शोहदों के डर से डंडा लिए रातभर पहरा देती हैं हॉस्टल की लड़कियां

Meenal TingalMeenal Tingal   29 July 2017 12:52 PM GMT

शोहदों के डर से डंडा लिए रातभर पहरा देती हैं हॉस्टल की लड़कियांशिकायत के बाद पहुंची पुलिस ने शोहदों के खिलाफ की कार्रवाई, छात्राओं ने एसओ का जताया आभार।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

बहराइच। राजकीय बालिका विद्यालय के हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं को आजकल पढ़ाई के अलावा एक अलग तरह की परेशानी झेलनी पड़ रही हैं। रात में शोहदे हॉस्टल की बाउंड्री पार कर अंदर न घुस आएं, इसके लिए उन्हें पूरी रात पालियों में हाथ में डंडे लेकर पहरा देना पड़ता है। ये छात्राएं जंगल के क्षेत्रों यानी वनग्राम की रहने वाली हैं और शहर में बिना पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था के रह रही हैं।

गाँव कनेक्शन को इन छात्राओं ने बताया कि यहां उनकी संख्या बीस है। इनमें से दस छात्राओं का एक समूह रात में डंडा लेकर आधी रात तक पहरा देता है। इसके बाद दूसरे समूह की बारी आती है। इस तरह इन बच्चियों की रात आधी रात की नींद के साथ गुजरती है।

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दरअसल, पहरा देने की वजह है शहर के वे शोहदे, जो कुछ समय पहले तक उस हॉस्टल पर कब्जा किए हुए थे। उन शोहदों से प्रशासन ने हॉस्टल खाली करवाकर इन बच्चियों को यहां संरक्षण दिया था। इसके बाद ये शोहदे रात में अक्सर दीवार फांदकर हॉस्टल परिसर में घुस जाते थे और सीटी बजाते थे। जब स्थानीय प्रशासन उन्हें सबक नहीं सिखा पाया तो इन लड़कियों ने अपनी सुरक्षा का खुद ही बीड़ा उठाया।

इसी हॉस्टल में रहकर 11वीं में पढ़ने वाली रेखा (उम्र 17 वर्ष) बताती हैं, “मेरे गाँव और आस-पास रहने वाली ज्यादातर लड़कियों के माता-पिता उनसे मजदूरी करवाते थे, जबकि हम लोग पढ़ना चाहते थे। इसलिए “देहात संस्था” के कहने पर हम लोग शहर चले आए। यहां आकर हम लोग पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन हम लोगों के रहने के लिए कोई जगह नहीं थी। इसलिए संस्था ने हमें हॉस्टल में जगह दिलवा दी। लेकिन यहां रात को आवारा लड़के छेड़खानी करते हैं। बहुत डर लगता है। इसलिए रात को आधे लोग पहरा देते हैं और आधे सोते हैं।”

नई बस्ती टिड़िया की रहने वाली राजिया खातून (उम्र 17 वर्ष) ने कहा, “मैं पढ़ना चाहती थी। इसीलिए संस्था वाले भइया के साथ शहर आ गई। जब कभी घर जाना होता है तो अपनी सहेलियों के साथ चले जाते हैं, ताकि घरवाले वापस आने से रोक न लें। वहां रहकर मजदूरी करवायेंगे पढ़ने नहीं देंगे। यहां हॉस्टल में संस्था वाले खाना-पीना देते हैं।

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देहात संस्था के जितेन्द्र चतुर्वेदी ने बताया कि मैं इन बच्चियों को पढ़ा-लिखाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना चाहता हूं। ये वे बच्चियां हैं, जो पढ़ना तो चाहती थीं, लेकिन इन्हें मौका नहीं मिला। मेरी संस्था के प्रयासों से इन्हें रहने के लिए हॉस्टल में जगह भी मिल पाई है, लेकिन इनकी सुरक्षा के लिए मैं चिंतित रहता हूं और हर तरह से प्रयासरत हूं कि इन शोहदों के आतंक को कम करवा सकूं, जिससे बच्चियां सुरक्षित रह सकें।

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