रायबरेली : बारिश न होने से धान की फ़सल में शीथ ब्लाइट का ख़तरा बढ़ा 

Lokesh Mandal shuklaLokesh Mandal shukla   21 Sep 2017 4:43 PM GMT

रायबरेली : बारिश न होने से धान की फ़सल में शीथ ब्लाइट का ख़तरा बढ़ा धान की फसल 

स्वयं कम्यूनिटी जर्नलिस्ट

रायबरेली। पिछले कुछ दिनों से बारिश न होने से वैसे ही किसान परेशान हैं, ऊपर से धान की फसल में फैल रहे रोगों ने उनकी चिंता को भी बढ़ा दी है। झुलसा व तना छेदक रोग के प्रकोप से धान के उत्पादन पर असर पड़ने का खतरा मंडराने लगा है।

रायबरेली जिले से 33 किलोमीटर दूर बछरावां कस्बा क्षेत्र के दर्जनों गाँवों में धान की फसल पर झुलसा रोग के प्रकोप बढ़ रहा है। धान की फसल में खासकर निचले क्षेत्रों में जहां पर्याप्त मात्रा में नमी बनी हुई है या फिर जल भराव रहता है वहां शीथ ब्लाइट (सडूवा, झुलसा) का प्रकोप होता है। इस रोग में पौधे की निचली पत्ती तने के साथ जहां से जुड़ी होती है, उस पर भूरे धब्बे बनते दिखाई देते है, जिससे फसल सड़ने के साथ पौधे के सूख जाने की भी शंका बनी रहती है।

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सामान्यतः सांभा मंसूरी, बासमती बादशाह व सुगंधित धानों में जीवाणु झुलसा रोग अधिक होता है। बछरावां से तीन किमी. दूर जलालपुर गाँव के किसान बद्रीप्रसाद (60 वर्ष) ने बताया कि रोग के चलते उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभाव को सोच कर नींद उड़ी हुई है। कैसे इस साल काम चलेगा, अगर एक बार पानी बरस जाए तो ये पूरा रोग समाप्त हो जाएगा।

झुलसा रोग कई फसलों में होता है जैसे धान, कपास, आलू, जौ, बैंगन आदि। यह रोग जीवाणुजनित है। इस रोग का प्रकोप खेत में एक साथ न शुरू होकर कहीं-कहीं शुरू होता है तथा धीरे-धीरे चारों तरफ फैलता है|
डॉ विक्रम सिंह, कृषि वैज्ञानिक,केवीके रायबरेली

डॉ. विक्रम सिंह आगे बताते हैं, इसमें पत्ते ऊपर से सूखना शुरू होकर किनारों से नीचे की ओर सूखते हैं। गंभीर हालात में फसल पूरी सूखी हुई पुआल की तरह नजर आती है। इस रोग के प्रारंभिक लक्षण पत्तियों पर रोपोई या बुवाई के 20 से 25 दिन बाद दिखाई देते हैं। सबसे पहले पत्ती के किनारे वाला ऊपरी भाग हल्का नीला-सा हो जाता है तथा फिर मटमैला हरापन लिये हुए पीला सा होने लगता है। रोगग्रसित पौधे कमजोर हो जाते हैं और उनमें कंसे कम निकलते हैं। दाने पूरी तरह नहीं भरते व पैदावार कम हो जाती है।

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ऐसे करें शीथ ब्लाइट से बचाव

  • इस रोग के प्रकोप वाले क्षेत्रों में बार-बार एक ही प्रजाति न उगाएं।
  • पौधे ऐसी जगह न बोए जहां पिछली फसल के अवशेष पड़े हों या जहां छाया रहती हो।
  • नाइट्रोजन खाद का प्रयोग अधिक न करें तथा रोपाई के 40 दिन बाद तो बिल्कुल न दें।
  • खेतों में पानी लगातार न लगाए रखें।
  • बीमारी वाले खेतों का पानी स्वस्थ खेतों में न लगाएं।

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