छोटी नदियां, बड़ी कहानियां : अवैध रेत खनन से ख़त्म होती नदियां

छोटी नदियां, बड़ी कहानियां : अवैध रेत खनन से ख़त्म होती नदियां4

अमिताभ अरुण दुबे

मध्यप्रदेश में कैबिनेट ने हाल ही में ‘नई रेत नीति’ को मंज़ूरी दी। इसके तहत पंचायतों को अब नदियों से रेत निकालने का अधिकार मिलेगा। सरकार का दावा है इससे अवैध रेत खनन पर अंकुश लगेगा। लेकिन इस मुद्दे पर सरकार को लगातार घेरने वाला विपक्ष नई रेत नीति के विरोध में है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के मुताबिक “नई रेत नीति से अवैध रेत खनन पर लगाम लगने की जगह अब ये और ज्यादा बढ़ेगा।”

सूबे में इस मसले पर सियासत तो हमेशा गर्माती रही है। लेकिन प्रदेश में अवैध रेत खनन को पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं माना जाता। इतना ही नहीं, पर्यावरण से जुड़ी सूबे की सैकड़ों संस्थाओं का ध्यान इस तरफ नहीं है। सियासत और अपराध की मिलीभगत से ये काला कारोबार फलफूल रहा है। मध्यप्रदेश की लाइफ लाइन नर्मदा हो या छिंदवाड़ा की जीवन धारा कुलबहरा, छोटी-बड़ी हर तरह की नदियां अवैध रेत खनन का शिकार है। सारी नदियां वज़ूद के ख़तरे से बुरी तरह जूझ रही है। अफ़सोस जनता के बीच भी अवैध रेत खनन सियासत से अलग जैसे मुद्दा ही नहीं है। अब तो प्रशासन भी छोटी नदियों को नदियां ही नहीं मानता।

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‘जागरूकता की कमी’

वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर प्रकाश हिंदुस्तानी के मुताबिक “आम जनता को अवैध रेत खनन के बुरे नतीज़ों की जानकारी ही नहीं है। इसलिए इसे पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं माना जाता। नदी अपनी रेत खुद छोड़े वो अलग बात है। लेकिन यहां तो जैसे नदियों का पेट चीरा जा रहा है।” डॉक्टर प्रकाश हिंदुस्तानी कहते हैं “अवैध खनन की वजह से मछली केकड़े कछुए जैसे जलीय जीव जंतुओं का जीवन ख़तरे में पड़ रहा है। जलीय जीवों का नैसर्गिक आशियाना छिन रहा है। प्रभावशाली लोग भी अवैध रेत खनन के कारोबर में लगे हैं।” वो बताते हैं कि नर्मदा के पानी को सबसे शुद्ध माना जाता है। यानी इसे हम बिना छाने ही पी सकते हैं। लेकिन अवैध रेत खनन के चलते अब ये स्थिति भी बिगड़ गई है। नर्मदा का पानी भी दूषित हो रहा है।

‘खनन शब्द नदी के साथ मेल नहीं खाता’

देश के जाने माने नदी विशेषज्ञ अभय मिश्रा बताते हैं “नदी से रेत निकालने के लिये ‘खनन’ शब्द हाल ही में अस्तित्व में आया। पहले इसके लिए ‘चुगान’ शब्द का इस्तमाल होता था। खनन शब्द नदी के साथ फिट ही नहीं बैठता।” अभय कहते हैं कि जिस तरह चिड़िया अपनी ज़रूरत का दाना चुगती है। उसी तरह हमें भी नदियों से रेत का चुगान करना होगा। आज ज़रूरत चुगान के पारंपरिक तरीकों की ओर लौटने की है। तभी नदी का वज़ूद संवरेगा। खनन से नदियां तबाह हो रही है। अभय बताते हैं कि “जलीय जीव जंतु नदी के बिगनिंग प्वाइंट से एंड प्वाइंट तक विचरण कर सके नदी के लिहाज से ये आदर्श स्थिति मानी जाती है। लेकिन बेतहाशा खनन की वजह से अब ये मुमकिन नहीं हो पा रहा है। अवैध रेत खनन अनियमित बाढ़ की वजह भी बन रहा है।” अवैध रेत खनन के लिये जागरूकता बढ़ाने की दरकार है। तभी नदियों को बचाने की मुहिम कामयाब होगी।

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‘अपराधियों का बढ़ता दखल’

मध्यप्रदेश में रेत की साढ़े 12 सौ से ज्यादा खदानें हैं। इनमें से डेढ़ सौ से ज्यादा अकेले नर्मदा नदी में है। यानी करीब ग्यारह सौ खदानें बाक़ी नदियों पर है। छिंदवाड़ा के स्थानीय अख़बार से जुड़े रिपोर्टर नीरज चौहान बताते हैं “ज़िले की ज्यादातर नदियां अवैध रेत खनन का शिकार है। अब तो इस कारोबार में संगठित अपराधियों का भी दखल बढ़ने लगा है। करीब नौ महीने पहले पंचमढ़ी ढाना में अवैध रेत खनन को लेकर गैंगवार हुई।

रेत माफिया राजनीति से जुड़े लोगों से अधिकारियों पर दबाव बनवाने का काम करते हैं।” अवैध रेत खनन से जुड़ी ख़बरों के कवरेज में किस तरह के जोखिम का सामना करना पड़ता है। इस सवाल के जवाब में नीरज बताते हैं “रेत माफिया के हौसले दिन ब दिन बढ़ते जा रहें हैं। ये लोग पत्रकारों को भी धमकाते हैं। अवैध रेत खनन से जुड़ी स्टोरी करने में जोखिम हमेशा बना रहता है।” कुलबहरा में अवैध खनन के बारे में नीरज कहते हैं कि “चंदनगांव और इमलीखेड़ा में कच्ची पक्की रॉयल्टी का खेल चल रहा है।

ठेकेदार ट्रैक्टर वालों को 400 रुपये कच्ची रॉयल्टी और 800 रुपये में पक्की रॉयल्टी पर रेत बेंचते हैं। यही नहीं तय किये रकबे से भी हटकर खनन किया जाता है।” नीरज ने हमें बताया कुलबहरा में गांगीवाड़ा, रोहना, खैरवाड़ा, बीसापुर, साख, जटामा सोनपुर घाट में जमकर अवैध रेत खनन होता है। चांद इलाके में चंदनगांव घाट, कौआखेड़ा तस्करों के सबसे बड़ा अड्डे हैं। छिंदवाड़ा ज़िला खनिज विभाग के मुताबिक अप्रैल 2017 से सितंबर 2017 के बीच अवैध खनन के 40, अवैध परिवहन के 46 और अवैध भंडारण के 9 मामले दर्ज हुए।

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‘प्रशासन नहीं मानता छोटी नदियों को नदियां’

‘छोटी नदियां बड़ी कहानियां’ सीरीज़ में अवैध रेत खनन के पहलू पर जब हमने जानकारी जुटानी शुरू की तो इस काले कारोबार से जुड़ी कई बातें हमारे सामने आई।जिन इलाकों में अवैध रेत खनन चल रहा है। वहां के लोग बताते हैं कि रेत माफिया कई जगह जेसीबी पोकलेन जैसी बड़ी मशीनें लगाकर खनन करते हैं। हाइवा डंपर जैसी बड़ी गाड़ियों से रेत परिवहन होता है। लेकिन ज़िला खनन विभाग उन पर कार्रवाई नहीं करता। दरअसल वैध खनन करने वाले ही नियमों को ताक पर रख चालाकी से अवैध खनन कर रहें हैं।

छिंदवाड़ा ज़िले में अवैध रेत खनन लगातार बढ़ रहा है। इस सीरीज़ की शुरूआत से हम ज़िला खनिज अधिकारी आशालता वैद्य से अवैध रेत खनन के बढ़ते मामलों पर बातचीत की कोशिश कर रहे थे। लेकिन उनसे बात नहीं हो पा रही थी। कई बार हम ज़िला खनिज विभाग भी पहुंचे। आखिरकार दीवाली के बाद ज़िला खनिज अधिकारी से हमारी मुलाक़ात हुई। जब हम ज़िला खनिज विभाग पहुंचे तो ज़िला खनिज अधिकारी की मेज पर मिठाईयों के डब्बे रखे थे। हमसे मुलक़ात से ठीक पहले एक ठेकेदार मिठाई के डिब्बों के साथ वहां पहुंचे हुए थे।

ज़िला खनिज अधिकारी आशालता वैद्य से जब हमने पूछा क्या छिंदवाड़ा ज़िले में अवैध रेत खनन चल रहा है। तो उन्होंने इससे इनकार करते हुए कहा कि“जिन लोगों को वैध खनन के लाइसेंस मिलें हैं, वो ठेकेदार ही अवैध रेत खनन नहीं होने देंगे। इसलिये अवैध खनन जैसी कोई बात है ही नहीं।” छोटी नदियों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा “छिंदवाड़ा ज़िले में अब नदियां ही कहां बची हैं। आप जिन्हें नदियां कह रहें हैं। वो नाले हैं।”आशालता वैद्य ने हमें ये बताते हुए कि उन्होंने जियोलॉजी से पीजी किया है।

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हमें रेत खनन को लेकर कई अजीब तर्क दिये। उन्होंने कहा कि“रेत खनन नदी के लिये अच्छा होता है। इससे बाढ़ से नदी में आने गंदगी की सफाई होती है। विकास के लिए रेत ज़रूरी है। नदी से जितनी ज्यादा रेत निकलेगी उतना अच्छा होगा।”हाल ही में ज़िला खनिज अधिकारी से जुड़ा एक मामला सुर्खियों में आया। जिसमें सीएम हेल्प लाइन में अवैध रेत खनन की शिकायत करने वाले गणेश ढोके ने उन पर अपहरण का आरोप लगाया। ढ़ोके का आरोप है कि ज़िला खनिज अधिकारी ने ठेकेदारों के लोगों के साथ मिलकर उनका अपहरण करवाकर, उन पर शिकायत वापस लेने का दबावबनाया।

हालांकि ज़िला खनिज अधिकारी ने इस आरोप से भी इनकार किया है। अब छिंदवाड़ा पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। समाजसेवी नीरज शुक्ला कहते हैं कि “नदियों को अवैध रेत खनन से बचाने के लिए अब लोगों को आगे आना होगा। अवैध खनन को पर्यावरण से जुड़ी बड़ी समस्या मानना होगा। ज़िले में पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को जागरूकता अभियान चलाने होंगे।”‘कुलबहरा की कहानी’ की अगली कड़ी में हम इसके किनारे खेतों में फैली समृद्धि का जिक्र करेंगे।

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