अंधेरे घरों में उजाला लेकर आई सूरज बत्ती

अंधेरे घरों में उजाला लेकर आई सूरज बत्तीदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी तक बिजली ठीक से नहीं पहुंच पाई है।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी तक बिजली ठीक से नहीं पहुंच पाई है। जहां बिजली पहुंच भी गई है वहां कब आएगी और कब जाएगी, यह किसी को पता नहीं होता है। अपने आस-पास वालों को बिजली की समस्या से गुजरते देख बिहार के आशीष सोना (36 वर्ष) ने ‘सूरज बत्ती’ का निर्माण किया है।

आशीष सोना दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद बिहार के मधेपुरा जिले में ‘सोलर-एलईडी प्रयोगशाला’ चला रहे हैं। इनका मकसद है कि जहां बिजली नहीं है या जहां बिजली समय से नहीं आती वहां भी उजाला हो।

महिलाएं उजाले में खाना बनाएं और बच्चे उजाले में पढ़ सकें।आशीष ‘सूरज बत्ती’ के बारे में बात करते हुए बताते हैं, “इस तरह के प्रोडक्ट मार्केट में पहले से उपलब्ध हैं लेकिन इस प्रोडेक्ट की खास बात ये है कि इसका कवर प्लास्टिक से नहीं बना है।

ये भी पढ़ें- बिजली कटेगी तो एसएमएस से मिलेगी उपभोक्ता को सूचना

इसके कवर के निर्माण में लोहे का इस्तेमाल किया गया है। ऐसा इसलिए किया गया है कि प्लास्टिक से बनी चीज गिरने के बाद जल्दी बन नहीं पाती है। लेकिन हमारा प्रोडक्ट गिरने के बाद भी आराम से चलता है।

इसमें सभी चीज़ें ओरिजनल लगाई गई हैं, ताकि एक बार खरीदने के बाद बार-बार परेशान न होना पड़े।” ‘सूरज बत्ती’ एक बार चार्ज होने के बाद 25 घंटे तक बिजली दे सकती है। इसकी कीमत लगभग 2100 रुपए है, इससे मोबाइल भी चार्ज किया जा सकता है। इससे प्रदूषण कम होता है और आसानी से हमारे घर को उजाला भी मिल जाता है।

प्रदूषण और बीमारी कम हुई

सूरज बत्ती के इस्तेमाल से ग्रामीण इलाकों में प्रदूषण भी कम हुआ और केरोसीन तेल के लिए लोग परेशान भी नहीं हो रहे हैं। यह जानने के लिए मैंने ग्रामीण इलाकों में लोगों से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि घर में काला दाग लग जाता था और लोगों को सांस की दिक्कत होती थी वो अब कम हो रही है।

ये भी पढ़ें- अब सरकार खरीदेगी सौर ऊर्जा से बनने वाली बिजली

मधेपुरा में काम करना मुश्किल था

2009 से सोलर ऊर्जा पर काम करने वाले आशीष बताते हैं, “मधेपुरा में काम करना हमारे लिए बहुत मुश्किल था। मधेपुरा क्या पूरे बिहार में सोलर से सम्बंधित कोई भी प्रोडक्ट नहीं मिलता है। सामान के अलावा प्रशिक्षित लोग भी नहीं मिल रहे थे। एक-एक आदमी को पकड़कर सिखाना पड़ता था। एक-एक चीज़ के लिए 10-10 दिन इंतजार करना पड़ता था, लेकिन कोशिश थी कि यहां भी एक उद्योग किया जा सकता है।”

ताजा अपडेट के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहां, ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

Share it
Top