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स्कूलों में बच्चों की हत्याओं के लिए सरकारें जिम्मेदार

Dr SB Misra | Jan 19, 2018, 14:24 IST
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शिक्षा व्यवस्था
शिक्षा विभाग मानकों और नियमों को ताक पर रखकर रिश्वत लेकर मान्यता देता है वर्ना गुरुग्राम के बाद अब लखनऊ में बच्चे की हत्या का प्रयास न होता। क्या बच्चे अपराधी होते जा रहे हैं जो योजना बनाकर दूसरे बच्चों को मौत के घाट उतार रहे हैं या फिर समस्या कहीं और है।


अभी कुछ दिन पहले गुरुग्राम के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में कहते हैं उसी विद्यालय के एक बच्चे ने दूसरे की हत्या कर दी थी, पूरे देश में खबर फैली, सभी स्तब्ध थे जांच हुई लेकिन हायतोबा का नतीजा कुछ नहीं निकला। ऐसी घटना दोबारा न हो इसके लिए कोई ठोस कदम सुझाए या उठाए ही नहीं गए। व्यापारिक घरानों और पैसे के भूखे लोगों द्वारा शहरों में स्कूल खोलना एक व्यापार है और इस व्यापार को प्रोत्साहित करते हैं बीएसए, डीआईओएस, दूसरे शिक्षा अधिकारी और सरकार ।

सरकारों में वो अनभिज्ञ लिखे मंत्री बैठे थे जिन्होंने नियम बनाया कि परीक्षा तो लोगे लेकिन किसी को फेल नहीं करोगे, बच्चों को डाटो मारोगे नहीं, भारतीय संस्कार साम्प्रदायिक हैं उन्हें स्कूलों से बाहर निकालो, छात्रों की यूनियन बनाओ और अपनी बात मनवाओ। नतीजा है संस्कारविहीन उद्दंड और अपराधिक प्रवृत्ति वाले नागरिक पैदा हो रहे हैं। अंग्रेजों ने हर जिले में इंस्पेक्टर, डिप्टी इंस्पेक्टर और सबडिप्टी इंस्पेक्टर बनाए थे लेकिन हमारी सरकारों ने समाप्त कर दिए। विद्यालयों को खोलने के लिए दुकान खोलने जैसा लाइसेंस दिया जा रहा है कोई निरीक्षण नहीं क्योंकि निरीक्षक ही नहीं है।



शिक्षा विभाग मानकों और नियमों को ताक पर रखकर रिश्वत लेकर मान्यता देता है वर्ना गुरुग्राम के बाद अब लखनऊ में बच्चे की हत्या का प्रयास न होता। क्या बच्चे अपराधी होते जा रहे हैं जो योजना बनाकर दूसरे बच्चों को मौत के घाट उतार रहे हैं या फिर समस्या कहीं और है। जिम्मेदारी फिक्स होनी चाहिए। यदि कोई बच्चा विद्यालय के लिए घर से चलता है और रास्ते में कोई दुर्घटना हो जाती है तो इसमें जिम्मेदारी अभिभावक की होनी चाहिए परन्तु एक बार बच्चा स्कूल के अन्दर पहुंच गया उसके बाद उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी अध्यापकों और प्रधानाध्यापक की बनती है।

कक्षा 1 से कक्षा 8 तक का विद्यालय चलाने की अनुमति और मान्यता देता है बेसिक शिक्षा अधिकारी। उसका काम है देखना कि विद्यालय में सुरक्षा है अथवा नहीं यानी दरवाजे पर गेट कीपर, छोटे बच्चों को कक्षा से शौचालय तक ले जाने के लिए आया अथवा चपरासी, शौचालय पर सफाई कर्मचारी की मौजूदगी, विद्यालय में चहारदीवारी के अलावा अध्ययन अध्यापन की समुचित व्यवस्था। अब यदि कोई बाहरी व्यक्ति विद्यालय में घुस आया अथवा कोई छात्र चाकू कटारी लेकर अन्दर गया तो गेट कीपर की जिम्मेदारी है।

शहरों में अच्छी फीस लेकर तंग गलियों में स्कूल खुलते हैं और सरकारी मान्यता मिलती है। लेकिन यदि बिना मानक पूरे किए मान्यता दी गई है तो मोटी रकम खाकर मान्यता दी गई होगी। स्कूल में बच्चों की सुरक्षा के लिए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की महत्चपूर्ण भूमिका है लेकिन यूपी सरकार अब चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जैसे चपरासी, चौकीदार, सफाई कर्मचारी आदि के पद समाप्त करने जा रही है तब व्यवस्था और भी लचर हो जाएगी।



गांवों में अभी भी कुछ भारतीय संस्कार बाकी है, लोगों में और इसलिए बच्चों में भी। भले ही वहां स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा की कम व्यवस्था रहती है फिर भी दुर्घटनाएं कम होती हैं। दूर दराज के गांवों से बच्चे आते हैं इसलिए इस बात पर जोर दिया जाता है कि प्रत्येक गांव के बच्चे गोलबन्द होकर साथ साथ जाएं और आएं।


बच्चों में अनुशासन के लिए जहां खेलकूद जरूरी हैं वहीं शारीरिक परिश्रम जैसे बागबानी, कक्षा की सफाई, हस्तकला आदि लेकिन बच्चों से कुछ भी काम कराया गया तो मीडिया को मसाला मिल जाता है। बड़े बव्वे अपनी बात मनवाले के लिए प्रधानाध्यापक को बंधक बनाते हैं और छोटे बच्चे अब अपने ही साथी का गला काटते हैं। यह भारत के लिए अनजानी संस्कृति है जिसमें राजगद्दी के लिए बेटा अपने बाप का गला काट देता है। हमें चाहिए भारतीय संस्कृति को व्यवहार में लाना।

गांवों में अभी भी कुछ भारतीय संस्कार बाकी है, लोगों में और इसलिए बच्चों में भी। भले ही वहां स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा की कम व्यवस्था रहती है फिर भी दुर्घटनाएं कम होती हैं। दूर दराज के गांवों से बच्चे आते हैं इसलिए इस बात पर जोर दिया जाता है कि प्रत्येक गांव के बच्चे गोलबन्द होकर साथ साथ जाएं और आएं। यदि स्कूलों की व्यवस्था के उचित उपाय न हुए तो अमेरिका जैसी हालत हो जाएगी जहां कक्षा में एक छात्र बन्दूक से अपने ही सहपाठियों को भून देता है। यह एक घटना थी लेकिन बहुत कुछ कहती है। इसलिए अभिभावकों और प्रबन्धकों के साथ सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है।



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