World Health Day : मरीजों के पर्चे बनाते-बनाते उंगलियां दर्द करने लगती हैं

Diti BajpaiDiti Bajpai   7 April 2018 9:43 AM GMT

World Health Day : मरीजों के पर्चे बनाते-बनाते उंगलियां दर्द करने लगती हैं‘मरीज का नाम, मरीज की उम्र’ इन्हीं शब्दों में सिमटी होती है पर्चा बनाने वाली की ज़िदगी।

बाराबंकी। अस्तपाल में घुसते ही जिस शख्स से आपका सबसे पहले सामना होता है वो शीशे की दीवार या फिर लोहे की जाली के पीछे बैठा शख्स होता है, जो पर्चा बनाता है, जिसके आधार पर आपको डॉक्टर देखते हैं। अगर आप सरकारी अस्पताल गए हैं तो ओपीडी में लगी लंबी-लंबी लाइनें और अफरातफरी से जरुर वाकिफ होंगे।

यूपी के बाराबंकी के जिला अस्पताल में जब गांव कनेक्शन की टीम पहुंची, सुबह के आठ बज रहे होंगे और वहां दो लाइनें लगी थीं, एक में पुरुष दूसरे में महिला। 30 से 40 लोग लाइन में थे, सबको जल्दी थी, लेकिन पर्चा बनाने वाला सिर्फ एक शख्स था। नाम था संतोष सिंह, जो पिछले डेढ़ साल से यहां तैनात है। सुबह 8 बजे से 2 बजे तक वो बस लोगों का नाम, उम्र पूछते और लिखते रहते हैं।

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संतोष बताते हैं, “हर मरीज को जल्दी होती है, ओपीडी में समय कम होता है और भीड़ ज्यादा, इसलिए तेजी से लिखना होता है, लोगों को पता नहीं होता, किसे दिखाना है बस इस लाइन में लग जाते हैं, इसके बाद का काम हमारे जिम्मे होता है, आप ये समझ लीजिए कई बार इतना हंगामा होता है कि सर में दर्द हो जाता है, उंगिलयां तो रोज ही दुख जाती हैं।”

“लेकिन ये हमारा रोज का काम है, मरीज काफी दूर से आते हैं, इसलिए हम लोग भी जुटे रहते हैं। थोड़ी देर के लिए चाय पीने जाते हैं और फिर से वही काम शुरू हो जाता है। मरीज का नाम, मरीज की उम्र।" वो मुस्कुराते हुए आगे बताते हैं।

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संतोष के बगल में एक और कर्मचारी बैठता है तो सारे नाम रजिस्टर में नोट करता है, ताकि पता चल सके आज कितने मरीज आए थे। संतोष बताते हैं, "कुछ लोग ऐसे भी आते है जो देर से अस्पताल आते हैं। पर लंबी लाइन में खड़े नहीं होते। घंटों के इंतजार के बाद वो किसी एक लोग को बोलते हैं कि भाई मेरा भी पर्चा बनवा देना। ऐसे मामले रोज होते हैं।''

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संतोष बाराबंकी जिला अस्पताल में अभी अकेले ही हैं जो महिला और पुरूष के पर्चें बनाते हैं। वो आगे बताते हैं, "कुछ लोग अस्पताल में महिलाओं या लड़कियों को इसलिए ले आते हैं ताकि उनके पर्चें जल्दी बन जाए क्योंकि ज्यादातर लोगों के दिमाग में यही रहता है कि महिलाओं के पर्चें जल्दी बनते हैं।"

देश में सरकारी अस्पतालों की संख्या 19,817 और निजी अस्पतालों की संख्या 80,671 है। साढ़े छह लाख गाँव वाले इस देश में सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या सिर्फ 29,635 है और निजी स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या लगभग दो लाख से ज्यादा है। सभी अस्पतालों में महिला और पुरूष के पर्चा बनवाने की सुविधा उपलब्ध है।

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