पुण्य तिथि विशेष: चौधरी चरण सिंह जिन्होंने माना था कि कृषि क्षेत्र से जुड़ी नौकरियों को ग्रामीण बच्चों को ही देना चाहिए

चौधरी चरण सिंह ने उत्तर भारत में किसान जागरण किया और किसानों को उनको अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सिखाया। किसानों के चंदे से ही चौधरी साहब की राजनीति चलती थी। बैल से खेती करने वाले किसान के लिए उनकी चंदे की दर एक रुपया और ट्रैक्टर वाले किसान से 11 रुपए थी। बड़े उद्योगपतियों से उन्होंने धन नहीं लिया और दिशानिर्देश बना दिया था कि अगर उनके किसी सांसद-विधायक ने पूंजीपतियों से चंदा लिया, यह बात साबित होगी तो उसको पार्टी छोड़नी पड़ेगी।

Arvind Kumar SinghArvind Kumar Singh   29 May 2021 6:23 AM GMT

पुण्य तिथि विशेष: चौधरी चरण सिंह जिन्होंने माना था कि कृषि क्षेत्र से जुड़ी नौकरियों को ग्रामीण बच्चों को ही देना चाहिए

29 मई 1987 को जब चौधरी चरण सिंह का निधन हुआ था तो उनको श्रद्धांजलि देने जिस विशाल संख्या में किसान समुदाय पहुंचा था उसका मैं गवाह हूं। आज उनकी 34वीं पुण्य तिथि है। उनके निधन के दिन मैंने जो नजारा देखा वह भूल नहीं पाता। इतनी बड़ी तादाद में ग्रामीण चेहरों को मैने अपनी पत्रकारिता के काल में किसी राजनेता के निधन पर नहीं देखा। जैसे जन समुद्र दिल्ली में उमड़ आया था। 12 तुगलक रोड के बंगले पर तो खैर तिल रखने की जगह नहीं थी। आसपास की सड़कों पर जाने कितने लोग खड़े थे और जाने कितने लोग भटकते हुए दिख रहे थे। तुगलक रोड कोठी पर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से लेकर प्रधानमंत्री राजीव गांधी, लोक सभा अध्यक्ष बलराम जाखड़, चौधरी देवीलाल औऱ हेमवती नंदन बहुगुणा से लेकर पक्ष विपक्ष के जाने कितने दिग्गज नेता पहुंचे थे।

चौधरी साहब के निधन पर चार दिन का राजकीय शोक घोषित हुआ। निधन के बाद राजघाट पर चौधरी चरण सिंह की समाधि बने इसके नारे चौधरी चऱण सिंह अमर रहें, अंतिम संस्कार राजघाट पर हो, इसके नारे तो उनके निधन के बाद से ही लगने लगे थे। किसानों के भारी दबाव और जनभावना को देखते हुए राजीव गांधी सरकार ने चौधरी साहब की समाधि के लिए राजघाट परिसर में ही गांधीजी की समाधि के पूरब में जगह दी। इसी के कुछ समय बाद केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने विधिवत राजघाट परिसर के 58 एकड़ जमीन में से 18 एकड़ का क्षेत्र चौधरी साहब की समाधि 1987 में ही आवंटित कर दिया और इसके विकास के लिए योजना बनी। जिसे साकार होने में देरी लगी।


भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने 1990 में जब उनकी समाधि की उपेक्षा का मुद्दा उठाते हुए चौधरी अजित सिंह को नसीहत दी तो किसान घाट को 30 लाख रुपए के व्यय के साथ मौजूदा रूप देने का खाका बना औऱ चंद्रशेखर सरकार में मंत्री रहे औऱ चौधरी साहब के पुराने साथी सत्यप्रकाश मालवीय ने इसे साकार कराने में काफी दिलचस्पी ली और किसान घाट का मौजूदा रूप साकार हो सका। जीवन भर चौधरी साहब गांधीवादी रास्ते पर चले औऱ उनके ही समाधि परिसर में उनको जगह मिली।

1990 के बाद दिल्ली में किसानों के लिए दो जगह श्रद्धा केंद्र की तरह रहीं एक तो किसान घाट और दूसरा 12 तुगलक रोड की कोठी। 2014 में मोदी सरकार ने इस कोठी को खाली करा कर उस याद को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। 12 तुगलक रोड की कोठी पर चौधरी चरण सिंह की राष्ट्रीय राजनीति की तमाम यादें छिपी हैं। 1977 में बागपत से सांसद बनने के बाद वे इसी बंगले में रहे। बाद में यह उनकी पत्नी गायत्री देवी को राजीव गांधी सरकार में आवंटित हो गया था और फिर उनका परिवार रहा। चौधरी अजित सिंह इसे चौधरी चरण सिंह स्मृति भवन बना कर उनकी यादों को समर्पित करना चाहते थे लेकिन मोदी सरकार नहीं मानी। भारतीय किसान यूनियन और कई विपक्षी दलों की बात भी सरकार ने नहीं सुनी। कोठी की बिजली और पानी की सप्लाई काटने के बाद चौधरी अजित सिंह ने इसे खाली कर दिया। बेशक मोदी सरकार चाहती तो चौधरी साहब की याद को जीवंत रखने के लिए इस बंगले को दिया जा सकता था। अब चौधरी चरण सिंह भी नहीं है और उनके पुत्र अजित सिंह का भी कोरोना के नाते निधन हो चुका है। लेकिन किसानों के दिल में उनके लिए बहुत जगह है और बहुत सी यादें हैं।

किसान आंदोलन को छह महीने से अधिक हो गया है। इस बीच में चौधरी साहब की जयंती भी आयी औऱ पुण्य तिथि भी लेकिन आंदोलन जारी है। संसद में बजट सत्र के दौरान किसानों के मुद्दे पर जब विपक्ष ने मोदी सरकार को घेरा तो राज्य सभा में 8 फरवरी 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चौधरी चरण सिंह के नाम को ढाल की तरह इस्तेमाल किया। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जबाव देते हुए चौधरी चरण सिंह को आगे रखा और कहा कि छोटे किसानों की दयनीय स्थिति चौधरी चरण सिंह को बहुत पीड़ा देती थी। देश में आज लघु और सीमांत किसान 86 फीसदी यानि 12 करोड़ से भी ज्यादा हैं जिनके पास 2 हेक्‍टेयर से भी कम जमीन है। क्‍या हमको योजनाओं के केंद्र में नहीं रखना चाहिए। इस सवाल का जवाब चौधरी चरण सिंह जी हमारे लिए छोड़कर गए हैं।


बेशक किसानों पर बात होगी तो चौधरी चरण सिंह तक पहुंचती ही है। क्योंकि भारत में किसानों के सवालों पर उनके जैसा मौलिक चिंतन किसी और का नहीं रहा। वे किसान शक्ति पर भी राजनीति करते है। किसान उनको वोट भी देता था और नोट भी। उनके साथ कितनी विशाल किसान शक्ति है इसका आकलन पूरे देश को 23 दिसंबर 1978 को हुआ था जब दिल्ली के बोट क्लब पर किसानों का ऐतिहासिक जमावड़ा हुआ। तभी से 23 दिसंबर को उनका जन्म दिन मनाना आरंभ हुआ। उऩके निधन के बाद 23 दिसंबर किसान दिवस के रूप में मनाया जाता है। चौधरी साहब की 118वीं जयंती पिछले साल दिल्ली की सीमाओं पर किसानों ने एक अलग अंदाज में मनायी थी।

भारत की राजनीति में चौधरी चरण सिंह ही ऐसे नेता रहे जिनकी पूरी राजनीति किसानों पर केंद्रित रही। वे जहां जिस पद पर रहे किसान उनकी नीतियों के केंद्र में रहा और किसान जागरण में भी उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही। वे 1967 से 1970 के दौरान दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और छोटी अवधि के लिए भारत के प्रधानमंत्री रहे। फिर भी इस दौरान अपने कामों से देश भर में अमिट छाप छोड़ी। चार दशकों तक वे उत्तर प्रदेश में विधायक, संसदीय सचिव, मंत्री और नेता विपक्ष जैसी भूमिका में रहते हुए राष्ट्रीय राजनीति में वे एक बड़े हस्ताक्षर बने और किसानों को यह भरोसा दिलाया कि वे कहीं रहें उनकी बात रखते रहेंगे।

चौधरी साहब का मत था कि कि भारत में दो संसार हैं एक ग्रामीण और एक शहरी। उनका मत था कि संख्याबल में बहुत अधिक ग्रामीण जनसमूह ही असली भारत है। लेकिन ग्रामीण और शहरी भारत के बीच वे संतुलन बनाना चाहते थे। जो चीजें गावों में लघु या कुटीर उद्योग बना सकते हैं, उनको बड़े उद्योगो को बनाने की इजाजत न मिले यह उनकी सोच थी। गांव-देहात की जमीनी हकीकत और प्रशासनिक तानेबाने को भी वे अच्छी तरह समझते थे इस नाते मानते थे कि जब तक प्रशासन के साथ गांव का बच्चा नहीं जुड़ेगा तब तक स्वराज पाकर भी किसान लुटा-लुटा ही रहेगा। इसी कारण वे अपनी राजनीति के आरंभिक दिनों से ही यह मांग उठा रहे थे कि सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में किसानों के बच्चों के लिए पचास फीसदी पदों को आरक्षित किया जाना चाहिए। और कृषि क्षेत्र से जुड़ी नौकरियों को तो हर हाल में ग्रामीण बच्चों को ही देनी चाहिए। क्योंकि कृषि अधिकारी गेहूं औऱ जौ के बीच अंतर नहीं कर पाता है।


चौधरी साहब ने अंग्रेजी राज के दौरान 1946 में ही इस बात को मुखरित किया था कि स्कूल, कालेज, हाॅस्पिटल, सड़कें औऱ बिजली जैसी जीवन की सुविधाओं से ग्रामीण जनता वंचित है। सरकारी नौकरियों में नियुक्ति में भेदभाव होता है और शहरी लोगों, कारोबारियों, व्यापारियों और पेशवर वर्ग को नौकरियां मिल जाती हैं। वे कहते थे कि कुछ गैर किसान किसानों की जगह लेकर देखें कि उनकी कौन कौन सी परेशानियां आती हैं और किस तरह उनको गंवार कह कर तिरस्कृत किया जाता है।

चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर, 1902 को गाजियाबाद के नूरपुर गांव में एक संघर्षशील किसान परिवार में हुआ था। 1937 में मेरठ दक्षिण पश्चिम सीट से वे विधायक बने। उस दौरान इस सीट के दायरे में मौजूदा गाजियाबाद और बागपत जिला शामिल था। 1977 तक वे लगातार विदान सभा सदस्य रहे। 1946 में ही पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने उनको अपना संसदीय सचिव बनाने के साथ ग्रामीण इलाकों और किसानों पर काम करने के लिए अधिकार संपन्न बनाया। चौधरी साहब ने उत्तर प्रदेश में मंडी कानून बनाने की पहल 1938 में ही की थी जिसे अंजाम तक पहुंचाने में ढाई दशक लग गए। 1952 में भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन कानून पारित होने के बाद चौधरी साहब ने चकबंदी कानून और 1954 में भूमि संरक्षण कानून बनवाया। इनकी ख्याति विदेश तक पहुंची। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के विद्वान पाल.आर.ब्रास ने लिखा कि- उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह ने जमींदारी उन्मूलन में यह निश्चित किया कि कानून में कोई ऐसा छोटा रास्ता भी न रह जाये जिसके कारण जमींदारों का वर्चस्व समाप्त होने से रह जाये। और राज्य में फिर से कहीं सामंती हस्तक्षेप सिर न उठा ले।

इसी तरह उनकी चकबंदी को योजना आयोग ने सफल माॅडल मानते हुए राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया। अमेरिकी कृषि विशेषज्ञ अलवर्ट मायर ने चकबंदी को ऐतिहासिक और क्रांतिकारी मानते हुए कहा था कि इसकी बदौलत हरित क्रांति की बुनियाद को रखने में आसानी हुई। किसानों की जोतें पहले 10 से 20 स्थानों तक फैली हुई थीं और बहुत दिक्कतें आती थीं। चौधरी साहब ने साढ़े छह एकड़ तक की जोत पर आधा लगान माफ कर दिया। किसानों के लिए जोत-बही की व्यवस्था करायी।


1979 में केंद्र में वित्त मंत्री और उप प्रधानमंत्री रहने के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना करायी। उर्वरकों और डीजल के दामों में कमी कराने के साथ कृषि यंत्रों से उत्पाद शुल्क घटाया। उनके प्रयासों से काम के बदले अनाज योजना आरंभ हुई और कृषि उत्पादों की अन्तर प्रांतीय आवाजाही पर लगी रोक हटा दी। चौधरी साहब ने 1977 में अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि मेरे संस्कार उस गरीब किसान के संस्कार हैं, जो धूल, कीचड़ और छप्परनुमा झोपड़ी में रहता है। मैने अपना बचपन उन किसानों के साथ बिताया है, जो खेतों में नंगे बदन अपना पसीना बहाते हैं।

चौधरी साहब का पूरा जीवन सादगी और ईमानदारी की मिसाल रहा। वे मंत्री रहे तो बच्चे पैदल या साइकिल से स्कूल जाते थे। खुद जीवन भर खादी की धोती और कुरता पहने आचार- व्यवहार में किसान ही बने रहे। कई बार उनसे मिलने गाँवों के लोग आते तो वे उनसे कहते थे कि किराये पर इतना पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं थी। यही बात एक पोस्टकार्ड पर लिख कर भेज देते तो तुम्हारा काम हो जाता। वे हर एक चिट्ठी पढ़ते और उसका जवाब देते थे। गांव की पृष्ठभूमि वाले तमाम नेताओं को उऩ्होंने राजनीति में आगे बढ़ाया। जब गाजियाबाद नगर के विकास के लिए आरंभिक तौर पर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में 50 गांव प्रभावित हुए तो चौधरी चरण सिंह ने इसका विरोध किया। वे ग्रामीणों के पक्ष में खड़े हुए और तथ्यों के साथ अपनी बात रखी और मांग की कि गैरजरुरी जमीनें न ली जायें। इसके नाते सरकार ने भूमि अधिग्रहण की मात्रा को 35 हजार एकड़ से घटा तक छह हजार एकड़ करने का फैसला किया औऱ किसानों को कई राहत भी दी।

चौधरी साहब का किसानों की समस्याओं पर गहरा अध्ययन था। चौधरी साहब ने किसानों के मुद्दों पर कई पुस्तकें लिखीं और 13 अक्तूबर 1979 से असली भारत साप्ताहिक अखबार भी शुरू किया। वे छोटी और बारीक सूचना पर भी निगाह रखते थे। उनका मत था कि छह सदस्यों के एक परिवार को साल भर में केवल एक टन खाद्यान्न की जरूरत होती है। अगर इसमें निवेश और तकनीकों का उपयोग किया जाये तो यह उपज आधे एकड़ जमीन से दोहरी फसल से हासिल हो सकती है। छोटे किसान जो पैदा करते हैं उससे इतनी बचत नहीं कर पाते कि आवश्यक निवेश कर सकें। छोटा किसान भी बेशी उत्पादन कर सकता है अगर वह बचत कर पाये और भूमि में निवेश कर सके। लेकिन छोटे पैमाने की खेती, उच्च उत्पादकता और कम कीमत तीनों एक साथ नहीं चल सकती। ..इस नाते सरकार के सामने केवल यही उपाय है कि वह किसानों को लाभकारी कीमतें अदा करे, ताकि वे बचत कर सकें और भूमि में निवेश कर सकें। वे कहते थे कि मेरी समझ में 27.5 एकड़ से अधिक और 2.5 एकड़ से कम भूमि का सही उपयोग नही हो सकता है। इसलिए एक परिवार के लिए जोत उतनी होनी चाहिए जितनी पारंपरिक खेती की हालात के लिए लाभकारी हो सके।


चौधरी साहब के राजनीतिक जीवन का बड़ा हिस्सा कांग्रेस में बीता। कांग्रेस के सहयोग से ही वे प्रधानमंत्री बने। लेकिन किसानों के मुद्दे पर उनकी तकरार तमाम मौकों पर होती रही। किसानों का ही आधार था जिसके बूते चौधरी साहब उत्तर प्रदेश में 1967 में पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। 1969 में उन्होंने भारतीय क्रांति दल बनाया जिसकी ताकत किसान ही थे। 1977 में यही आधार जनता पार्टी सरकार बनाने के काम आया। उनके ही दबाव में जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में कृषि और ग्रामीण पुनर्निर्माण को सबसे अधिक प्राथमिकता दी गयी थी और गांव और शहर के बीच असंतुलन दूर करने का वादा किया था। इसकी घोषणा पत्र में किसानों को पैदावार का उचित दाम देने के साथ कहा गया था कि खेती के काम आने वाले सामानों को उचित दाम पर उपलब्ध होना चाहिए। ढाई हेक्टेयर तक की जोत पर लगान माफी के वायदे के साथ गांवों में लुहार, बुनकर औरर कुम्हारों के साथ अन्य कारीगरों के उत्थान की बात भी कही गयी थी ताकि ग्रामीण भारत को इनका लाभ मिलता रहे।

चौधरी चरण सिंह ने उत्तर भारत में किसान जागरण किया और किसानों को उनको अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सिखाया। किसानों के चंदे ही चौधरी साहब की राजनीति चलती थी। बैल से खेती करने वाले किसान के लिए उनकी चंदे की दर एक रुपया और ट्रैक्टर वाले किसान से 11 रुपए थी। बड़े उद्योगपतियों से उऩ्होंने धन नहीं लिया और दिशानिर्देश बना दिया था कि अगर उनके किसी सांसद-विधायक ने पूंजीपतियों से चंदा लिया, यह बात साबित होगी तो उसको पार्टी छोड़नी पड़ेगी। वे जीवन के आखिरी क्षण तक वे किसानों की दशा पर चिंतित रहे। उनको इस बात की पीड़ा थी कि वे जीवन भर प्रयास करके भी किसानों के लिए वह सब नहीं कर सके, जो करना चाहते थे।

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