झांझी टेसू को लेकर कभी गाँवों में एक सप्ताह तक रहता था पर्व सा माहौल

झांझी टेसू को लेकर कभी गाँवों में एक सप्ताह तक रहता था पर्व सा माहौलफोटो: गाँव कनेक्शन 

दिलीप सिंह/रमन यादव

एटा। “ब्रज की भाषा में रंगा”, यह गीत कभी ब्रज क्षेत्र में मिट्टी के झांझी टेसू को हाथ में लेकर बच्चों व बड़ों के झुण्ड रश्म निभाते वक़्त गाया करते हैं, आज भागती-दौड़ती जिंदगी में न यह गीत सुनाई देते हैं और न ही यह यह रस्म निभाने वाले झुण्ड, कभी शारदीय नवरात्र से पूर्णिमा तक एक पर्व की तरह मनाया जाने वाला झांझी टेसू का खेल अब विलुप्त होने की कगार पर है, झाँझी टेसू की शादी की रस्म तो शायद सभी भूल गए हैं, पैसा इकट्ठा करने के लालच में कुछ गरीब बच्चे जरूर इसे बचाए रखे हुए हैं।

दशहरा पर्व के बाद झांझी टेसू के विवाह के लिए पूर्णिमा तक हाथों में मिटटी के टेसू और झांझी लेकर लोगों के घरों में अनाज, पैसा मांगने के लिए बच्चों व बड़ों के झुण्ड दस्तक दिया करते हैं, पहले इस खेल में लोग काफी रूचि दिखाया करते थे, अब समय के साथ लोगों की रूचि इस खेल से गायब होती जा रही है, खासकर यह खेल गांवों में बड़े ही शौक से खेला जाता था, बुजुर्गों में अब तो इस खेल को बचाने की फ़िक्र बची हुयी है।

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रात-रात भर गाँव में होता था जमकर धमाल

कभी गाँवों में रात-रात भर बच्चों और बड़े लोगों के झुण्ड झांझी टेसू के खेल के लिए खूब धमाल किया करते थे, अलीगंज ब्लॉक के गाँव अमरौली निवासी बुजुर्ग सिद्धार्थ सिंह (75 वर्ष) बताते हैं, "दशहरा के बाद से एक सप्ताह यानि पूर्णमासी तक गाँव की रात बहुत मजेदार हुआ करती थी, हम 15 लोगों का झुण्ड बनाकर कई गाँवों में जाते थे, झुण्ड में एक लड़के पर हल होता था, कुछ लड़कों पर झांझी टेसू हुआ करते थे, सभी गाँव-गाँव जाकर गीत गाते थे और चन्दा इकट्ठा करते थे, हम रात को आठ बजे अपने गाँव से रौशनी के लिए टॉर्च और लालटेन लेकर निकलते थे और रात में तीन या चार बजे वापस लौटते थे, वही गाँव की लड़कियां गाँव में मंगल गीत गाया करती थीं"

झांझी टेसू वालों के लिए घर में रखते थे अनाज

गाँव-गाँव जाकर झांझी टेसू के विवाह के लिए चन्दा इकट्ठा करने वाले लोगों के लिए घरों में सभी लोग अनाज रखा करते थे, गाँव मोहकमपुर निवासी जयपाल सिंह (60 वर्ष) बताते हैं, "गाँव में झाँझी टेसू लेकर बच्चों का झुण्ड आता था उन्हें देने के लिए घरो में पहले से ही अनाज अलग रख दिया जाता था, जिनके पास अनाज नही होता था वह रुपए दे दिया करते थे।"

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बैलगाड़ी भर-भर कर जाते थे झांझी टेसू का विवाह कराने

गाँव अमरौली निवासी बुजुर्ग महिला यशोदा (80 वर्ष) ने बताया, "झांझी टेसू का खेल आपसी भाई चारे व प्रेम का हुआ करता था, इन दिनों में गाँव की लड़किया मंगल गीत गाया करतीं थीं, पूर्णिमा के दिन झांझी टेसू का विवाह किया जाता था इस दिन लड़किया ढाई गज की ओढ़नी व लहंगा पहना करती थीं, जो पैसा मांगकर इकट्ठा होता था उससे गाँव के चबूतरे पर सभी लोग जमा होकर दावत किया करते थे, फिर सभी लोग बैलगाड़ियों से गाँव से 35 किलोमीटर दूर गंगा जी जाकर स्नान करते थे।"

गाँव में भी भूल रहे झांझी टेसू की परम्परा

आज की नेटवर्किंग जिंदगी के आगे शहर और कस्बो में पुरानी परम्पराएँ दम तोड़ रही हैं लेकिन गाँव में भी इनका वजूद समाप्त होता नजर आ रहा है, ऐसा ही झांझी टेसू की परम्परा के साथ हो रहा है, गांवों में इस परम्परा को भुलाया जा रहा है| निधौलीकलां ब्लॉक के गाँव मोहकमपुर निवासी चन्द्रप्रभा(60वर्ष) ने बताया कि "झांझी टेसू 20 वर्ष पहले घर-घर खेले जाते थे, अब इसको भुलाया जा रहा है, पहले घर वाले अपने बच्चों को झांझी टेसू खरीद कर दिया करते थे अब घर वाले और बच्चे इसे खेलने में शर्म महसूस करते हैं," इसी गाँव की ईश्वरी देवी(50वर्ष) कहती हैं कि "अब गांवों में एक दूसरे से रंजिश बहुत है इसी कारण कोई भी बच्चा इस खेल को खेलना पसन्द नही करता, पहले यह बहुत खेला जाता था।"

झांझी टेसू से जुड़ी किवदन्ती

टेसू की उत्पत्ति और इस त्योहार के आरंभ के सम्बन्ध में यहां अनेक किवदंतियाँ प्रचलित है। माना जाता है कि टेसू का आरम्भ महाभारत काल से ही हो गया था। कहा जाता है कि कुन्ती को विवाह से पूर्व ही दो पुत्र उत्पन्न हुए थे जिनंमें पहला पुत्र बब्बरावाहन था जिसे कुन्ती जंगल में छोड़ आई थी। वह बड़ा विलक्षण बालक था। वह पैदा होते ही सामान्य बालक से दुगनी रफ़्तार से बढ़ने लगा और कुछ सालों बाद तो उसने बहुत ही उपद्रव करना शुरू कर दिया।

पाण्डव उससे बहुत परेशान रहने लगे तो सुभद्रा ने भगवान कृष्ण से कहा कि वे उन्हें बब्बरावाहन के आतंक से बचाएं, तो कृष्ण भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से उसकी गर्दन काट दी। परन्तु बब्बरावाहन तो अमृत पी गया था इस लिये वह मरा ही नही। तब कृष्ण ने उसके सिर को छेकुर के पेड़ पर रख दिया। लेकिन फिर भी बब्बरावाहन शान्त नहीं हुआ तो कृष्ण ने अपनी माया से सांझी को उत्पन्न किया और टेसू से उसका विवाह रचाया।

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टेसू का स्वरूप

आमतौर पर टेसू का स्टैण्ड बांस का बनाया जाता है जिसमें मिट्टी की तीन पुतलियां फिट कर दी जाती हैं। जो क्रमश: टेसू राजा, दासी और चौकीदार की होती है या टेसू राजा और दो दासियां होती हैं। मध्य में मोमबत्ती या दिया रखने का स्थान होता है।

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