आखिर क्यों होने चाहिए भारत के विकास के केंद्र में खेती और किसान

हाल ही में लंदन स्कूल ऑफ़ इकनॉमिक्स में राहुल गांधी से एक छात्र ने सवाल किया कि, 'भारत के विकास की बातचीत के केंद्र में खेती और किसान ही क्यों है? इंडस्ट्री और दूसरे क्षेत्र क्यों नहीं?' यह सवाल भारत के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को समझने समझाने के लिए बहुत सटीक सवाल है।

आखिर क्यों होने चाहिए भारत के विकास के केंद्र में खेती और किसान

चार दिन पहले लंदन स्कूल ऑफ़ इकनॉमिक्स में राहुल गाँधी छात्रों से बात कर रहे थे। संवाद में गांव, कृषि और किसान जैसे मुददे भी उठे। एक छात्र ने राहुल गांधी से सवाल किया कि 'भारत के विकास की बातचीत के केंद्र में खेती और किसान ही क्यों है? इंडस्ट्री और दूसरे क्षेत्र क्यों नहीं?' समय की सीमाओं में जवाब संक्षेप में ही हो सकता था। राहुल ने जितना बोला वह विश्व के उस मेधावी छात्र समुदाय के लिए काफी माना जा सकता है। लेकिन यह सवाल भारत के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को समझने समझाने के लिए बहुत सटीक सवाल था। विकास की आधुनिक अवधारणाओं के मुताबिक सुनने में यह सवाल जायज़ भी लगता है कि भारत की प्राथमिकता इंडस्ट्री क्यों नहीं होनी चाहिए? क्योंकि जब हम आर्थिक वृद्धि की बात करते हैं तो उसका मापन सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोत्तरी से ही करते हैं। यह प्रमाणित तथ्य है कि इंडस्ट्री यानी मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज हमारी जीडीपी में लगभग 85 फीसद योगदान कर रहे हैं। इसीलिए सामान्य रूप से भारत की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में इंडस्ट्री ही सबकुछ दिखती है। लेकिन यह भी एक सवाल है कि आजादी के बाद से ही भारत अगर कृषि प्रधान देश कहलाता रहा है तो उद्योग को इतनी ज्यादा तरजीह क्यों? बहरहाल, हमारी अर्थव्यवस्था में कृषि इतनी ज़रूरी क्यों है? इसके लिए आज़ादी के समय हमारी परिस्थितियां और उसके बाद के इतिहास को याद कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं है


क्या था राहुल गांधी का जवाब

राहुल गांधी ने सवाल के जवाब में कहा कि वे इंडस्ट्री और कृषि को अलग करके नहीं देखते। जब एक देश की अर्थव्यवस्था की बात होती है तो उसके सभी क्षेत्र एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इसी के साथ उन्होंने कृषि पर ज्यादा जोर देने की एक और वजह यह बताई कि कृषि की स्थिति अभी भी उद्योग की तुलना में कमज़ोर है। इसलिए उसे ज्यादा मदद की जरूरत है। समय की सीमाओं के कारण उनका इतना कहना मेधावी छात्रों के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। लेकिन अगर समय की गुंजाइश होती तो बात को विस्तार भी दिया जा सकता था।

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आज़ादी के बाद क्या तय किया था हमने

जब हम आज़ाद हुए तब आर्थिक मोर्चे पर हमारी हालत नाज़ुक थी। बंटवारे ने कपास, जूट जैसे उद्योगों की कमर तोड़ दी थी। काफी उपजाऊ ज़मीन पाकिस्तान के भूभाग में पड़ती थी। उस समय हमारे सामने अपनी आबादी को पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने की चुनौती थी। खाद्य उत्पादन में आत्म निर्भर बनना पहला लक्ष्य था। लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए आर्थिक विकास की योजनाएं बनाने का काम शुरू किया गया। आजादी के समय देश की आबादी का 75 फीसद हिस्सा आजीविकी के लिए कृषि पर ही निर्भर था। गौरतलब है कि उस समय जीडीपी में कृषि का योगदान 52 फीसद था। कृषि देश का प्राथमिक व्यवसाय था। लेकिन नीति निर्माता यह बात भी समझते थे कि इंडस्ट्री को बढ़ावा दिए बगैर किसी अर्थव्यवस्था का बढ़ना मुश्किल काम है। इसीलिए नीति निर्माताओं ने भारत के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था का विकल्प चुना। इसमें आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ मानव कल्याण भी जुड़ा हुआ था।


आजादी के 3 साल बाद जब योजना आयोग की स्थापना की गई हर पंचवर्षीय योजना में कृषि और इंडस्ट्री के बीच तालमेल बना कर ही खर्च निर्धारित किए गए। तब कोशिश की गई थी कि अगर एक पंचवर्षीय योजना में कृषि पर ज्यादा ध्यान लगाया गया है तो अगली बार इंडस्ट्री के विकास पर ज्यादा खर्च किया जाए। इसीलिए पहली पंचवर्षीय योजना में कुल खर्च की एक तिहाई रकम कृषि पर खर्च की गई। विकास की आधुनिक अवधारणाओं के लिहाज़ से कृषि पर इतना ज्यादा जोर देने पर आश्चर्य जताया गया था। लेकिन फिर दूसरी पंचवर्षीय योजना में इंडस्ट्री पर ज्यादा जोर दिया गया और कृषि को कुल खर्च का 20 फीसद मिला। हालांकि तब इंडस्ट्री पर ज्यादा जोर लगाने का फैसला सही साबित नहीं हुआ और हम अपने खाद्य उत्पादन के लक्ष्य से पीछे रह गए। इसीलिए तीसरी योजना में फिर कृषि को प्राथमिकता पर वापस लाया गया। इसके बाद ज़रुरत के हिसाब से कृषि और इंडस्ट्री पर बारी-बारी से खर्च होता आया है। समस्या तब हुई जब कृषि उत्पाद की कीमत उस रफ़्तार से नहीं बढ़ पाई जिस रफ़्तार से इंडस्ट्री के उत्पाद की कीमत बढ़ी। इसीलिए उत्पादन बढ़ते रहने के बावजूद भी कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान घटता चला गया।

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आर्थिक वृद्धि का पैमाना कितना समावेशी?

आर्थिक वृद्धि में इंडस्ट्री की ही मुख्य भूमिका नज़र आती है। सकल घरेलू उत्पाद में 85 फीसद योगदान भी उसी का है। कृषि का योगदान सिर्फ 15 फीसद के आस-पास है। ऐसा क्यों है? जवाब के लिए पड़ताल करेंगे तो यही निकल कर आएगा कि कृषि उत्पाद के दाम कम हैं।

खेती ही है देश की आधी से ज्यादा आबादी का रोज़गार

कृषि आज भी भारत की 58 फीसद जनसंख्या का मुख्य रोज़गार है। इसलिए देश की आर्थिक वृद्धि दर में बढ़ोत्तरी यानी इस विकास को समावेशी तो कतई नहीं माना जा सकता। इसीलिए जवाब बनता है कि कृषि को ही केंद्र में रखकर कोई समावेशी नीति बन सकती है। लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में उठे सवाल का जवाब भी इसी बात में है। आधी से ज्यादा आबादी जिस रोजगार में लगी है उसे प्राथमिकता पर रखना ही पड़ेगा।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और इंडस्ट्री को अलग कर के नहीं देखा जा सकता

सन 2007 में जब देश की आर्थिक वृद्धि दर सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई थी। तब उसका एक बड़ा कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आई तेज़ी को भी माना गया था। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही थी कि मनरेगा और किसान के क़र्ज माफ़ किए जाने से गांव तक पैसा पहुंच गया था। ग्रामीण भारत में औद्योगिक उत्पाद की खपत बढ़ गई। किसी भी उद्यम के लिए सबसे ज़रूरी बाज़ार होता है। गांव ही भारतीय उद्योग जगत के लिए बड़ा बाज़ार बन गए थे। इसीलिए आज जब सवाल उठता है कि नीति निर्माण में खेती और गांव पर ज्यादा ज़ोर क्यों? तब एक जवाब तो यह बनता ही है कि आधी से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है और कृषि अभी भी कमजोर है। लेकिन इसी के साथ एक पक्ष यह भी है कि कृषि को दी गई मदद से उद्योग को वाजिब मदद की गारंटी अपने आप मिल जाती है।

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यानी उद्योगों का भी पोषक है कृषि क्षेत्र

लंदन में उस संवाद का मुख्य निष्कर्ष यह था कि कृषि और इंडस्ट्री को अलग कर के नहीं देखा जा सकता है। दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। अगर ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधरती है या गांव के व्यक्ति का जीवन स्तर सुधरता है तो इंडस्ट्री के उत्पाद की खपत का बाज़ार भी तैयार होता है। जिस तरह गांव अपने कृषि उत्पाद के लिए सही दाम और बाज़ार तलाशते हैं वैसे ही इंडस्ट्री भी चाहती है कि देश के अंदर ही उसके उत्पाद की मांग तैयार हो। खासतौर पर शहरी मध्य या निम्न वर्ग जहां ग्रामीण भारत से भी कमजोर होता जा रहा हो वहां उद्योग को वाकई एक नए बाजार की जरूरत है। अगर निर्यात बढ़ाने में हम अपनी हैसियत नहीं बढ़ा पा रहे हैं तो इसके अलावा चारा ही क्या बचता है कि देश के भीतर ही नागरिकों की आय बढ़ाकर नया खरीददार वर्ग पैदा कर लें।

(सुविज्ञा जैन प्रबंधन प्रौद्योगिकी की विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रनोर हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

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