फोटोग्राफर की डायरी : किसान और राजस्थान

फोटोग्राफर की डायरी : किसान और राजस्थानफोटोग्राफर की डायरी

किसान मुक्ति यात्रा के दौरान अब तक हुई सभाओं में शरीक लोगों से बातचीत, गाँवों में रहने के दौरान जो कुछ देखा-सुना उससे मुझे लगने लगा है कि उनकी मुश्किलों और मजबूरियों की वजहें भी भौगोलिक विविधता की तरह ही हैं। उनके जीवन का यथार्थ बहुस्तरीय है और इस नाते जटिल भी। इस जटिलता के चलते ही कोई एक समाधान कारगर होगा, यह मुमकिन नहीं लगता। पर समाधान की उम्मीद ही उनमें किस तरह उत्साह भर देती है, ये सभाएं उसकी गवाह हैं।

महेसणा से आगे हम सिरोही के रास्ते पर निकले। योगेंद्र यादव की ओर से संदेश था कि रास्ते में टोल बैरियर पर उनकी स्थानीय टीम की तरफ से चाय-पानी का इंतज़ाम है, तो सब वहां रुकें। राजस्थान में किसान यात्रा की सभाओं की व्यवस्था देख रहे रामपाल जाट अब हमारे पथ प्रदर्शक भी थे। काफी देर चलने के बाद टोल बैरियर नहीं मिला तो पीछे से कुछ लोगों ने दरयाफ्त किया। रुककर पूछा तो मालूम हुआ कि हम रास्ता भटक गए। चाय वाली टीम का तो ख़ैर पता नहीं चला मगर वापस सही रास्ते पर पहुंचने में भी घंटा भर लग गया।

ये भी पढ़ें- किसान मुक्ति यात्रा और एक फोटोग्राफर की डायरी (भाग-1)

हाईवे पर चलते हुए बहुत अंदाज़ नहीं लगता मगर इससे दूर होते ही कुदरत की बदली रंगत नज़र आने लगी। अरावली की पर्वत श्रृंखला दिखने लगी, रेतीली मिट्टी का सुनहरा रंग, कांटेदार झाड़, गाय और भेड़ों के रेवड़ के साथ कंधे पर लाठी धरे मस्त अंदाज़ में चलते लोग और इक्का-दुक्का ऊंट गाड़ियां भी। अस्तांचल को जाते सूरज की आखिरी किरणें पड़तीं तो भेड़ों के रोयें चमकते और चरवाहों की पगड़ियों के रंग और चटख़ हो उठते। फोटो बनाने के क्रम में महसूस करने की निरंतरता के टूटने का अंदेशा था, सो कई बार मन होने पर भी कैमरा नहीं उठाया।

सिरोही के चौहान और उनकी तलवारों का ज़ोर ज़ेहन में नहीं आया। यों भी राजस्थान के किसी हिस्से में चले जाएं, राजपूती आन-बान-शान की बेशुमार कहानियां सुनने को मिल जाएंगी। मैं सिरोही नस्ल की बकरियों के बारे में सोच रहा था। इस नस्ल की ख़ूबी है कि बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इसका दूध कम नहीं होता और वजन बढ़ता रहता है। कई बीमारियों की प्रतिरोधक क्षमता भी इनमें होती है। रामपाल जाट बता रहे हैं कि सीमा के इलाकों के किसानों के लिए गुजरात में दूध बेचना ज्यादा मुफ़ीद है। अमूल होने के नाते वहां दो से पांच रुपये तक ज्यादा दाम मिल जाता है। मैं बाक़ी जगहों के दूध उत्पादकों के बारे में सोचने लगा। सिरोही वाले कम से कम दूध का दाम पाने में तो ख़ुशक़िस्मत हैं। बाजरा, अरण्डी और जीरा उगाते हैं। जब हम गेहूं, चावल, आलू, टमाटर उगाने वालों की मुश्किलों के बारे में बात करते हैं तो कभी जीरा भी हमारे ज़ेहन में आता है क्या?

ये भी पढ़ें- किसान मुक्ति यात्रा और एक फोटोग्राफर की डायरी (भाग-2)  

रास्ते में एक पेट्रोल पम्प के क़रीब चाय पीने रुके। रामदेव के नाम का एक ढाबा मिला। हो सकता है कोई भगत हो, या फिर पंडित का दिया हुआ नाम। सांझ हो रही थी सो अपने ठिकानों को लौटते परिंदों के झुंड तेज़ आवाज़ करते हुए आसमान में चक्कर लगा रहे थे। भीड़भाड़ देखकर दो-चार राहगीर रुक गए और सेल्फ़ी के शौकीनों को उनकी पगड़ी भा गई। कई लोग राहगीरों को घेरकर फोटो खींचने-खिंचाने में जुट गए। जगदीश इनामदार ने भी अपना फोन पकड़ाकर एक बुज़ुर्ग को कंधे से जकड़ लिया। वे भी सामने की ओर देखकर मुस्करा दिए। स्टेटस अपडेट और चाय के बाद आगे का सफ़र शुरू हुआ।

रात होने तक पावापुरी पहुंचे। पावापुरी तीर्थ की धर्मशाला में ठहरने का इंतज़ाम था। नियमों के मुताबिक़ भोजनशाला सूर्यास्त तक बंद हो चुकी थी सो खाने के लिए कहीं बाहर जाना था। तीर्थ के बाहर सड़क के पार खाने का ठिकाना देखकर मैं तो वहीं जम गया। तीर्थ परिसर की भव्यता का अंदाज़ा सुबह मिला। 90 हज़ार वर्गफुट में बना भगवान पार्श्वनाथ का मंदिर- बाहर की ओर बंसीपहाड़पुर का धूसर पत्थर और अंदर मकराना का संगमरमर। चारों ओर हरियाली और ख़ूब सफाई। 13 हजार वर्गफुट में बनी भोजनशाला। गोशाला, अस्पताल और लाइब्रेरी। नाश्ते में दलिया, खिचड़ी, दूध औऱ चाय। कुछ स्वाद और कुछ मेहमाननवाज़ी का अंदाज़, मन तृप्त हुआ। धन्यवाद कहकर बाहर आया और जल्दी-जल्दी परिसर का एक चक्कर लगाकर बाक़ी लोगों के साथ आ गया।

ये भी पढ़ें- किसान यात्रा : ‘यह जो अनुशासित लाइन है, यह खाद जुटाने के लिए पहुंचे किसानों की है’

सुबह एक गाँव में सभा है। सड़क किनारे चाय का एक खोखा और आसपास बैठकर बस के इंतज़ार में सुस्ताते मुसाफिर। चाय की दुकान पर बैठे मुसाफिर चाय के बाद कुछ और ताज़ा दम होने के इरादे से जेब में रखा चुरुट निकालते हैं, धुंए से काला पड़ गया पतला सूती कपड़ा और तम्बाकू वाली पॉलिथीन। इत्मीनान से चुरुट में तम्बाकू भरकर उसे सुलगाने के बाद कश लगाना शुरू किया तो कई मोबाइल कैमरे उनकी ओर तन गए। वे भी कभी मुंह से तो कभी नाक से धुंआ निकालते हुए शहरियों की हैरत पर मुस्कुराते रहे। पास के स्वास्थ्य केंद्र में जाकर देखा, डॉक्टर के कमरे बाहर कुछ महिलाएं अपने बच्चों के साथ अपनी बारी के इंतज़ार में हैं। बेहद सुस्त और उदास माहौल वाले स्वास्थ्य केंद्र में कुछ और देख पाता कि सभा ख़त्म हो गई।

पहले उदयपुर और फिर चित्तौड़गढ़ होते हुए भीलवाड़ा पहुंचना है। उदयपुर में किसानों की सभा है और बारिश शुरू हो गई। छाते लेकर पेड़ों के साये में खड़े नेताओं ने भीगते हुए किसानों को अपनी मंशा बताई। बेदला में जहां खाने के लिए रुके, वहां एक बोर्ड लगा देखा, जिस पर पुलिस, फायर ब्रिगेड और महत्वपूर्ण अफसरों के फोन नम्बर के साथ ही सांप पकड़ने वाले व्यक्ति का फोन नम्बर दर्ज़ था। यानी वे सचमुच मानते हैं कि इंसान भी कुदरत का ही हिस्सा है, जैसे कि पेड़-पौधे औऱ पशु-पक्षी। सांप मारने के लिए नहीं हैं, उन्हें पकड़कर अन्यत्र छोड़ दीजिए, वे अपनी रिहाइश का इंतज़ाम कर लेंगे। उन्हें मारना कुदरत के इंतज़ाम से छेड़छाड़ है।

ये भी पढ़ें- एक मालेगांव जो फिल्मों में दिखता है, दूसरा जहां किसान आत्महत्या करते हैं...

बारिश में भीगती मोटर के अंदर बैठकर मैं उदयपुर के दोस्तों को याद करता रहा- पेशे से चार्टर्ड अकाउण्टेंट मगर मन से फोटोग्राफर दिनेश पगारिया, चित्रकार हेमंत द्विवेदी, शाहिद परवेज़ को। पिछोला और फतेहसागर के पाल पर बिताई शामें दिमाग़ में कौंध गईं। चित्रकार शैल चोयल और उनका स्टुडियो याद आया। याद इसलिए कि किसी से मिल पाने का समय न था। अभी मैं एक कारवां का हिस्सा हूं, कुछ अलग नहीं करने को पाबंद।

चित्तौडगढ़ को छूते हुए आगे बढ़ गए। रास्ते भर पीपल, बरगद, गूलर, पाकड़ और नीम के बहुत पुराने और बहुत सारे पेड़ मिले। खेतों की चौहद्दी पर भी लोगों ने नीम लगा रखे हैं। इन पुराने पेड़ों को देखना बहुत सुखद अनुभव है। रास्ते में घी से तर बाटी, दाल और अद्भुत चूरना का भोज और फिर भीलवाड़ा। धर्मशाला पहुंचे तो मालूम हुआ कि ठहरने के लिए मुकर्रर जगह बहुत काफी और माकूल नहीं। मच्छरों का कोप भी ख़ासा डराने वाला है।

ये भी पढ़ें- किसान मुक्ति यात्रा (भाग-7) : ख़ुदकशी बस ख़बर बनकर रह जाती है

पुलिस महकमे के लोग अगले दिन के कार्यक्रम की रूपरेखा जानने के इरादे से पहुंचे हैं- कितने बजे, कहां के लिए निकलेंगे, कौन से रास्ते से जाएंगे? ज़ाहिर है कि यह सब जानना उनकी ड्यूटी का हिस्सा है मगर दिन भर की थकान के बाद आराम के तलबग़ारों के लिए चिढ़ाने वाला। योगेंद्र यादव और उनके साथ के लोग कहीं और ठहर रहे हैं। इस बातचीत के बीच वह आए और प्रस्ताव किया कि हम उनके ठिकाने पर रुक सकते हैं।

कुछ दूरी पर ओशो उपवन है, वहां दो-तीन कमरे मिल जाएंगे। काफी रात हो जाने के बावजूद वहां चाय पीने को मिली और सोने की जगह भी। सुबह हल्के संगीत के बीच आंख खुली। ओशो के इस आश्रम में ख़ूब हरियाली और ख़ामोशी है। उनके एकाध चित्र और एक बंसवारी के बीच छोटा सा तालाब भी। आश्रम में ओशो को महसूस की तमन्ना पूरी न हुई। मैंने ख़ुद को समझाया कि यह जो प्राकृतिक छटा और अन्तस तक घुल रही ख़ामोशी है, इसे ही उनका प्रसाद मान लिया जाए। पोहा और दलिया के नाश्ते से तरोताज़ा होकर आगे के सफर पर निकले।

अजमेर में नेताओं को प्रेस के लोगों से मिलना था और बाक़ी लोगों से कई दरग़ाह पर हाज़िरी देने की योजना बनाने में जुट गए। तीर्थ से गुज़रने वाले हर मुसाफ़िर की तरह का तर्क कि अब यहां तक आए हैं तो हो आना चाहिए। शहर में दाख़िल होकर थोड़ा भटकते हुए हम अपने ठिकाने पर पहुंचे तो हैरान हुआ। जिस रेस्टोरेंट में बातचीत होनी थी, उसका नाम है- मालगुड़ी डेज़। आरके नारायन की कल्पना का मालगुड़ी यहां रेस्तरां के रूप में हकीक़त था। रेस्तरां के बोर्ड आरके लक्ष्मण की रेखाओं से सजे थे।

ये भी पढ़ें- किसान मुक्ति यात्रा (भाग-6) : और एक दिन मेधा ताई के नाम

अभी हाल ही में ख़बर पढ़ी थी कि हरिवंश राय बच्चन की कविताओं के पाठ वाले कुमार विश्वास के वीडियो पर अमिताभ बच्चन ने उनको नोटिस भेज दिया। जवाब में विश्वास ने भी उस वीडियो से अर्जित 36.40 रुपये अमिताभ बच्चन को भिजवा दिए। इसे नारायन की कृति की ख्याति माना जाए या फिर कॉपीराइट का उल्लंघन? अमिताभ के नोटिस को नज़ीर माना जाए तो इस रेस्तरां के मालिक को भी नोटिस मिलना चाहिए। मालगुड़ी डेज़ की कहानियां मुझे प्रिय हैं, इन पर बने टीवी सीरियल की शुरुआती धुन 'ताना न ताना नाना न..' बरसों बाद भी गजब का रोमांच पैदा करती है।

पहली बार मैसूर गया तो वहां की ज़िंदगी में नारायन के पात्र खोजता रहा और बंगलुरू से होसुर की यात्रा में सड़क से गुज़रते हुए कुछ ऊंचाई पर मालगुड़ी रेस्टोरेंट देखकर जी जुड़ा गया था। यहां तो यह ‘मालगुड़ी डेज़’ है। इत्तेफ़ाक़ से रेस्तरां के मालिक भी मिल गए। उनसे पूछा तो मालूम हुआ कि वजह कम से कम वह नहीं जो मैं सोच रहा था। मालगुड़ी के बारे में उन्हें मालूम नहीं, बस कुछ अलग औऱ याद रहने वाला नाम सोचकर उन्होंने नामकरण कर डाला था। एक तरह से उनका सोचना दुरुस्त भी है, अब इतने दिनों बाद मैं उनके रेस्तरां के बारे आपको बता रहा हूं तो वजह उसका नाम ही है। दरग़ाह जाने के ख्वाहिशमंद थोड़े मायूस हुए, क्योंकि वहां जाने का समय नहीं निकल पाया।

ये भी पढ़ें- किसान मुक्ति यात्रा (भाग-4) : स्वागत में उड़ते फूल और सिलसिला नए तजुर्बात का

Tags:    farmer 
Share it
Share it
Share it
Top