नरेन्द्र मोदी ने विदेश नीति को नए आयाम दिए

नरेन्द्र मोदी ने विदेश नीति को नए आयाम दिएनरेन्द्र मोदी ने विदेश नीति को नए आयाम दिए

आजादी के साथ जब देश के कर्णधारों ने भारत के टुकड़े कर दिए तो पाकिस्तान के रूप में अपने पराए हो गए और पड़ोसी देश बन गए। पाकिस्तान का जन्म ही हिन्दुओं से शत्रु भाव और अलगाव पर आधारित था। अब उसके साथ सम्बन्ध विदेश नीति का अंग हो गये। आजादी की विरासत में मिली कश्मीर समस्या जिसे भारत के कश्मीरी प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाकर अन्तर्राष्ट्रीय जामा पहना दिया। अब भारतवासियों को कश्मीर जाने के लिए भी परमिट लेना पड़ता था।

नेहरू ने कश्मीर समस्या के हल के लिए यूएनओ में प्लेबिसाइट का वादा कर दिया यह जानने के लिए कि कश्मीरी भारत में रहना चाहते हैं या पाकिस्तान में। उन्होंने यह वादा क्यों नहीं पूरा किया यह वही जानते होंगे लेकिन कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने की दिशा में पहला कदम बढ़ाया था डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने, जिन्होंने परमिट के बिना प्रवेश किया और अपने प्राणों की आहुति दी। बाकी मसला अपनी जगह रहा और बाद के सभी प्रधानमंत्रीं अपने अपने ढंग से प्रयास करते रहे। अब मोदी का प्रयास है कूटनीति के माध्यम से भारत को सशक्त बनाना और कश्मीर सहित सभी समस्याओं का समाधान निकालना।

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कुछ लोग पूछते हैं मोदी गले लगा कर विदेश नीति चलाते हैं इससे भारत को क्या मिला। जब अप्रवासी भारतीय मोदी मोदी का उद्घोष करते हैं तो लगता है कुछ तो मिला है। जब तमाम नाराजगी के बावजूद उत्तर प्रदेश और गुजरात की जनता मोदी पर भरोसा करती है तो लगता है वह मोदी नीति पर मुहर लगा रही है। कांग्रेस के लोग सोचते हैं आक्रामक विरोध से देश और विदेश में रहने वाले भारतीयों का मूल्यांकन बदल जाएगा। ऐसा अभी तक हुआ नहीं है और शायद होगा भी नहीं।

कश्मीर पर इजराइल का स्पष्ट मत है कि जब तक कश्मीर में आबादी का सन्तुलन नहीं बदलेगा समस्या हल नहीं होगी। वह पिछले 70 साल से भारत के साथ दोस्ती चाहता रहा है और अब मोदी ने इजराइली दोस्ती का हाथ थामा है। लेकिन भारत ने गुटनिरपेक्षता अथवा तटस्थता की नीति नहीं छोड़ी है। इजराइल और अमेरिका को यह स्पष्ट रूप से पता है और भारतीय भावनाओं का आदर करते हैं।

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आज डाक्टर अम्बेडकर यदि जीवित होते तो मोदी की विदेश नीति का समर्थन करते क्योंकि नेहरू से उनका मतभेद विदेश नीति और नागरिक संहिता को लेकर विशेष रूप से था। इसी तरह स्वामी विवेकानन्द ने जब कहा था प्रत्येक भारतीय को एक बार जापान अवश्य जाना चाहिए तो जापान के साथ बने प्रगाढ़ रिश्ते उसी दिशा में हैं। जापान ने आधुनिकता को संस्कारों से जोड़ा है और भारत के साथ उसके बहुत पुराने सांस्कृतिक सम्बन्ध हैं। भारत के सम्बन्ध प्रजातांत्रिक देशों अमेरिका,इजराइल, जापान, फ्रांस और जर्मनी से प्रगाढ़ सम्बन्ध होने चाहिए थे। नेपाल और श्रीलंका से भी आत्मीयता नहीं बन पाई थी। मोदी ने इन कमियों को पूरा करने का प्रयास किया है।

आजादी के बाद भारत के शासकों ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई फिर भी उन देशों से प्रगाढ़ सम्बन्ध बनाए जहां प्रजातंत्र नहीं था, रूस, चीन, यूगोस्लाविया, मिश्र, इंडोनेशिया, घाना आदि। इनमें अधिकतर साम्यवादी देश थे जिनसे हमें सहयोग तो मिला लेकिन वे स्वयं बदहाली से गुजरे और पूंजीवादी अर्थ नीति को अपना रहे हैं। मोदी ने आतंकवाद पर सतत प्रहार का एजेंडा पकड़ा है और पाकिस्तान को उसकी हैसियत बता दी है।

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भारत के दौरे पर आए इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू ने भारत के प्रधानमंत्री मोदी से बिना संकोच कह ही दिया कि इस दिन का लम्बे समय से इन्तजार था। नेहरू ने इजराइल के साथ भारत के कूटनीतिक सम्बन्ध तक कायम नहीं किए थे और न इन्दिरा गांधी या राजीव गांधी ने। उलटै इजराइल के धुर वरोधी फिलिस्तीन के यासिर अराफात से जरूर अच्छे सम्बकन्ध बनाए। वास्तव में भारत की सहानुभूति हिटलर द्वारा सताए गए यहूदियों के साथ होनी चाहिए थी।

जब भारत साम्यवादी खेमे से नजदीकिया बढ़ा रहा था तो पूंजीवादी अमेरिका ने भारत विरोधी पाकिस्तान को अपनाया। पाकिस्तान ने अमेंरिकी दम पर भारत पर हमले किए लेकिन अब मोदी ने बड़े परिश्रम से अमेरिका के पाक समर्थन को कम किया है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने 1971 में रूस के साथ संधि करके उसका समर्थन हासिल किया और दुनिया देख रहीं थी कि भारत की गुटनिरपेक्षता कैसी है। वैसे अमेरिका सदा से भारत के साथ दोस्ती चाहता था लेकिन बात बनी नहीं।

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वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने एक किताब लिखी है ''बिटविन द लाइन्स'' जिसमें उन्होंने नेहरू और जान एफ केनेडी की मुलाकात की विस्तृत चर्चा की है। केनडी ने नेहरू के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया लेकिन नेहरू ने दोस्ती का हाथ नहीं थामा। नेहरू और उनके विदेश मंत्री वी के कृष्ण मेनन ने अमेरिका से जो बेरुखी दिखाई, भारत ने उसकी बहुत कीमत चुकाई है। कश्मीर समस्या उनमें से एक है, अब जाकर मोदी ने बाजी पलट दिया है।

इजराइल से कूटनीतिक सम्बन्ध तब बने जब नरसिंह राव देश के प्रधानमंत्री बने। इजराइली प्रधानमंत्री का भारत दौरा काफी बाद में तब हुआ जब अटल जी प्रधानमंत्री थे। मोदी ने भारत के पुराने मित्रों को भी बरकरार रक्खा है और नए मित्रों के साथ प्रगाढ़ सम्बन्ध बनाए हैं। भारत द्वारा ऐटमी परीक्षण के बाद का पूर्वाग्रह समाप्त हो रहा है। भारतीय विदेश नीति की सफलता इसी में है कि चीन कोई दुस्साहस न कर सके और पाकिस्तान अपनी औकात समझ जाए। मैं समझता हूं डोकलाम और कश्मीर की घटनाओं ने इसे प्रमाणित किया है।

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