385 किलो अनाज व दलहन खाद्य सब्सिडी के रूप में फूड स्टैंप और मिड डे मील कार्यक्रमों के नाम पर देता है। 2012 में इस पर 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च आया जो 2010 में 90 बिलियन था। 2016 में यह बढ़कर 160 बिलियन डॉलर हो गया। दूसरी तरफ भारत अपनी 83 करोड जनता को महज 60 किलो खाद्यान्न देना की बात करता है। भारत ने अपनी खाद्यान्न सुरक्षा के लिए 20 बिलियन डॉलर या 1.25 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। पर अमेरिका को इस राशि से समस्या है अपनी सब्सिडी से नहीं, जो भारत की लगभग पांच गुनी है।

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पहले भी भारत ने अमेरिका और यूरोपियन यूनियन द्वारा दी जा रही इस सब्सिडी पर सवाल उठाए थे लेकिन जब फैसला लेने का समय आया तो उसने चुपचाप हस्ताक्षर कर दिए। इसलिए नहीं लगता कि भारत विश्व व्यापार को दुष्प्रभावित करने वाली अमीर देशों की सब्सिडी की खिलाफत कर पाएगा। अतीत में औद्योगिक देश विकासशील और अविकसित देशों की बांह मरोड़कर व आर्थिक प्रलोभन की नीतियां अपनाकर बातचीत की टेबल पर उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर चुके हैं।चीन ने पिछले 10 बरसों में पहली बार अपने यहां अनाज के दाम गिराए हैं। यह 11वीं मंत्रिमंडलीय बैठक में भारत के साथ मिलकर किए जाने वाले संयुक्त पहल के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

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इस समय जरूरत आक्रामक रवैये की है। इसिलए भारत को भरसक कोशिश करनी होगी कि उसका शांति अनुबंध वास्तविकता बन जाए। लेकिन अगर भारत स्थायी हल की खातिर भारत और छूट देने पर राजी हो जाता है तो देश के भीतर राजनीतिक तूफान खड़ा हो जाएगा। खाद्यान्न सुरक्षा नीतियों पर होने वाली चोट के निश्चय ही गंभीर राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक परिणाम होंगे।

इसीलिए किसानों को जागरूक रहने की जरूरत है, विश्व व्यापार संगठन की गतिविधियों पर नजर रखने की जरूरत है।

(गांव कनेक्शन में जमीनी हकीकत देविंदर शर्मा का लोकप्रिय कॉलम है, गांव कनेक्शऩ में प्रकाशित लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...)

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