प्रकृति नहीं बल्कि हमारी मान्यताएं बलात्कारी पैदा करती हैं

जानकी लेनिन एक लेखक, फिल्ममेकर और पर्यावरण प्रेमी हैं। इस कॉलम में वह अपने पति मशहूर सर्प-विशेषज्ञ रोमुलस व्हिटकर और जीव जंतुओं के बहाने पर्यावरण के अनोखे पहलुओं की चर्चा करेंगी।

प्रकृति नहीं बल्कि हमारी मान्यताएं बलात्कारी पैदा करती हैं

देश भर में जिस तादाद में और जितने वीभत्स व हैरान करने वाले तरीकों के साथ रेप और दूसरे यौन अपराध बढ़ रहे हैं उन्हें सुनकर मन में विचार उठता है कि ऐसा तो जानवर भी नहीं करते। क्या वाकई जानवर यौन अपराध नहीं करते? क्या केवल इंसान ही रेप करते हैं? इंसान क्यों रेप करते हैं? इन ढेर सारे सवालों के जवाब शायद जानकी लेनिन के इन लेखों में मिल जाएं जो उन्होंने दिल्ली के निर्भया कांड के समय लिखे थे। प्रस्तुत है इसकी चौथी और अंतिम कड़ी।

विकासवादी जीवविज्ञान के हिसाब से स्त्री पर प्रभुत्व की मंशा और यौन संतुष्टि की चाहत, इन दो वजहों को रेप के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है। अलग-अगल किस्म के रेप में हम सेक्स और सत्ता का अलग-अलग मात्रा में घालमेल पाते हैं।

दूसरों पर हावी होने के बहुत से तरीके हैं पर सेक्स का इस्तेमाल सेक्स को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। ऐसे समाजों में जहां बेटे पुश्तैनी धन संपदा के मालिक बनते हैं, पुरुष पूरी तरह यह सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं कि उनका बेटा वास्तव में उन्हीं का बेटा हो। इसलिए वे स्त्री के यौन व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए धमकियों, हिंसा, खानदान की इज्ज्त, और पवित्रता जैसी चीजों का इस्तेमाल करते हैं।


ऐसे समाज महिलाओं को अपने नियम मानने के लिए किस तरह मजबूर करते हैं? उनके सिर पर बलात्कार की तलवार लटका कर। पुरुष नैतिकता के स्वयंभू ठेकेदार बन जाते हैं जो खुद कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकते, और महिलाओं की स्थिति बाड़े में बंद जानवर की तरह हो जाती है जिन पर लगातार नजर रखनी पड़ती है। महिलाओं के जीवन पर कई नियमों का शासन होता है, यहां आजादी की सजा रेप है। मनुष्यों के अलावा कुछ प्राइमेट्स या नरवानरों में भी मादा की सेक्सुएलिटी को नियंत्रित किया जाता है। लेकिन तुलनात्मक रूप से दमनकारी समाजों के मनुष्य सनकी की हद तक नियंत्रण करना चाहते हैं। ऐसे समाज में आमतौर पर पीड़ित महिला को ही दोषी ठहरा दिया जाता है: उसने उकसाने वाले कपड़े पहन रखे थे, वह शराब पी रही थी, रात में बाहर घूम रही थी, उसने खुद आफत मोल ली। कुछ याद आया?

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हमारे नजदीकी संबंधी औरंगउटान एक मामले में हमसे बुनियादी रूप से अलग हैं। वहां नर औरंगउटान मादा को शारीरिक रूप से नुकसान नहीं पहुंचाते। प्रणय के जोश में नर बतखों का समूह मादा के ऊपर टूट पड़ता है, कई बार वह डूब जाती है। हाल ही में ऐसी खबरें आईं कि डॉलफिन ने डूबते कुत्ते को बचाया। लेकिन नर बॉटलनोज डॉलफिनें झुंड बनाकर अक्सर मादा डॉलफिन का हिंसक उत्पीड़न भी करते हैं, कभी-कभी मादा मर भी जाती है। यह बताना मुश्किल है कि इस तरह चोट पहुंचाने में इन जानवरों को खुशी पहुंचती है या नहीं, पर ऐसा लगता है कि इनमें डूबने की घटनाएं महज एक हादसा रही होंगी। इस हिसाब से दिल्ली की घटना के बाद अमिताभ बच्चन का यह कहना ठीक ही लगता है, कि ऐसा तो जानवर भी नहीं करते होंगे। वास्तव में इंसानों के अलावा कोई और जानवर दूसरे को कष्ट देकर आनंद लेता है, इसका अभी तक कोई सबूत नहीं मिला है।

पुरुष हिंसा और मारपीट के जरिए सेक्स को नियंत्रित करते हैं, शायद नर चिंपैंजी भी ऐसा ही करते हैं। राष्ट्रीय फैमिली हेल्थ सर्वे 2009 के मुताबिक, 51 फीसदी भारतीय पुरुष और 54 फीसदी महिलाएं मानती हैं कि 'कुछ हालातों में' अगर पति पत्नी को पीटता है तो गलत नहीं करता। घरेलू हिंसा के बहानों में पत्नी की चरित्रहीनता, ससुराल वालों का अपमान, घर और बच्चों की अनदेखी, पति को बिना बताए घर से बाहर जाना, पति से बहस करना और अच्छा खाना न बनाना भी शामिल है। शिक्षाविद लॉरी बीचहॉफर और मनोविज्ञानी एंड्रिया पैरेट कहती हैं कि ऐसा नजरिया रखने वाला समाज ही रेप जैसे अपराध को बर्दाश्त करता है। जिन परिवारों में घरेलू हिंसा होती है उनके बच्चे भी यही बर्ताव सीखते हैं और यह कड़ी आगे चलती जाती है।

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आखिर कैसे वातावरण में ऐसी भयानक मन:स्थिति विकसित होती है?

पैगी सैंडे कहती हैं, रेप जैसी घटनाएं उन समाजों में होती हैं जहां खाने-पीने की किल्लत हो और घर का इकलौता कमाऊ सदस्य पुरुष हो। पुरुषों को घटते संसाधनों तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, धीरे-धीरे हिंसा मर्दानगी का पर्याय बन जाती है। अपने आसपास के माहौल पर काबिज होने के संघर्ष में पुरुष के लिए महिला महज एक वस्तु बनकर रह जाती है। पैगी के मुताबिक, जिन समाजों में पुरुष अपने आसपास के माहौल के साथ सामंजस्य बनाकर रहते हैं वहां आमतौर पर रेप नहीं होते।

तो क्या यह बात इरक्वो और अपाची जनजाति के बारे में भी कही जा सकती है जो विरोधी कबीलों पर हमला करने के लिए मशहूर थे? खैर मुझे इसका जवाब नहीं पता, मुझे यह बात दिलचस्प लगती है कि ये जनजातियां भी महिलाओं की उसी तरह इज्ज्त करती थीं जैसे इंडोनेशिया की मातृप्रधान मिनांग्काबाउ करती थी।

संक्षेप में, जैवशास्त्रीय नजरिए से देखा जाए तो पुरुष इस तरह से बने हैं कि वे अपने बड़े आकार और ताकत के बल पर अपना वंश बढ़ाते चलें। लेकिन अगर रेप सिर्फ एक जैवशास्त्रीय क्रिया होती, मतलब इसपर नियंत्रण करना पुरुषों के बस में न होता तो यह सभी मानव समाजों में पाई जाती। लेकिन इसके विपरीत, यह उन समाजों में ज्यादा आम है जहां महिलाओं का सम्मान नहीं किया जाता।

तो कहा जा सकता है, प्रकृति ने तो केवल पुरुष को उपकरण दिए हैं, उनका इस्तेमाल कैसे करना है यह सभ्यताएं ही तय करती हैं।

(ये जानकी लेनिन के निजी विचार हैं।)

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