सिर्फ बड़ी बिल्डिंगों में बैठकर नीतियां बनाने से नहीं बढ़ेगी किसानों की आय

सिर्फ बड़ी बिल्डिंगों में बैठकर नीतियां बनाने से नहीं बढ़ेगी किसानों की आयसरकार को अपने वादे को जमीन पर ले आना होगा।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अपने आखिरी पूर्ण बजट के बाद से मिशन खेती पर जुटी हुई है। 2014 में सरकार ने खेती बाड़ी के कायाकल्प के लिए तमाम वायदे किये गए थे। कई वायदों पर बेशक सरकार आगे बढ़ी है लेकिन समग्र रूप से कृषि क्षेत्र में स्थितियां कई जगहों पर पहले से भी खराब हुई हैं। गुजरात और हाल के उप चुनावों में ग्रामीण जनता की नाराजगी के बाद प्रधानमंत्री ने स्वयं यह मसला अपने हाथ में लिया है। इसी के तहत दो दिनों का दिल्ली मंथन हुआ जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने में सफल होगी। इसके लिए सभी दिशाओं में काम होगा। प्रधानमंत्री का यह भी कहना था कि केंद्र और राज्य सरकारें मिल कर भारतीय कृषि का गौरव लौटाएंगी।

भारत सरकार खेती की लागत घटाने, पैदावार का वाजिब दाम देने, पोस्ट हार्वेस्ट बर्बादी को रोकने और अतिरिक्त आय के लिए सभी रुकावटों को दूर करते हुए कृषि क्षेत्र को उचित संसाधन देने का वादा कर चुकी है। पहली बार इस मंथन में प्रधानमंत्री का जो भाषण हुआ वह राजनीतिक नहीं बल्कि कृषि पर केंद्रित रहा औऱ उन्होंने यह माना कि रिकार्ड उत्पादन और तमाम क्रांतियों के बाद भी किसान का विकास सिकुड़ता गया। दूसरे सेक्टरों की तुलना में खेती से आमदनी नहीं हुई और खाद्य सुरक्षा देने वाले किसान की आथिक सुरक्षा खतरे में पड़ी। इसी नाते जरूरी है कि उसकी आय बढ़ाने के लिए सभी संभव तरीकों से काम हो और पूरे कृषि क्षेत्र की ओवरहालिंग हो।

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एग्रीकल्चर 2022 के तहत हुए मंथन को बेशक बेहद अहम माना जा सकता है। इस मंथन के बाद आगे की दिशा में नीति आयोग और राज्य सरकारों के साथ मिल कर एक ठोस रणनीति बनायी जानी वाली है। कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय तमाम योजनाओं की राह में कमियों को दूर करने के लिए दूसरे केंद्रीय मंत्रालयों के साथ बैठकर नयी राह निकालेगा। यह सही है कि पहली बार नीति निर्माताओं और किसानों ने एक साथ बैठकर मंथन किया औऱ केंद्र और राज्यों के कृषि, बागवानी और तमाम क्षेत्रों के अधिकारियों के साथ वैज्ञानिकों ने भी अपनी राय रखी। प्रधानमंत्री ने भी सात प्रमुख थीमों की सिफारिशों को ध्यान से सुना। लेकिन सही बात तो यह है कि जो विचार सामने आया है उसे जमीन पर उतारने के लिए समय कम है और चुनौतियां अधिक।

भारत में 192.20 मिलियन हेक्टेयर सकल फसली क्षेत्र में से 86.42 मिलियन हेक्टेयर वर्षा सिंचित या असिंचित है। पूर्वोत्तर भारत में कृषि उत्पादन देश के दूसरे इलाकों की तुलना मे बहुत कम है

केंद्र सरकार ने बीते सालों में बीज से बाजार तक कई अहम फैसले लिए हैं। आज 11 करोड़ किसानों के पास सायल हेल्थ कार्ड हैं। दावा है कि इससे किसानों की खेती की लागत घटी है और उत्पादन बढ़ाया है। इसी तरह दशकों से लंबित 99 सिंचाई परियोजनाओं के लिए 80 हजार करोड़ का इंतजाम करने के साथ योजना बनी है कि इसी साल के आखिर तक 50 परियोजनाएं पूरी हो जाएगी। करीब 20 लाख हेक्टेयर इलाके को सूक्ष्म सिंचाई के दायरे में लाया गया है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि फसल बीमा का दायरा कम प्रीमियम के बावजूद बढा है और पिछले साल इससे किसानों को 11 हजार करोड़ की क्लेम राशि मिली। सरकारी कोशिश है कि 2018-19 मे कमसे कम 50 फीसदी फसल इसके दायरे में हो।

लेकिन इन सबमें सबसे बड़ा सवाल वाजिब दाम और कृषि बाजारों में सुधार का है। कृषि बाजारों के माडल में बदलाव के तहत सरकार ग्रामीण हाट योजना को बेहद क्रांतिकारी मान कर चल रही है। बेशक किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए कृषि उपज मंडियों का विशेष महत्व है। इनकी स्थापना किसानों को बिचौलियों के शोषण से मुक्ति के लिए हुई थी। लेकिन अब किसानों की तबाही के कुछ कारणों में एक मंडी भी है। उदारीकरण के बाद किसानों का शोषण और बढ़ा। आज भारत में किसान और उपभोक्ता के दामों का अंतर दुनिया में सबसे ज्यादा है। जो आलू बाजार में उपभोक्ता 10 रुपए से 15 रुपए में खरीद रहा होता है, उसका दाम किसान को एक रुपए से पांच रुपये भी मिल जाये तो गनीमत है।

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तमाम अध्ययन बताते हैं कि उपभोक्ता जिन जिंसों को खरीदते हैं उसकी 20 से 25 फीसदी कीमत ही किसानों की जेब में पहुंचती है, बाकी अलग-अलग स्तर पर बिचौलियों की जेब में चला जाता है। यानि पैदा करने वाले से ज्यादा फायदा कारोबारी को होता है। मंडी में किसान अपना उत्पाद थोक मूल्य पर बेचते हैं और जरूरत का सामान खुदरा में खरीदते हैं। दोनों सौदों में उनको घाटा उठाना पड़ता है।

करीब 20 लाख हेक्टेयर इलाके को सूक्ष्म सिंचाई के दायरे में लाया गया है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि फसल बीमा का दायरा कम प्रीमियम के बावजूद बढा है और पिछले साल इससे किसानों को 11 हजार करोड़ की क्लेम राशि मिली। सरकारी कोशिश है कि 2018-19 मे कमसे कम 50 फीसदी फसल इसके दायरे में हो।

हमारी स्थानीय बाजारों पर व्यापारियों का नियंत्रण हैं और कृषि मंडियों पर बिचौलियों का। मनमानी कीमत, घटतौली, देरी से भुगतान जैसी समस्या आम है। छह महीने की हांड़ तोड़ मेहनत से पैदा फसल को लेकर किसान मंडी पहुंचता है तो रास्ते से ही बिचौलिया घेर लेते है। बिचौलियों की पूरी श्रंखला है, जिसमें कमीशन एजेंट, थोक व्यापारी, डीलर, डिस्ट्रीब्यूटर और कई और श्रेणी आती है। किसान का माल जितने हाथों जाता है उतने ही बिचौलिए हिस्सा बंटवाने को तैयार बैठे हैं। किसान कारोबारी दिमाग का नहीं होता। वह उपज लेकर मंडियों में आता है तब उसे आभास होता है कि जैसे उसकी ही नीलामी की जा रही है।

आज देश में लगभग 6680 थोक कृषि मंडियाँ और करीब 22, 000 ग्रामीण हाट या ग्रामीण प्राथमिक मंडियां हैं। लेकिन ज्यादातर राज्‍यों में कृषि उपज का व्‍यापार उनके अपने-अपने कानूनों के दायरे में आता है। इसमें कहीं कोई एकरूपता नहीं है। देश के अलग अलग हिस्सों में मंडियों का अपने तरीके से विकास हुआ। पंजाब औऱ हरियाणा में मंडियों की स्थिति थोड़ी बेहतर है और किसानों को उत्पाद बेचने के लिए लंबी दूरी नहीं तय करनी पड़ती है। लेकिन कई दूसरे राज्यों में मंडियों तक पहुंच में ही किसानों की काफी रकम व्यय हो जाती है।

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आजादी के पहले कृषि उपजों की बिक्री देहाती इलाकों में हाट बाज़ार में ही होती थी। वहां भी किसानों का भारी शोषण था। मंडियों के विकास केलिए केंद्र सरकार के स्तर पर देर से सोचा गया। आज भारत में कृषि-बाजार संरचना के समुचित विकास के लिए 20 से 25 हजार करोड़ रूपए से अधिक राशि की दरकार है। भारत नें कृषि उपज कारोबार में करीब बीस लाख थोक कारोबारी और पचास लाख खुदरा व्यापारी लगे हैं। मंडी-कानूनों के तहत राज्यों ने अपने कृषि-क्षेत्रों को भिन्न-भिन्न मंडी-क्षेत्रों में बांटा दिया है। इससे कृषि उपज का बाज़ार टुकड़ों-टुकड़ों में बंट गया है।

मंडी कानूनों को बदलने की मुहिम 2001 से चली और 17 राज्‍यों के मंडी कानूनों में संशोधन हुआ लेकिन वह आधे अधूरे मन से। बिहार में बिना वैकल्पिक व्यवस्था के 2006 में एपीएमसी एक्ट ही समाप्त कर दिया गया। केरल, मणिपुर, अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, दादरा नागर हवेली, दमन व दीव और लक्षद्वीव में तो मंडी कानून ही नहीं है, जबकि जम्मू कश्मीर में होना न होना बराबर। और कई हिस्सों में मंडियां आढतियों और सरकार की कमाई का जरिया बन गयी हैं। उदारीकरण से तमाम क्षेत्रों को फायदा हुआ है लेकिन किसानों को अपने उत्पादों को मर्जी की जगह बेचने का हक नही है। वह मंडी में अपने उत्पाद का दाम नहीं तय कर सकता।

हमारी कृषि मंडियों में रोज करीब ढाई हजार से तीन हजार करोड़ रुपए का कारोबार होता है। लेकिन यहां तीस फीसदी किसान ही अपनी उपज लेकर पहुंचते हैं बाकी माल उन आढतियों का होता है, जो किसानों के दरवाजे पर ही उसे खरीद लेता है। उत्तर भारत की मंडियों में जनवरी-फरवरी में आलू खुदाई के दौरान इसकी कीमतें बेहद गिर जाती है। मई से आलू में तेजी आने लगती है लेकिन इससे किसानों को नहीं बिचौलियों को फायदा होता है। इसी तरह का हाल प्याज किसानों का है। प्याज 80 रुपए किलो तक बिके किसान को 10 रुपए मिलना भी बड़ी बात है।

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आज सरकार ने ग्रामीण बाजारों को कृषि मंडी के स्वरूप में लाने की परिकल्पना की है लेकिन यह सहज काम नहीं है। बजट में इसे लेकर काफी दावा किया गया है लेकिन बगैर मंडी सुधारे न तो एमएसपी पर खरीद संभव है न ही कोई और इंतजाम।

हाल में बजट में सरकार ने कृषि ऋण को 2018-19 में 11 लाख करने की पहल के साथ वाजिब दाम के मसले पर अहम कदम उठाया है। ग्रामीण इलाकों के कायाकल्प को बुनियादी ढांचे और आजीविका कार्यक्रमों लिए 14.34 लाख करोड़ का व्यय होगा। लेकिन अभी तक हमने गैर सिंचित इलाकों को केंद्र में रख कर कोई ठोस रणनीति नहीं तय की है। आज हरित क्रांति ही धार खो रही है और पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों में अगर भारी बेचैनी है तो विदर्भ, तेलंगाना, बुंदेलखंड या आंध्र प्रदेश के किसानों की स्थिति को समझा जा सकता है।

भारत में 192.20 मिलियन हेक्टेयर सकल फसली क्षेत्र में से 86.42 मिलियन हेक्टेयर वर्षा सिंचित या असिंचित है। पूर्वोत्तर भारत में कृषि उत्पादन देश के दूसरे इलाकों की तुलना मे बहुत कम है। साथ ही भारी बारिश, भयानक बाढ़, लंबा चलने वाला सूखा जैसे विपत्तियां आती रहती है। वहां कृषि यंत्रीकरण का स्तर निम्न है और बिजली, खाद, कीटनाशकों की कम खपत के साथ खराब प्रौद्योगिकी, कम बीज प्रतिस्थापन दर, अम्लीय मृदा, सीढीनुमा खेत और जोतों का का सीमित आकार कई तरह की दिक्कतें पैदा करता है। 2011 में सात पूर्वी राज्यों में दूसरी हरित क्रांति नाम से कुल 105 जिलों के लिए नयी योजना आरंभ की गयी, लेकिन यह बेअसर रही।

आज किसानों में सबसे अधिक पीड़ाजनक दशा उन 85 फीसदी छोटे किसानों की है जिनके पास आधा हैक्टेयर से कम कृषि भूमि है। एक हेक्टेयर जमीन में सालाना 30,000 रुपए की कृषि उपज होती है। इससे किसान अपना परिवार कैसे पाल सकता है। अन्न उत्पादक किसान ही नहीं जो किसान पशुपालन में आर्थिक आधार खोज रहे हैं, उनकी दशा भी कोई बेहतर नहीं है। इसी नाते कृषि संबंधी स्थायी संसदीय समिति सरकार से दूध का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने पर विचार करने की सिफारिश कर चुकी है।

पशु आहार और चारे की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी के बावजूद डेयरी उत्पादों को अच्छी कीमत नहीं मिल रही है। कई किसान संगठन किसानों की सुनिश्चित आय के लिए किसान आय आयोग के गठन की मांग कर रहे हैं। उनका कहना था कि यदि किसानों को खेती से सुनिश्चित आय प्राप्त हो तो खेती की उत्पादकता बढ जाएगी तथा सरकार का खर्च भी कम होगा। इन सारे तथ्यो के आलोक में मंथन होना अच्छी बात है लेकिन उसे जमीन पर उतारने के लिए केंद्र और राज्यो के सक्रिय सहयोग के साथ राजनीतिक इच्छाशीलता औऱ उदार संसाधनों की भी जरूरत होगी।

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