खेतों में काम नहीं करना चाहते हैं मजदूर  

खेतों में काम नहीं करना चाहते हैं मजदूर   लखनऊ की इंदिरानगर लेबर मंडी में काम की तलाश में आए मजदूर।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। गोंडा जिले से लखनऊ आकर काम रहे निर्माण मजदूर पप्पू पांडेय (42 वर्ष) पहले खेतों पर काम करते थे। पूरा दिन खेतों में पसीना बहाने के बाद शाम को मिलने वाली महज़ 150 रुपए की मजदूरी से उनका घर नहीं चल पा रहा था। इसलिए उन्होंने शहर आकर मजदूरी करना शुरू कर दिया।

अपनी परेशानी बताते हुए पप्पू पांडेय बताते हैं, ''खेतों में कटाई का काम करने में दिन भर में एक बार चाय और बिस्कुट मिलता है और शाम के सात बजे तक काम करने के बाद बहुत ज़्यादा 150 रुपए मिलते हैं। इससे अच्छा है कि हम शहर में लेबरी करके 250 से 300 तक कमा लेते हैं।''

ये एक अकेले पप्पू की परेशानी नहीं है, भारतीय जनगणना 2011 के अनुसार देश में वर्ष 2011 तक 45.36 करोड़ लोगों ने काम की तलाश में पलायन किया। इससे में 68 प्रतिशत ऐसे लोग शामिल थे, जिन्होंने काम के लिए गाँवों से शहर में पलायन किया।

सरकार ने एक अप्रैल से गेहूं खरीद शुरू कर दी है, लेकिन गाँवों में खेतिहर मजदूरों की कमी के चलते गेहूं कटाई भी प्रभावित हो रही है। बाराबंकी जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर स्थित हैरगढ़ क्षेत्र के कई गाँवों में मजदूरों की कमी से फसलों की कटाई में देरी हो रही है।

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हैदरगढ़ क्षेत्र के नरेन्द्रपुर मदरहा गाँव में इस समय गेहूं की फसल खेतों में तैयार खड़ी है। मगर मजदूरों की कमी से फसल की कटाई में देरी हो रही है। यहां के निवासी रामदीन ने बताया, ''गाँव में मजदूरों को 200 रुपए मजदूरी दी जाती है, लेकिन मजदूर गाँव में काम नहीं करना चाहते, वो यहां से लखनऊ या अन्य जगह मजदूरी करने चले जाते हैं। वहां उन्हें आराम से 300 रुपए तक मिल जाता है।''

भारतीय जनगणना 2011 के अनुसार भारत में वर्ष 1951 में करीब 27.3 करोड़ खेतिहर मजदूर थे, जो वर्ष 2011 में घटकर 14.4 करोड़ ही बचे हैं। कृषि क्षेत्र से जुड़े कामों में कम आय होने के कारण खेतीहर मजदूरों की अधिकतर जनसंख्या भवन निर्माण श्रमिक, खुद का व्यवसाय और अन्य कार्यों में संलिप्त होती पाई गई।

लखनऊ की इंदिरानगर लेबर मंडी में रोज़ काम की तलाश में आने वाले सीतापुर जिले के रेउसा ब्लॉक के मजदूर राकेश सिंह (44 वर्ष) बताते हैं, ''गाँव में खेतों पर काम करने पर उसी दिन पैसा मिल जाए यह ज़रूरी नहीं होता। कई बार हम लोगों को पैसा तीन-चार रोज बाद या फिर हफ्ते भर बाद मिलता है। शहर में ऐसा नहीं होता है। हमें हर दिन काम की मजूरी (पैसा) मिलती है।''

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गाँव में दिहाड़ी कम मिलने के अलावा मजदूरों के शहर आकर काम करने का एक कारण स्थानीय परेशानियां भी हैं। लखनऊ में मजदूरी का काम कर रहे लखीमपुर खीरी जिले के शारदानाथ (50 वर्ष) बताते हैं, ''एक समय था, जब सबसे ज़्यादा खेतिहर मजदूर लखीमपुर जिले के थें, लेकिन बाढ़ की वजह से अब गाँवों में काम नहीं मिलता है, इसलिए शहर आकर पेट पालना पड़ रहा है।''

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