अगर मानदेय न मिला तो कहीं इन महिलाओं का कम न हो जाए उत्साह 

अगर मानदेय न मिला तो कहीं इन महिलाओं का कम न हो जाए उत्साह महिला समाख्या में कार्यरत इन महिलाओं को डेढ़ साल से नही मिला मानदेय

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम कर रही संस्था महिला समाख्या से जुड़े विभिन्न पदों पर 800 कर्मचारियों को पिछले डेढ़ साल से मानदेय न मिलने से इनके परिवारों पर सीधे तौर पर असर पड़ रहा है। ये अपना काम मानदेय न मिलने के बावजूद उसी उत्साह और लगन के साथ कर रहे हैं। कई सरकारी विभाग इसे ग्रामीण क्षेत्रों में सशक्त समूह के तौर पर इनकी मदद ले रहे हैं। इतनी महत्वपूर्ण कड़ी होने के बावजूद अगर लम्बे समय तक इनका मानदेय न मिला तो कहीं इनका उत्साह कम न हो जाए।

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प्रदेश के 19 जिलों में महिला समाख्या से सीधे तौर पर दो लाख महिलाएं जुड़ी हैं, जो संघ की महिलाएं हैं। बुलंदशहर जिले की महिला समाख्या की जिला कार्यक्रम समन्यवक निशा चौधरी उदास मन से बताती हैं, “फील्ड जाने के लिए पिछले एक साल से हर रोज घरवालों से पैसा मांगना पड़ता है, तब कहीं फील्ड में जाकर काम कर पाते हैं, जुलाई में बच्चों का एडमिशन कराना पड़ेगा तब पैसे कहां से आयेंगे, दिन रात मेहनत करने के बाद जब पैसा नहीं मिलता है तो निराशा होती है, कबतक पैसा मिलेगा कुछ पता नहीं।” निशा महिला समाख्या की वो पहली कार्यकत्री नहीं हैं जो मानदेय न मिलने से परेशान हो बल्कि इनकी तरह 800 कर्मचारियों की ये समस्या है, जो मानदेय न मिलने से काम करने के बाद भी अपने घरवालों पर निर्भर हैं।

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भारत सरकार ने महिला समाख्या कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1989 में की थी। भारत सरकार ने अप्रैल 2016 में जब इस कार्यक्रम को बंद करने का फैसला किया तो उत्तर प्रदेश सरकार ने महिला सामाख्या कार्यक्रम को बेसिक शिक्षा विभाग से हटाकर महिला एवं बाल कल्याण विभाग के अंतर्गत करने का अनुमोदन कर दिया। डेढ़ वर्ष से ये महिलाएं मानदेय न मिलने से बदहाली की जिन्दगी जीने को मजबूर हैं।

महिला एवं बाल कल्याण विभाग की प्रमुख सचिव रेणुका कुमार का कहना है, “कैबिनेट में फ़ाइल भेजी जा चुकी है, कैबिनेट अप्रूवल लेना है, अब इनका मानदेय बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं रुकेगा, जल्द ही इन्हें मानदेय मिले ये हमारा प्रयास है।”

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मऊ जिले के रानीपुर ब्लॉक के बड़ा गाँव की रहने वाली उर्मिला (40 वर्ष) बताती हैं, “कई महीनों से पैसा नहीं मिला, घर का पूरा खर्च हमारी तनख्वाह से चलता था, जो पैसे जोड़कर रखे अब वो भी खत्म हो गए, बहुत मुश्किल से घर के बाहर कदम निकाला था काम करने के लिए, अब तो दुकानदार भी उधार देने से मना कर रहे हैं, हर दिन चूल्हा जलाने के लिए सोचना पड़ता है।”

महिला समाख्या के श्रावस्ती जिले की जिला समन्यवक इन्दू गौतम का कहना है, “हमे अपने मानदेय से ज्यादा हमसे जुड़ी महिलाओं के मानदेय की चिंता है, क्योंकि कुछ महिलाएं इसी मानदेय से अपने पूरे परिवार की जिमेदारी संभालती हैं, मानदेय न मिलने से इनके जरूरी खर्चों के साथ ही बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ रहा है, हर महीने उम्मीद होती है इस बार मिल जाएगा, इस उम्मीद में डेढ़ साल गुजर गये हैं।”

महिला सामाख्या की राज्य परियोजना निदेशक डॉ. स्मृति सिंह का कहना है, “ये प्रोग्राम पिछले वर्ष कई साजिशों का शिकार रहा है, जिसकी वजह से लाखों लोग प्रभावित हुए। स्वच्छ भारत अभियान में हमारी 58 हजार महिलाएं लगातार काम कर रही हैं, जिसमें से हर एक महिला को 25 शौचालय बनाने की जिम्मेदारी सौपी गयी है जिसे वो बखूबी निभा रही हैं, कई और सरकारी विभाग भी महिलाओं के इस संगठन की सराहना कर रहे हैं और गाँव स्तर पर अपनी योजनाओं को पहुंचाने का सशक्त माध्यम मान रहे हैं, तो फिर काम के बदले इन्हें समय से दाम तो मिलना ही चाहिए नहीं तो इनका मनोबल टूट जाएगा।”

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