इंसेफेलाइटिस से बच्चों की जान बचाने के लिए यूपी का प्लान तैयार, चौंकाने वाले हैं मौत के आंकड़े

इंसेफेलाइटिस से बच्चों की जान बचाने के लिए यूपी का प्लान तैयार, चौंकाने वाले हैं मौत के आंकड़ेइंसेफेलाइटिस

उत्तर प्रदेश सरकार और बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य व सुरक्षा के लिए काम करने वाली संस्था यूनिसेफ यूपी ने मिलकर दिमागी बुखार यानि इंसफेलाइटिस के बारे में जागरूक करने के लिए 'दस्तक' अभियान की शुरुआत की। इस अभियान के तहत पूर्वी उत्तर प्रदेश के 38 ज़िलों के 117 गाँवों के लोगों को जागरूक किया जाएगा। दिमागी बुखार - एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) व जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) पूर्वांचल में एक महामारी की तरह फैला है।

बीते साल अगस्त में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से जब एक साथ 30 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो गई तब पूरे देश में ये मामला छा गया था। वे बच्चे इंसेफेलाइटिस के मरीज़ थे। वैसे तो दिमागी बुखार देश के 17 राज्यों के लगभग 171 ज़िलों में फैला है लेकिन पूरे देश में होने वाले कुल एईएस व जेई के मामलों में से 60 फीसदी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और बस्ती मंडल से होते हैं। साल 2017 में एईएस और जेई के कुल 4724 मामले सामने आए जिसमें से 654 की मौत हो गई। इस बीमारी की चपेट में आने वाले 85 फीसदी बच्चे 10 साल से कम उम्र के होते हैं।

इस अभियान की शुरुआत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को की। कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि पूर्वांचल की महामारी बने दिमागी बुखार एईएस और जेई को हौवा न बनाएं बल्कि इसके बारे में लोगों को जागरूक करें। उन्होंने कहा कि एईएस-जेई के अभियान से किसी भी हालत में झोलाछाप डॉक्टरों को न जोड़ें। जैसे ही झोलाछाप का तंत्र इस अभियान से जुड़ेगा सरकार की पूरी कवायद परास्त हो जाएगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि दस्तक अभियान के माध्यम से पूर्वांचल में लोगों के घरों तक पहुंचकर एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस)-जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) के बारे में जानकारी देनी होगी। लोगों को बताना होगा कि वह किसी भी तरह का बुखार होने पर लापरवाही न करें, तुरंत किसी सरकारी चिकित्सालय प्राथमिक या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या जिला अस्पताल पहुंचें क्योंकि ये इंसेफेलाइटिस के कारण भी हो सकता है।

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यूनिसेफ उत्तर प्रदेश की प्रमुख रुथ लियानो ने कहा इस अभियान के बारे में बताते हुए का कि दस्तक के अर्थ को सार्थक करते हुए हम पूर्वी उत्तर प्रदेश के घरों में कुंडी बजाकर बताएंगे कि ये बीमारी दस्तक दे उससे पहले ही इससे बचने के तरीकों के बारे में जान लें। यूपी के चिकित्सा स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने बताया कि एईएस व जेई से प्रभावित 38 ज़िलों में स्वास्थ्य विभाग ये अभियान चलाएगा। यूनिसेफ के कार्यकर्ता गोरखपुर और बस्ती मंडल के सात प्रभावित ज़िलों के हर गाँव में जाकर लोगों को लोगों को ज़मीनी स्तर पर इस बीमारी के बारे में जागरूक करेंगे।

क्या होता है इंसेफेलाइटिस

एईएस और जेई मच्छरों के काटने से होने वाली बीमारी हैं। वैसे तो ये बीमारी काफी पुरानी है लेकिन भारत में इसका पहला मामला 1973 में पश्चिम बंगाल के बंकुरा ज़िले में सामने आया था। पूर्वी उत्तर प्रदेश में 1978 में एक साथ 528 लोगों की इस बीमारी से मौत हुई थी, तभी पहली बार ये बीमारी यहां प्रकाश में आई थी। 1978 से 2016 तक सिर्फ गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ही इंसेफेलाइटिस के 39,100 मरीज भर्ती हुए और इसमें से 9286 बच्चों की मौत हो गई। साल 2005 में इस बीमारी से पूर्वांचल में 1500 बच्चों की मौत हुई थी। 2012 में कम होकर ये आकंड़ा 532 हो गया और 2016 में पहले से ज़्यादा 694 बच्चों की मौत हुई। गंदे पानी और मच्छर के काटने से फैलने वाली इस बीमारी ने कई देशों में दस्तक दी थी लेकिन अधिकतर देशों ने टीकाकरण और दूसरे प्रयासों से इस बीमार पर काबू पा लिया लेकिन पूर्वांचल में यह बीमारी तेज़ी से बढ़ी।

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पिछले कुछ साल में जेई पर तो काफी हद तक काबू पा लिया गया लेकिन एईएस अभी भी यहां महामारी की तरह फैला है। यह बीमारी पूरे साल में कभी भी हो सकती है लेकिन बारिश में इसका वायरस ज़्यादा सक्रिय हो जाता है। चिकुनगुनिया (येलो फीवर) और दिमागी बुखार को पहचाने में लोग अक्सर गलती कर देते हैं या तो बहुत देर से पहचानते हैं जिससे रोगी की जान पर बन आती है। ये बीमारी ग्रामीण इलाकों में ज़्यादा होती है जहां लोग झोलाछाप के चक्कर में आ जाते हैं या घर पर ही इलाज़ करना शुरू कर देते हैं लेकिन इसका मतलब सिर्फ बीमारी को बढ़ाना ही होता है। बुखार की सही पहचान करने के लिए सीटी स्कैन, दिमागी की एमआरआई, ईसीजी, खून कि जांच करवाना चाहिए उसके बाद ही बुखार की सही वजह पता चल सकती है।

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रचार्य डॉ. केपी कुशवाहा के मुताबिक, ‘यह जीव जंतुओं और पक्षियों में मच्छर के जरिए फैलता रहता है। सुअर के खून में इसका प्रजनन सबसे तेज़ी से होता है। जब सुअर के खून से मच्छर किसी व्यक्ति में यह वायरस फैलाता है तो यह काफी घातक होता है। डॉ. केपी कुशवाहा बताते हैं कि इसका मच्छर धान के खेत में ही होता है वह घरों में नहीं आता, घर के बाहर ही रहता है। इसका मच्छर ज़्यादा ऊपर तक भी नहीं उड़ पाता। इसलिए मच्छर से बचाव सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

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आंकड़े बताते हैं कि जितने लोग लोगों को इंसेफेलाइटिस होता है, उनमें से केवल 10 फीसदी में ही दिमागी बुखार के लक्षण जैसे झटके आना, बेहोशी और कोमा जैसी स्थिति दिखाई देती है। इनमें से 50 से 60 प्रतिशत मरीजों की मौत हो जाती है। बचे हुए मरीजों में से लगभग आधे लकवाग्रस्त हो जाते हैं और उनके आंख और कान ठीक से काम नहीं करते हैं। जिंदगीभर दौरे आते रहते हैं। मानसिक अपंगता हो जाती है।

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