माहवारी पर हुई चर्चा, तो ख़त्म हुई झिझक 

Neetu SinghNeetu Singh   2 Aug 2017 8:53 AM GMT

माहवारी पर हुई चर्चा, तो ख़त्म हुई झिझक स्कूली छात्राओं को जानकारी देता टीम का सदस्य। 

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। ग्रामीण क्षेत्रों में माहवारी पर बात करना तो दूर इसका जिक्र भी आता है तो महिलाएं शरमा जाती हैं। चूंकि यह मामला उनकी सेहत से जुड़ा है, गाँव कनेक्शन फाउंडेशन की मुहिम रही है कि उन्हें इस बारे में जागरूक किया जाए। फाउंडेशन ने बीती 28 मई को माहवारी दिवस पर प्रदेश के 25 जिलों में मुहिम छेड़ी, जो लगातार जारी है। मकसद है, ग्रामीण महिलाओं में माहवारी को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को दूर करना।

इस कड़ी में मंगलवार को जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर बख्शी का तालाब के कुनौरा गाँव में भारतीय ग्रामीण विद्यालय में वात्सल्य संस्था की मदद से छात्राओं के साथ एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें स्कूल की छात्राओं के साथ वात्सल्य संस्था के साथियों ने माहवारी और लड़कियों के शारीरिक बदलाव को लेकर खुलकर चर्चा की।

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इस स्कूल में पढ़ने वाली 12वीं की छात्रा श्वेता बाजपेयी (16 वर्ष) ने सकुचाते हुए कहा, “हम इस विषय पर कभी बात नहीं करते हैं। माहवारी के दौरान मम्मी हमें मंदिर नहीं जाने देती। आचार नहीं छूने देती। बाल धोनी की भी मनाही होती है।” श्वेता ने कहा, “आज पहली बार इतने लोगों के सामने इस विषय पर चर्चा सुनी।

कई तरह की जानकारी मिली, पता चला कि मंदिर जाना कोई पाप नहीं है। अगर ऐसे ही जानकारी मिलती रहे तो हमारी भ्रम दूर होगी।” श्वेता प्रदेश की पहली छात्रा नहीं हैं, जो माहवारी जैसे विषय पर बात करने से झिझक रही हों। इनकी तरह लाखों किशोरियां आज भी माहवारी को लेकर खुलकर बात नहीं करतीं।

वात्सल्य संस्था के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर प्रदीप सिंह ने छात्राओं को बताया, “किशोरियों में बड़े होने पर जो बदलाव होता है, उसकी जानकारी उन्हें उनके माता-पिता और टीचर पहले से दें, जिससे वे इस परिवर्तन के लिए तैयार रहें। छात्राएं आज भी शारीरिक परिवर्तन पर खुलकर बोलने में संकोच करती हैं, लेकिन धीरे-धीरे इस परंपरा में बदलाव की आहट सुनाई पड़ने लगी है। अगर इन्हें सही ढंग से समझाया जाए, तो थोड़ी झिझक के साथ ही सही, ये आगे आएंगी।”

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वहीं इस संस्था की जिला समन्यवक ममता सिंह ने पैड निस्तारण के लिए छात्राओं को किशोरी मटका और इन्सीनरेटर के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा, “पैड खुले में फेंकने की बजाए उसका समुचित निस्तारण जरूरी है। तीन से चार घंटे में एक बार पैड बदलना जरूरी है। पैड या कपड़ा खुले में फेंकने की बजाए इन्सीनरेटर का प्रयोग करें, जो दो सौ रुपए में बन जाता है।

एक आंकड़े के मुताबिक़ देशभर में करीब 35 करोड़ महिलाएं उस उम्र में हैं, जब माहवारी होती है। लेकिन इनमें से करोड़ों महिलाएं इस अवधि को सुविधाजनक और सम्मानजनक तरीके से नहीं गुजार पाती। एक शोध के अनुसार करीब 71 फीसदी महिलाओं को प्रथम मासिक स्राव से पहले मासिकधर्म के बारे में जानकारी ही नहीं होती। करीब 70 फ़ीसदी महिलाओं की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होती कि सेनिटरी नेपकिन खरीद पाएं, जिसकी वजह से वे कपड़े इस्तेमाल करती हैं।

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