भारतीय हितों को समझने की जरूरत

भारतीय हितों को समझने की जरूरतसाभार: इंटरनेट।

8-9 जून 2017 को अस्ताना समिट में भारत (और पाकिस्तान) ने शंघाई सहयोग संगठन के पूर्ण सदस्य का दर्जा हासिल कर लिया। वैसे तो भारत (और पाकिस्तान भी) पिछले वर्ष ही इस पैन-यूरेशियन समूह में शामिल होने के लिए 30 आॅब्लिगेटरी (आवश्यक) पेपर्स पर हस्ताक्षर कर चुका था, लेकिन अस्ताना तक इसे इस के लिए इंतजार करना पड़ा। इस संगठन से भारत के जुड़ जाने से यूरेशियाई समूह का विस्तार दुनिया की आधी आबादी तक हो गया।

वर्तमान वैश्विक प्रतिस्पर्धा में जब महाशक्तियां क्षेत्रीय संगठनों का प्रयोग नए संतुलनों के निर्माण के लिए कर रही हों, तो भारत जैसे देश के लिए भी यह जरूरी हो जाता है कि वह ऐसे संगठनों में सक्रिय भूमिका निभाएं जिससे उसे क्षेत्रीय ताकत के रूप में प्रतिष्ठित होने का अवसर मिल सकता है।

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शंघाई सहयोग संगठन का पूर्ण सदस्य बनना भारत के लिए एक अवसर साबित हो सकता है लेकिन क्या यहां से गुजरने वाला रास्ता बेहद सरल होगा? क्या चीन और पाकिस्तान, भारत के हितों को पूरा करने देंगे? चीन और पाकिस्तान द्विपक्षीय, विशेषकर सीमा संघर्ष एवं आतंकवाद को लेकर भारत के लिए चुनौती बने हुए हैं, इन दोनों के साथ भारत इस मंच पर किस तरह की मित्रता की अपेक्षा रखेगा?

पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ चलाए जा रहे प्राॅक्सी वार के चलते भारत दक्षेस की पिछली शिखर समिट का बहिष्कार कर चुका है, पर उसी पाकिस्तान के साथ वह शंघाई सहयोग संगठन में शिरकत कर रहा है, इस दोहरे मानदण्ड एवं व्यवहार को भारत दुनिया के सामने कैसे पेश करेगा? क्या शंघाई सहयोग संगठन ने पाकिस्तान को भारत के समकक्ष लाकर भारत के कद को कम करके आंकने का काम नहीं किया है?

शंघाई सहयोग संगठन से जुड़े व्यवहारिक प्रभाव आने वाले समय में बेहद नाटकीय होंगे, ऐसी संभावना फिलहाल अभी नहीं दिखाई दे रही। राजनीतिक वक्तव्यों से इतर सदस्य देश बहुपक्षीय संयोजनों के साथ-साथ द्विपक्षीय कार्यक्रमों के जरिए अपने द्विपक्षीय उद्देश्यों को पूरा करते रहेंगे, यद्यपि चीन शंघाई सहयोग संगठन के दायरे में द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े विषयों एवं सामग्रियों को लाने की कोशिश करेगा ताकि शक्ति संतुलन में वह उनका इस्तेमाल कर सके।

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ऐसे में यह देखना जरूरी होगा कि आने वाले समय में शंघाई सहयोग संगठन की नई संरचना कैसी होगी यानि सभी सदस्य संयुक्त रूप से पारस्परिक सहयोगी बनकर कार्यक्रमों का संयोजन एवं लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास करेंगे या फिर इसमें कम से कम दो ध्रुव बनेंगे और आगे की कूटनीति इनके बीच संतुलन व प्रतिस्पर्धा की होगी।

एससीओ आतंकवाद, नशीले पदार्थों की तस्करी, साइबर सुरक्षा के खतरों और सार्वजनिक सूचनाओं की गतिविधि पर महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी साझा करता है, काउंटर-टेरेरिज्म और सैन्य अभ्यास में संयुक्त भूमिका निभाता है इसलिए भारत को इसके जरिए आतंकवाद से लड़ने में सहयोग मिलना चाहिए। भारत एससीओ के अंदर पाकिस्तान की आतंकी नीतियों को लेकर दबाव बना सकता है तथा एशिया की चुनौतियों और समस्याओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर प्राप्त कर सकता है।

संभव है कि भारत इसमें अपनी क्षमता का प्रदर्शन करते हुए स्वयं को एक क्षेत्रीय ताकत के तौर पर प्रोजेक्ट करने में भी सफल हो जाए। संभावना है कि उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान के साथ कनेक्टिविटी स्थापित कर चाबहार प्रोजेक्ट के माध्यम से भारत इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को यूरेशिया तक पहुंचा सकता है। पर क्या चीन ऐसा होने देगा?

इस संगठन से भारत क्या अपेक्षाएं रखता है अथवा कौन सी महत्वाकांक्षाओं को लेकर भारत इस संगठन का पूर्ण सदस्य बना है, यह अभी स्पष्ट नहीं है पर पाकिस्तान काफी पहले से अपने पंख फैलाने को बेताब था। वैसे सार्क तथा आर्थिक सहयोग संगठन में पाकिस्तान की भूमिका बेहद नकारात्मक रही है इसलिए पाकिस्तान के ट्रैक रिकाॅर्ड को देखते हुए एससीओ में उससे बेहतर की उम्मीद नहीं की जा सकती हैं, हां ‘टाइम बम’ एक्सप्लोजन हो जाए, तब कुछ नहीं कहा जा सकता।

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फिर आखिर पाकिस्तान को एससीओ की पूर्ण सदस्यता क्यों दी गई? दरअसल यह चीनी षड्यंत्र है जिस पर रूस ने अपनी मुहर लगाई है। चीन जानता है दुनिया के सामने अपने सम्भ्रांत चेहरे का प्रदर्शन करने के लिए वह भारत का विरोध उस स्तर पर नहीं कर पाएगा, जिस स्तर पर पाकिस्तान करेगा, इस लिहाज से भारत के साथ पाकिस्तान का प्रवेश जरूरी था।

दूसरी बात यह है कि पाकिस्तान में चीन के सामरिक और आर्थिक हित निहित हैं, जिसे चीन के पाकिस्तान में निवेश, चीन-पाकिस्तान इकोनाॅमिक काॅरिडोर, ग्वादर बंदरगाह के साथ एक अन्य सैन्य बंदरगाह की योजना के रूप में देख सकते हैं। यही नहीं चीन पाकिस्तान के सहयोग से ही भारत को स्टि्रंग आॅफ पर्ल्स, सीपेक एवं न्यू मैरीटाइम सिल्क रूट के जरिए भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है।

यही वजह है कि चाहे वह संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता का मसला हो, चाहे एनएसजी की सदस्यता का, चाहे सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम्स का या फिर आतंकवादियों पर शिंकजा कसने के भारतीय प्रयासों का, चीन बिना किसी संकोच के अपने आॅल व्हेदर फ्रेंड पाकिस्तान के साथ खड़ा रहता है। यानि पाकिस्तान की एससीओ में भूमिका पूर्वनिर्धारित है।

चूंकि एससीओ चार्टर के अनुच्छेद 1 में कहा गया है कि प्रत्येक सदस्य को ‘अच्छे पड़ोसी’ की भावना का सख्ती से पालन करना होगा। यही नहीं एससीओ चार्टर द्विपक्षीय मुद्दों को उठाने का प्रतिषेध करता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भारत यहां पर पाकिस्तान के छद्म युद्ध को प्रमुख मुद्दा नहीं बना पाएगा।

एक बात और, चीन की ‘बेल्ट रोड इनीशिएटिव’ अवधारणा के पीछे मुख्य प्रेरक एससीओ ही था। बीआरआई के जरिए बीजिंग ने यूरेशिया में अरबों डाॅलर देने का जो वचन दिया है, उससे चीन अपने नव-औपनिवेशिक उद्देश्यों को पूरा करने की कोशिश करेगा। सीपेक, जो बीआरआई का ही एक घटक है, में एससीओ पूरी तरह से चीनी नजरिए के पक्ष में खड़ा है।

एक बात और, भारत ने सम्प्रभुता संबंधी कारणों से बीआरआई से बाहर रहने का विकल्प चुना, लेकिन एससीओ की सदस्यता को स्वीकार किया जबकि चीन का नजरिया नहीं बदला। चीन लगातार भारत सीमाओं पर गैर-अधिकृत गतिविधियां चलाता है। इसे एससीओ किस रूप से देख रहा है, क्या भारत ने इस विषय पर गम्भीरता से विचार किया है? चीन के अतिरिक्त अन्य सेन्ट्रल एशियाई देश भी इस तरह की गतिविधियां चला रहे हैं। जैसे-1995 में किर्गिस्तान और कजाकिस्तान ने पाकिस्तान के साथ ‘द क्वाड्रिलैटरल ट्रैफिक इन ट्रांजिट एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर किए थे।

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कुल मिलाकर क्षेत्रीय संगठनों से जुड़ने को एक अवसर के रूप में देखना चाहिए पर कुछ बातों पर ध्यान रखना जरूरी होगा। एक यह कि इस संगठन का रवैया कुछ हद तक नाटो के समानांतर खड़े होने का है यानि भारत एक सैन्य संगठन का हिस्सा बन रहा है जो उसकी गुटनिरपेक्षता की नीति के खिलाफ है।

द्वितीय यह कि जो देश भारत की सीमा व आतंरिक सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं अब इस मंच पर उनके प्रति मर्यादा, मित्रता एवं नैतिकता का प्रदर्शन करना है। जिनके साथ द्विपक्षीय वार्ता से परहेज करते हैं, उनके साथ बहुपक्षीय वार्ताएं करनी होंगी। जो सेना भारत को दुश्मन नम्बर एक मानती है, उसके साथ दुश्मन के खिलाफ लड़ने के लिए युद्धाभ्यास करना है। फिलहाल इन विरोधाभासों को हमें समझना होगा, उम्मीदों के दिए नहीं हवाओं पर निर्भर होंगे।

(लेखक राजनीतिक व आर्थिक विषयों के जानकार हैं यह उनके निजी विचार हैं।)

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