जानकारी के अभाव में नहीं पढ़ पाते बच्चे

जानकारी के अभाव में नहीं पढ़ पाते बच्चेप्रतीकात्मक फोटो।

जय श्री वर्मा

घर के बगल वाले प्लाट में मंदिर है। वहां चार बच्चे दिन में कई बार छुप-छुप कर आते हैं और भगवान पर चढ़ा प्रसाद, फल ले जाते हैं। उनमें से एक रवि अकेला ही सुबह-सुबह आ जाता था। एक दिन मैंने उसे बुलाकर पूछा, तुम स्कूल क्यों नहीं जाते। अपनी मां को बुलाकर लाना, वह सिर हिलाकर चला गया।

कुछ दिनों बाद अचानक वह फिर मंदिर में दिखाई दिया। मैंने बुलाकर पूछा, तुम मां को लेकर आए नहीं, कल जरूर लाना। ऐसा मैं उससे कई महीनों तक कहती रही। आखिर एक दिन वह मां को लेकर आया। सिर नीचे कर नाख़ून चबाते हुए कहा, “आंटी, ये मेरी अम्मा हैं।” घबराते हुए वह पूछने लगी, जी साहब लड़के से कुछ गलती हो गई है क्या।

मैंने कहा, नहीं यह पूरे दिन मंदिर में पैसे उठाता रहता है। तुम इसे स्कूल क्यों नहीं भेजती। वहां किताबें यूनिफार्म, बैग, जूते, सब फ्री में मिल जाएगा साथ में दोपहर का खाना भी और फ़ीस भी नहीं देना होगा। वह कहने लगी, मुझे क्या पता किस स्कूल में दाखिला होगा और मुझे पैसे भी नहीं देने होंगे। हम गरीब लोग पैसे के मारे ही बच्चों को स्कूल नहीं भेजते। मैंने कहा कोई चिंता की बात नहीं है। मैं साथ चलूंगी और करवा दूंगी।

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बहुत मुश्किल से रवि स्कूल जाने लगा। धीरे-धीरे मंदिर में उसका आना बंद हो गया। बाद में मैंने उसके साथ वाले दो और बच्चों का दाखिला करवा दिया। अंततः मेरे काफी प्रयास के बाद ये तीन बच्चे स्कूल जाने लगे। देश का विकास तभी संभव होगा, जब देश साक्षर होगा। और साक्षरता दर में तभी इजाफा होगा, जब हम सभी जागरूक होंगे। कहते हैं, एक स्त्री शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है, लेकिन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा को लेकर सकारात्मक सोच नहीं है।

लेकिन इन सबसे इतर यहां बांदा की ज्ञान देवी का जिक्र करना जरूरी है, जो ऐसे गाँव में रहती है जहां चिट्ठी आती है तो लोग दूसरे गाँव में उसे पढ़वाने के लिए ले जाते हैं। ज्ञानदेवी में शिक्षा का ऐसा जुनून और जज्बा है कि वह बीए की पढ़ाई के लिए रोज नदी पार कर कालेज जाती हैं। उसका बस्ता उसके सिर पर रहता है।

ऐसा ही एक मिसाल हैं मोतिहारी के अमवा गाँव की प्रेमलता देवी (64 वर्ष)। शिक्षा की अलख जगाने की प्रयासरत प्रेमलता देवी माध्यमिक विद्यालय के लिए सरकार को न सिर्फ अपनी जमीन दान में दे दी, बल्कि आज भी उसका रंग-रोगन का जिम्मा खुद ही निभाती हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि शहरों के मुकाबले गाँवों में शिक्षा का ग्राफ काफी गिरा हुआ है।

सरकार ने गाँवों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए न जाने कितनी ही योजनाओं की शुरुआत की है पर ये योजनाएं तभी सफल हो पाएंगी। पिछड़े वर्ग और गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी जी रहे परिवार के बीच इसकी जानकारी दी जाएगी। उनके घर तक जाकर सरकार की इन योजनाओं को बताना और समझाना होगा।

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क्योंकि बहुत से परिवारों को जानकारी भी नहीं है कि सरकार की मुफ्त शिक्षा के तहत मुफ्त यूनिफार्म, जूते, बैग, किताबें और साथ में मिड-डे भी दिया जाता है। बहुत ही अफ़सोस की बात है कि सरकार की मिड-डे मील योजना के बाद भी शिक्षा का स्तर ज्यादा ऊंचा नहीं उठा। आज भी गाँवों में लड़के-लड़कियों को चौथी-पांचवी के बाद पढ़ाई छुड़वाकर घर बिठा दिया जाता है।

फिर घर के कामों या खेत शिक्षा में सबसे बड़ी जरूरत है, क्वालिटी की और क्वालिटी आती है शिक्षकों से। शिक्षकों को ही अपने पढ़ाने के तरीकों को बदलना होगा, नए तकनीक का इस्तेमाल करना होगा। जरूरत है केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं का जमीनी स्तर पर प्रचार-प्रसार हो। कार्यकर्ता जन-जन तक शिक्षा के महत्व को लुभावना और सरल तरीके से पहुंचाएं।

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