पुलिस की धूमिल होती छवि

पुलिस की धूमिल होती छविपुलिस पर पहले भी उठते रहे हैं सवाल।

लोकतांत्रिक प्रशासन में विधि द्वारा स्थापित भारतीय संविधान को लागू करना व समाज में अपराध को रोकना एवं कानून-व्यवस्था बनाए रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पुलिस व सुरक्षा बलों पर होती है, लेकिन इन जिम्मेदारियों को अक्सर दर किनार करते हुए पुलिसकर्मी अपनी कर्तव्य विमुखता एवं अमानवीय कृत्यों से समूचे पुलिस तंत्र पर बदनुमा दाग लगा रहे हैं। कानून एवं राज्य व्यवस्था का सफल संचालन तभी संभव है, जब पुलिस महकमे का हर शख्स अपने कर्तव्यों तथा अधिकारों को भली-भांति समझकर उनका उचित ढंग से निर्वहन करे, लेकिन वर्तमान समय में फर्जी मुठभेड़ की घटनाएं, अपराधियों के साथ पुलिस की सांठगांठ और निर्दोष लोगों को अकारण प्रताड़ित करने की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण आम जनमानस में पुलिस की छवि में निरंतर गिरावट आ रही है।

हाल ही में खाकी वर्दी की कई घटनाओं ने पूरे देश में फिर से इस सवाल को उठा दिया है कि भारतीय पुलिस कार्यशैली में सुधार आखिर कब किया जाएगा? देश की राजधानी दिल्ली के एक थानाध्यक्ष और उनके सहयोगियों पर छह लोगों को बेवजह थाने में बंदकर पीटने और छोड़ने के एवज में 25 हजार रुपये वसूलने का आरोप लगा है। बाकयदा इसका वीडियों फुटेज भी सार्वजनिक होकर पुलिस की छवि को दागदार कर रहा है। वहीं दिल्ली से ही सटे नोएडा के सेक्टर-122 में हुए फर्जी एनकाउंटर ने आम लोगों के मन में पुलिस की दहशत पैदा करने का काम किया है।

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बीते तीन फरवरी की रात में यहां के एक जिम ट्रेनर और उसके साथी को एक प्रशिक्षु सब इंस्पेक्टर ने गोली मार दी थी। उसके बाद उक्त घटना को फर्जी मुटभेड़ का रूप दिया गया। यह वाकया पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इस मामले की गूंज विधान सभा व विधान परिषद सदन तक में सुनाई दी है। बहरहाल, इस पूरे मामले में दो कहानी सामने आई हैं पहली कहानी फर्जी एनकाउंटर है तो दूसरी इसके जरिए आउट आॅफ टर्न प्रमोशन पाने की है। यह दोनों कहानियां अपने आप में बेहद चैकाने वाली है।

फर्जी एनकाउंटर की इस कहानी ने 1996 में गाजियाबाद के भोजपुर थानान्तर्गत फर्जी एनकाउंटर की याद दिला दी है। इस फर्जी एनकाउंटर को भी प्रमोशन पाने के लिए अंजाम दिया गया था। आउट आॅॅफ टर्न प्रमोशन पाने के लिए पुलिस कर्मियों ने दो युवको को पुलिया पर और दो को ईंख के खेत में मार गिराया था। मुटभेड़ साबित करने के लिए उनके पास तमंचे रख दिए थे और उनसे 16 राउंड फायर किए जाने का दावा किया गया था। इस मामले में 112 लोगों की गवाही थी। पिछले वर्ष सीबीआई की अदालत ने इस मामले में चार पुलिस कर्मियों को हत्या और फर्जी सुबूत पेश करने का दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी।

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उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में सिधौली कोतवाली अन्तर्गत ग्राम बिशुनदासपुर में तीस दिसम्बर, 2017 की रात में एक प्रशिक्षु उपनिरीक्षक सहित अन्य पुलिस कर्मियों ने एक दलित व्यक्ति को पहरा न लगाने पर निर्ममतापुर्वक पिटाई, फिर उसे पूरे गांव में घुमाया जाना पांच सौ उठा-बैठकें लगवाना और मुर्गा बनाकर चलवाना बड़ी स्तब्धकारी और खौफनांक घटनाएं है। देश में पुलिसकर्मियों की ऐसी मानसिकता बन गई है, मानों वे भारतीय कानून से ऊपर हो गए हैं और वे जब चाहे तब किसी भी आम नागरिक को बेवजह पुलिस वर्दी का खौफ दिखाकर प्रताड़ित और अपमानित कर सकते है। उन्हें बल प्रयोग करने का अधिकार जरूर हासिल है, लेकिन यह कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए है। इसकी स्थितियां भी परिभाषित हैं फिर भी यदि पुलिसकर्मी खुद को कानून से ऊपर समझने की मानसिकता खत्म नहीं करते हैं, तो उन्हें भी वह सजा मिलनी चाहिए जो आम लोगों के लिए होती है। संविधान के तहत पुलिसकर्मियों को दी गई शक्तियों का लगातार दुरुप्रयोग करने की दिशा में केंद्र सरकार और राज्यों की सरकारों को अब उचित कदम उठाने की आवश्यकता हैं।

समूचे पुलिस तंत्र को शर्मसार करने वाली उपरोक्त घटनाओं से स्पष्ट है कि पुलिस की ज्यादतियां किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रहकर देशव्यापी बन चुकी हैं। कानून के रखवाले पुलिस कर्मियों का इस प्रकार का आचरण समूचे पुलिस तंत्र की छवि धूमिल कर रहा है। भारतीय पुलिस व्यवस्था को आज नई दिशा, नई सोच और नए आयाम की आवश्यकता है। समय के अनुसार मांग की जा रही है कि देश की पुलिस का आम नागरिकों के प्रति की जाने वाली शोषणकारी और भ्रष्टाचारी नीति में बदलाव होने चाहिए। नागरिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों के प्रति भारतीय पुलिस जागरूक होकर पारदर्शिता के साथ समाज के प्रति संवेदनशील और जवाबदेह बने, तो पुलिस की छवि निखर सकती है।

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फर्जी मुठभेड़ों के आरोप पुलिस पर ही नहीं वरन सेना पर भी लगे हैं। मणिपुर में सेना पर लगे ऐसे आरोपों की जांच का आदेश खुद देश की सर्वोच्च अदालत ने दिया। आतंकवाद के खिालफ किसी अभियान के दौरान बल प्रयोग में गलती हो सकती है और इसी तर्क पर अशांत क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं ताकि वे निर्भीकता से अपना काम कर सकें लेकिन मणिपुर के जिन मामलों में सर्वोच्च अदालत ने जांच का आदेश दिया वे पहली नजर में कार्रवाई के दौरान हुई गलती के मामले नहीं थे। चाहे सेना हो या पुलिस, उन्हें मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा। कानून-व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के क्रम में अपराधियों और संदिग्धों के साथ सख्ती बरती जाए न कि बेगुनाह लोगों पर कहर बरपाया जाए।

भारतीय पुलिस को यह मालूम होना चाहिए कि उसे दी गई शक्ति का उपयोग उन्हें अपराधियों के खिलाफ करना है न कि आम निरीह जनता के विरुद्ध। इसे विडंबना ही कहना पड़ेगा कि आजादी के 70 वर्षों बाद भी देश की पुलिस न तो अपनी छवि को सुधार पाई है और न ही वह स्वयं को औपनिवेशिक काल की उस पुलिस की प्रेत-छाया से मुक्त ही कर पाई है, जिसकी बुनियाद अपराधमुक्त-भयमुक्त समाज के लिए नहीं, बल्कि हुकूमत-ए-बर्तानिया के सुचारु संचालन के लिए की गई थी। आज भी न तो हम मित्र पुलिस की अवधारणा को सही अर्थों में साकार कर पाए हैं और न ही भारतीय पुलिस का वह क्रूर एवं अमानवीय चेहरा ही बदल पाए हैं, जिसके लिए वह आलोचना का शिकार होती आ रही है। शर्मसार करने वाला उसका अमानवीय चेहरा हमें रोज देखने को मिलता है। बहरहाल आज भी जनता पुलिस को एक पक्षपाती, क्रूर, भ्रष्ट और अक्षम फोर्स मानती है।

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पुलिस राजनीतिक दबाव में सत्ताधीशों और क्षेत्र के दबंग प्रवृत्ति के लोगों के अभिकर्ता के रूप में काम करती दिखाई पड़ती है। परिणामस्वरूप पुलिस की कार्रवाइयों में निष्पक्षता एवं तटस्थता हाशिए पर चली जाती है। इसे न तो सुधारने की कोशिशें की गई और न ही ढांचागत बदलाव लाने की दिशा में कोई पहल ही की गई। फलस्वरूप स्वतंत्र भारत की पुलिस के चेहरे एवं चरित्र में कोई बदलाव नहीं आया और सत्ता के इशारों पर नाचना उसकी फितरत बन गई है। बहरहाल, पुलिस की बदसुलूकी एवं अमानवीय व्यवहार की शिकायतें दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं। इन्हीें सब कारणों से जहां भारतीय पुलिस में सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है। वहीं भारतीय पुलिस की भूमिका को पुनर्परिभाषित किए जाने की मांग भी की जा रही है। पुलिस प्रशासन में भ्रष्टाचार की जड़ें भी बहुत गहरी हैं। रिश्वतखोरी का जबरदस्त बोलबाला है। पूरा पुलिस तंत्र भ्रष्टाचार से पूरी तरह आच्छादित है।

बुद्ध प्रकाश

(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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