छोटी नदियां बड़ी कहानियां : बोदरी भी कभी नदी थी

आज जब देश की मुख्य नदियां गंदे नाले में तब्दील हो रही हों तो फिर छोटी नदियों की कौन कहे। ढेरों नदियां ऐसी हैं जिनका जिक्र किसी दस्तावेज में नहीं है लेकिन अतीत में ये छोटी नदियां बड़ी नदियों को सूखने से बचाती रही हैं। जानिए मध्य प्रदेश की ऐसी ही एक छोटी नदी बोदरी के बारे में…

छोटी नदियां बड़ी कहानियां : बोदरी भी कभी नदी थीबोदरी नदी 

अमिताभ अरुण दुबे

लखनऊ। 'बड़ी नदियों के साथ छोटी नदियों को भी बचाने की दरकार है। तब ही भावी पीढ़ी के लिए 'बेहतर जल, बेहतर कल' का सपना साकार होगा। क्योंकि बुनियादी रूप से बड़ी नदियों और छोटी नदियों का वज़ूद एक दूसरे से जुड़ा है।

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यहां तक की कई बार छोटी नदियां बड़ी नदियों को सूखने तक से बचाती हैं। लेकिन अफ़सोस ढेर सारी नदियों वाले हमारे देश में छोटी नदियों का ज़िक्र किसी दस्तावेज़ में नहीं मिलता। यही नहीं उपेक्षा की शिकार ऐसी कई नदियां नालों में तक तब्दील हो रही हैं। 'छोटी नदियां, बड़ी कहानियां' सीरीज़ में मध्यप्रदेश की ऐसी ही नदियों की कहानियां। सीरीज़ की पहली कड़ी छिंदवाड़ा ज़िले की बोदरी की कहानी।'

शहरों में भी गांव बसते हैं। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में ऐसी ही एक बसाहट है कोलाढाना। जिसने शहर का हिस्सा होने के बावजूद अपना ग्रामीण स्वरूप नहीं खोया। खेत खलिहान, तीज-त्योहार, संस्कृति, परंपराए और लोगों के रहन सहन का तौर तरीका सबकुछ गांव जैसा। 80 दशक में तो कोलाढाना पूरी तरह एक गांव ही था। जिसकी पहचान थी बोदरी नदी। उस दौर में बोदरी आज की तरह नाला नहीं थी। बल्कि वो एक सुंदर नदी थी। यहां जन्मे 65 साल के सुखचंद साहू कहते हैं बोदरी नदी के साथ उनकी कई अच्छी यादें जुड़ी है। वो बताते हैं "बचपन से मैंने बोदरी में बहता हुआ साफ पानी देखा। बारिश में बाढ़ को आते देखा। भीषण गर्मियों में भी इसका पानी नहीं सूखता था। गर्मियों की छुट्टियों में हम सभी दोस्त यहां घंटों बिताते थे।"सुखचंद साहू बोदरी के अतीत को याद कर भावुक हो जाते हैं।

वो बताते हैं कि 20 साल पहले तक गांव के क़रीब क़रीब सभी लोग इसका पानी पीते थे। इतना ही नहीं नदी के किनारे छोटी छोटी झिरिया यानी झील बनाकर निस्तार की ज़रूरतें जैसे बर्तन कपड़े धोना तक यहीं करते थे। गांव के बुजुर्ग कलीराम यादव के मुताबिक बोदरी के किनारे ढेर सारे आम के पेड़ लगे थे। लिहाज़ा गर्मियों में ये सबकी पसंदीदा जगह बन जाती थी। कलीराम बताते हैं " बोदरी नाला हुई तो आम के पेड़ भी ख़त्म होते गए। अब तो इसके किनारे गिनती के के पेड़ बचें हैं।"

'खजरी सोमाढाना से निकली बोदरी'

करीब 12 से 15 किलोमीटर बहने वाली बोदरी का उद्गम छिंदवाड़ा शहर के खजरी और सोमाढाना की दो धाराओं से होता है। शहर में इसका घुमाव करीब 7 किलोमीटर है। ये कुलबेहरा की सहायक नदी है। सोनपुर में बोदरी और कुलबेहरा का संगम है। आगे चलकर कुलबेहरा पेंच नदी में मिल जाती है। पेंच नदी बेनगंगा और कन्हान के जरिये दक्षिण की गंगा के नाम से विख्यात गोदावरी नदी में मिलती है। जो आगे चलकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। बोदरी नदी का ये नाम कैसे पड़ा। इसका जिक्र कहीं नहीं मिलता है। गांव के लोग बताते हैं बोदरी का मतलब क्या होता उन्हें भी नहीं मालूम। छिंदवाड़ा में प्रतियोगी परीक्षाओं के छात्रों को पढ़ाने वाले निशांत पांडेय बताते हैं कि बारह साल पहले उन्होंने जब छात्रों को पढ़ाने के लिए छिंदवाड़ा की क्षेत्रीय नदियों की जानकारी जुटानी शुरू की। लेकिन बोदरी का उल्लेख उन्हें कहीं नहीं मिला। निशांत ने स्थानीय लोगों से बातचीत कर, वन विभाग के दस्तावेजों से इसके बारे में जानकारी जुटाई। उसके नोट्स बनाकर। छात्रों को जानकारी देनी शुरू की। निशांत बताते हैं बनारस में उनका बचपन बीता । गंगा किनारे परवरिश होने की वजह से नदियों से उन्हें गहरा लगाव है। बोदरी की सफाई के लिए वो अपने स्तर पर कुछ करने की ख्वाईश भी रखते हैं।

'कैसे नाला बनी बोदरी'

वरिष्ठ पत्रकार जगदीश पवार बताते हैं 1980 तक बोदरी में फ्लो था। यानी इसमें साफ पानी बहता था। और ये नदी कहलाने के सभी मानकों पर ख़री उतरती थी। लेकिन 90 के दशक में जब शहरीकरण ने पांव पसारने शुरू किये, तो इसकी सबसे ज्यादा गाज बोदरी भी गिरी। नई कॉलोनियां नये मकानों से निकलने वाली गंदी नालियां बोदरी में सीधे बहाई जाने लगी। धर्मटेकरी, सुभाष कॉलोनी, विवेकानंद कॉलोनी, कलेक्ट्रेट, गुरैया सब्जी मंडी देखा जाए तो शहर का ऐसा कोई कोना नहीं जहां की गंदगी बोदरी में नहीं आती हो। केवल दो दशक में बोदरी साफ सुथरी नदी से पूरी तरह गंदा नाला बन गई। गर्मियों में छिंदवाड़ा –नागपुर स्टेट हाईवे पर बने बोदरी पुल से चलने वाली बदबूदार बयार शहरीकरणका बुरा परिणाम है। दो-तीन साल पहले एक क्षेत्रीय अख़बार ने छिंदवाड़ा नगरनिगम और स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से बोदरी की सफाई का अभियान चलाया था। लेकिन ये केवल औपचारिकता साबित हुआ। समाजसेवी नीरज शुक्ला कहते हैं"बोदरी के बहाने अख़बार की ब्राडिंग हो गई। बाद में नगर निगम ने भी इस पर ज्यादा तव्वजो नहीं दिया।"

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'बोदरी के चार डोह'

सुखचंद साहू के मुताबिक बोदरी नदी चार डोह यानी गहरे स्थान के लिए मशहूर रही। ये डोह कोलाढोह जिसके किनारे कोलाढाना बसा है। इसके अलावा चटाई डोह, आम डोह और गुघ्घू डोह हैं। कोलाढोह में धोबीबाबा का पूजन स्थान भी है। जो दो चट्टानों के बीच में है। यहां अखाड़ी के त्योहार में स्थानीय लोग पूजा करने जाते हैं। धोबी बाबा को नारियल, गांजा, भांग की भेंट चढ़ाई जाती है। मान्यता है कि धोबी बाबा के स्थान की पूजा से बोदरी नदी में कभी कोई हादसा नहीं होता। रिटायर्ड पटवारी जयराम धारकर बताते हैं कि पचास साल में बोदरी में डूबने के दो या तीन ही हादसे हुए। लेकिन इनमें गांव का कोई भी शख़्स नहीं था।

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'क्यों ज़रूरी है बोदरी'

वरिष्ठ पत्रकार जगदीश पवार के मुताबिक छिंदवाड़ा ज़िले की कुलबेहरा नदी को बचाने की दरकार है। कुलबेहरा पेंच की सहायक नदी है। तोतलाडोह डेम से जुड़ी होने के कारण पेंच नदी का महत्व मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र दोनों राज्यों के लिए एक समान है। चूंकि बोदरी कुलबेहरा की सहायक नदी है इसलिए अगर इसे बचाया जाता है तो इसका लाभ दोनों बड़ी नदियों को समान रूप से मिलेगा। हालांकि वो ये भी कहते हैं कि बोदरी नदी की सफाई अब करीब करीब नामुमिकन है, क्योंकि शहर की पूरी गंदगी इसमें आ रही है।

आध्यात्म गुरू जग्गी वासुदेव

आध्यात्म गुरू जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन के नदी बचाओ और नर्मदा मिशन से जुड़े विवेक चौहान कहते हैं कि " छोटी-छोटी नदियों को बचाकर बड़ी नदियां बचाई जा सकती हैं। शहर के लोगों को एक साथ मिलकर यदि अब भी ठानें तो बोदरी की सफाई संभव है।" छिंदवाड़ा के लोगों ने 20 साल में एक अच्छी ख़ासी नदी को नाला बना दिया। देश में बोदरी जैसी कई नदियां हैं। जो कहीं ना कहीं हमारी ग़लतियों की वजह से नाला बन रहीं हैं। गांव हो या शहर छोटी नदियां दोनों की रोनक बढ़ा सकती है। आज भी ये छोटी नदियां बड़ी खुशियों का सबब बन सकती है।

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