कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में गांधीजी बोले थे 'सीतारामैया की हार मेरी हार होगी'

आज ही के दिन, यानि 2 जुलाई 1940 को ब्रिटिश हुकूमत ने सुभाषचंद्र बोस को गिरफ्तार कर लिया था। सुभाष भारतीयों को बर्बर बताने वाले हॉलवेल स्मारक को हटाने की मांग कर रहे थे। पिछले 20 बरस में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की यह 11वीं गिरफ्तारी थी। इससे लगभग एक बरस पहले नेताजी ने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए गांधी जी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारामैया को हराया था। चुनावों से पहले बापू ने कहा था, "सीतारमैया की हार मेरी हार होगी"। पढ़िए इस अनोखी टक्कर और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी के अनोखे योगदान के बारे में:

कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में गांधीजी बोले थे सीतारामैया की हार मेरी हार होगीगांधी जी नहीं चाहते थे सुभाष चंद्र बोस दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बने

'जब नेता जी को लगा कि हिटलर पर विश्वास नहीं किया जा सकता तो उन्होंने जर्मनी छोड़ दी और जापान चले गए। जापान में पहले से ही एक महान क्रान्तिकारी रास बिहारी बोस मौजूद थे, जिनके सम्पर्क में नेता जी आए। वहीं पर 'आजाद हिन्द फौज' के गठन का निर्णय हुआ'

सीतारामैया की हार मेरी हार होगी'और हार हो गई। कांग्रेस अध्यक्ष का 1939 में चुनाव होना था, जिसके लिए सुभाष चन्द्र बोस ने अपना नाम घोषित कर दिया था। उनसे चुनाव कौन लड़ेगा यह नहीं तय हो पा रहा था। जवाहर लाल नेहरू ने लड़ने से इनकार कर दिया था और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपना नाम वापस ले लिया था। महात्मा गांधी किसी भी कीमत पर नेता जी को दूसरी बार अध्यक्ष के रूप में नहीं देखना चाहते थे। उन्होंने आंध्र प्रदेश के डॉक्टर पट्टाभि सीतारामैया को लड़ाया और खुलकर अपना विचार रखा।

गांधी जी किसी कीमत पर नेता जी को कांग्रेस के दूसरे अध्यक्ष के रूप में नहीं देखना चाहते थे, उन्होंने सबसे कह दिया था सीतारामैया की हार मेरी हार होगी'

इस प्रकार नेता जी का रास्ता महात्मा गांधी के रास्ते से टकरा गया। महात्मा गांधी की अहिंसावादी नीतियों को नेता जी की यह खुली चुनौती थी। जब जनवरी 1939 में सीतारामैया की हार हुई तो गांधी जी ने कहा कि यह सीतारामैया से अधिक मेरी हार है क्योंकि उन्होंने ही सीतारामैया को नाम वापस नहीं लेने दिया था। गांधी जी के मन में कड़वाहट रही हो या न रही हो, वह वर्धा चले गए। बाद में नेता जी ने अध्यक्ष पद से अपना त्यागपत्र दे दिया था और कांग्रेस से अलग अपना रास्ता चुन लिया था।

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मेरे मित्र रविशंकर के पिता स्वर्गीय रामशंकर सक्सेना ने 1960 में एक अखबार मुझे दिखाया था, शायद नेशनल हेराल्ड ही था। उसके पहले पेज की पहली हेडिंग थी ''नेता जी इस्केप्स टु काबुल"। उसके बाद तो नेता जी के विषय में बराबर पढ़ता रहा और समझने की कोशिश करता रहा। भारतवासियों के दिल और दिमाग पर नेता जी हमेशा छाए रहे, कभी अंग्रेजों को चकमा देकर अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी जाने पर, कभी जर्मनी से आजाद रेडियो पर सम्बोधन करके, कभी 'आजाद हिन्द फौज' को नेतृत्व देकर और कभी भारत की पूर्वात्तर सीमा पर आजादी की दस्तक देकर।

नेता जी का त्याग और बलिदान का रास्ता भारत के नौजवानों को बहुत पसन्द था। वह अहिंसा में विश्वास नहीं करते थे और उनका कहना था, "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा"। उन्होंने दुश्मन के दुश्मन को अपना दोस्त समझा और जर्मनी-जापान के खेमे में चले गए। इसका एक कारण हो सकता है कि हिटलर अपने को आर्य कहता था और स्वास्तिक का चिन्ह मानता था। उसका स्वास्तिक भारतीय स्वास्तिक का उल्टा बनता था। वास्तव में हिटलर भारतावासियों को सम्मान की नज़रों से नहीं देखता था।

जब नेता जी को लगा कि हिटलर पर विश्वास नहीं किया जा सकता तो उन्होंने जर्मनी छोड़ दी और जापान चले गए। जापान में पहले से ही एक महान क्रान्तिकारी रास बिहारी बोस मौजूद थे, जिनके सम्पर्क में नेता जी आए। वहीं पर 'आजाद हिन्द फौज' के गठन का निर्णय हुआ और नेता जी की कमांड में यह फौज काम करने लगी। इस फौज में वे भारतीय सिपाही थे जो युद्धबन्दी के रूप में जापान द्वारा पकड़े गए थे। नेता जी ने इन भारतीयों में स्वाधीनता और स्वाभिमान की चिंगारी डाल दी।

फाइल फोटो

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'आजाद हिन्द फौज' की स्थापना तो हो गई थी परन्तु उसे चलाना और उसका विस्तार करना चुनौती भरा काम था। विदेशों में रहने वाले भारतीय लोग नेता जी को बहुत प्यार करते थे, उनके लिए मर मिटने को तैयार थे। उन्हीं के द्वारा धन एकत्रित करके फौज का खर्चा चलता था। एक बार सिंगापुर में नेता जी को सोने चांदी से तौला जाना था, फौज के लिए धन जुटाने के वास्ते। गहने कम पड़ रहे थे, पलड़ा उठ ही नहीं रहा था। एक बुजुर्ग महिला अपने जीवन भर की कमाई के गहने लेकर आई और पलड़े में डाल दिया। वजन बराबर हो गया। सब की आंखें ख़ुशी से नम हो गईं।

भारत छोड़ने के पहले कांग्रेस में नेता जी ने हिन्दू-मुस्लिम एकता की नींव डाली थी। तब मुहम्मद अली जिन्ना जैसे लोगों के पास कांग्रेस के खिलाफ बोलने को ज्यादा कुछ नहीं था। लेकिन गांधी जी के वैष्णव तौर तरीकों के कारण मुस्लिम लीग के लोग इसे हिन्दू कांग्रेस कहने लगे थे। अंग्रेजों ने गांधी और नेता जी के बीच की दूरियां बढ़ाने और कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में बैरभाव बढ़ाने में बड़ा षड्यंत्र रचा। नेता जी की विरासत को कांग्रेस बचा नहीं सकी और भारत विभाजन की डगर पर चल पड़ा।

नेता जी अपने को स्वामी विवेकानन्द का अनुयायी मानते थे और उनके अन्दर देशभक्ति की प्रचंड भावना आई थी स्वामी जी के लेखों और विचारों से। नेता जी ने दर्शन शास्त्र को अपना विषय चुना था, स्वामी विवेकानन्द के विचारों से बहुत प्रभावित थे और सही कहें तो स्वामी जी के मिशन को ही आगे बढ़ाया। दोनों ने देश के युवाओं को बहुत प्रभावित और जागृत किया था।

नेता जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार के सम्पर्क में भी आए थे जब दोनों ही कांगेस पार्टी के सदस्य थे। कहते हैं जब 1928 में कलकत्ता में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ था तो नेता जी और डॉक्टर हेडगेवार का विचारों का आदान-प्रदान हुआ था और दोनों ने एक दूसरे को समझा और सराहा था। यद्यपि दोनों ही अहिंसा के मार्ग की सफलता पर शंकालु थे परन्तु वे एक साथ नहीं आ सके। शायद संघ की हिन्दू राष्ट्र की कल्पना को लेकर मतभेद रहे होंगे।

जवाहरलाल नेहरू और तेज बहादुर आईएनए की सुनवाई के दौरान।

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इसके विपरीत गांधी जी का स्वाधीनता संग्राम का रास्ता था लाठियों का प्रहार झेलते रहो मगर अंग्रेजों के प्रति क्रोध और द्वेष भाव न लाओ। भारतवासियों के दिल में नेता जी इस कदर बैठे थे कि जब कांग्रेस ने 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन छेड़ा तो नेता जी भले ही कांग्रेस में नहीं थे, उनके द्वारा पैदा किया गया जोश हर नौजवान में था। वर्ष 1922 में चौरी-चौरा का थाना जब फूंक दिया गया और सत्याग्रही आक्रामक हो गए तो सुभाष चन्द्र बोस की विचारधारा को विजयी होता देख गांधी जी ने सत्याग्रह आन्दोलन ही वापस ले लिया।

अहिंसा के प्रति महात्मा गांधी की प्रतिबद्धता से इनकार नहीं किया जा सकता परन्तु जब उन्होंने हिटलर की सेना के खिलाफ भारतवासियों को अंगेज़ी सेना में भाग लेने के लिए कहा तो यह अहिंसक आन्दोलन में भाग लेने की बात नहीं थी। जब पटेल ने कश्मीर के लिए सेनाएं भेजीं या हैदराबाद के निज़ाम को बलपूर्वक हटाया अथवा जब नेहरू ने गोवा को आज़ाद कराने के लिए सेनाएं भेज कर पुर्तगाल शासन समाप्त किया तो यह सब अहिंसात्मक नहीं था। इसलिए बोस के साथ मतभेद सैद्धान्तिक नहीं कहे जा सकते। सवाल सर्वोच्चता का था।

मैं 1968 में जब कनाडा में था, एक किताब पढ़ी थी, "नेताजी एैट क्रासरोड्स" जो कलकत्ता में नेता जी शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित की गई थी, अब प्रकाशन में नहीं है। इसमें विस्तार से बताया गया था कैसे नेता जी आईसीएस का पद ठुकराकर आजादी की लड़ाई में गांधी जी के साथ आए थे और भारत के नौजवानों के हृदय सम्राट बन गए थे। उनके जीवन और आदर्शों को देश के नौजवानों तक पहुंचाने के बजाय नेता जी को नेहरू सरकार द्वारा भुलाने की कोशिश की गई। एक प्रखर समाजवादी, उत्कट देशभक्त और पंचवर्षीय योजनाओं का जन्मदाता नज़रअन्दाज़ किया गया।

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मुझे ठीक से याद है आज़ादी के तुरन्त बाद जब हम लोग एक दूसरे को 'जय हिन्द' का अभिवादन करते थे, मिलते थे तब भी और विदा होते थे तब भी। अब तो बस पुलिस के बीच में ही यह अभिवादन सुनाई देता है। आजादी मिलने के पहले तो नौजवानों की ज़ुबान पर 'दिल्ली चलो' और 'इन्कलाब जिन्दाबाद' का नारा रहता था। देश की हवा में शान्ति और अहिंसा नहीं बल्कि 'इन्क़लाब ज़िन्दाबाद' की तरंगें हिलोरें लेती थीं, जिससे असहयोग आन्दोलन को भी बल मिलता था। धीरे-धीरे नेहरू सरकार ने नेता जी को भुलाना शुरू किया और नौजवानों के दिलों में देशभक्ति की चिनगारी बुझती चली गई।

अहिंसा की विजय हुई इसका कारण ढूंढने की ज़रूरत नहीं है। अंग्रेज़ पहले ही द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण आर्थिक रूप से जर्जर हो चले थे ऊपर से चालीस के दशक में भारत के क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजों को गहराई तक हिला दिया। इसका अच्छा वर्णन 'पियर एलियट और कालिन्स' ने अपनी पुस्तक 'फ्रीडम एैट मिड नाइट' में किया है। नेता जी भारत के क्रान्तिकारियों के प्रेरणा श्रोत थे और नेता जी के प्रेरणा श्रोत थे स्वामी विवेकानन्द। दुनिया में अंग्रेजों का साम्राज्य चालीस के दशक में एक गिरती हुई दीवार की तरह था, सिर्फ एक धक्का देने की आवश्यकता थी। नेता जी की मौत कब, कैसे और कहां हुई, इस पर से पर्दा उठाने का प्रयास कई बार हुआ है लेकिन बात आगे बढ़ती नहीं। अब 23 जनवरी 2016 को नेता जी से सम्बन्धित सभी गोपनीय फाइलें सार्वजनिक करने का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वादा किया है, शायद सच्चाई सामने आ जाय। भारतवासियों के मन में सबसे बड़ी पीड़ा यह सुनकर रही है कि अंग्रेजों ने नेता जी का नाम युद्ध अपराधियों की सूची में डाल रखा है और किसी समझौते के अनुसार भारत सरकार को उन्हें इंग्लैंड को सौंपना होगा, यदि वे भारत में आते हैं।

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सवाल उठेंगे क्या सचमुच नेहरू जैसे शिखर पुरुष ने नेता जी की खुफियागीरी कराई होगी और यदि हां तो उनकी मंशा क्या थी। क्या नेहरू को अपनी कुर्सी से इतना प्यार था अथवा उनके सामने अन्तर्राष्ट्रीय समझौते की कोई मजबूरियां थीं। बड़ा सवाल है यदि नेता जी मिल जाते तो नेहरू उनका क्या करते?

नेता जी के साथी सहगल, ढिल्लो, शाहनवाज जैसे लोगों को नेहरू ने सम्मान दिया था। कैसे मान लें कि उनके मन में प्रतिद्वन्द्वी नेता जी के प्रति द्वेष भाव था। नेहरू इतने नादान नहीं थे कि नेता जी को जेल में डाल देते या पश्चिमी देशों को सौंप देते। कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत की जनता क्या करती।

नेहरू के मन में अगर कड़वाहट थी तो पटेल के प्रति, ऐसा कुछ लोगों का सोचना है। इतिहासकार दुर्गादास ने अपनी पुस्तक 'इंडिया फ्राम कर्ज़न टू नेहरू' के पेज 305 पर लिखा है कि नेहरू नहीं चाहते थे कि देश के राष्ट्रपति पटेल की शव यात्रा में शरीक हों। उन्होंने कहा इससे गलत परम्परा पड़ेगी। डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि इस मामले में प्रधानमंत्री की राय मानना मेरे लिए बाध्यता नहीं है और वह बम्बई जाकर शामिल हुए।

भारत को आजाद कराने के लिए नेता जी की 'आजाद हिन्द फौज' पूर्वोत्तर भारत तक पहुंच गई थी। चिटगांव और कोहिमा तक पहुँच तो गए लेकिन संसाधनों की कमी के कारण उनके पास राशन तक नहीं बचा। उधर अंग्रेजों और नेता जी के कुछ विरोधियों ने दुष्प्रचार किया कि नेता जी भारत पर आक्रमण करने आ रहे हैं। पासा पलट गया। इस सब के बावजूद कुछ लोग मानते हैं कि नेता जी फैजाबाद में 1985 तक एक सन्यासी के रूप में अज्ञात वास में रहे थे। कोई भी साधारण बुद्धि का आदमी इस पर विश्वास नहीं करेगा।

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