गलियों में रहने वाले बच्चों ने कहा, हमें हमारी पहचान और अधिकार चाहिए

गलियों में रहने वाले बच्चों ने कहा,  हमें हमारी पहचान और अधिकार चाहिए

लखनऊ। बाल मजदूरी के प्रति विरोध एवं जगरूकता फैलाने के मकसद से हर साल 12 जून को बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। बाल मजदूरी करने वाले और पहचान को तरस रहे बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था सेव द चिल्ड्रेन ने गलियों में गुजारा करने वाले बच्चों ने अपनी पहचान के अधिकार की मांग के लिए मार्च किया। इस दौरान डबल्यूसीडी, डाकघर और बाल कल्याण समिति को अधिकार ज्ञापन पत्र सौंपे। इस मार्च के दौरान बच्चों ने अपने पहचान के अधिकार और आधार कार्ड बनवाने की मांग की। यह मार्च शिरोज हैंगआउट, गोमती नगर से शुरू होकर मेरीन ड्राइव, गोमती नगर तक किया गया और बच्चे अपने हाथों में बाल श्रम के विरुद्ध संदेशों वाले पोस्टर पकड़ रखे थे।

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संस्था की सदस्य अंजलि सिंह ने बताया, " सेव द चिल्ड्रेन एक अग्रणी बाल अधिकार संस्था है। 120 देशों और भारत के 16 राज्यों में बच्चों के अधिकारों पर काम कर रही है। उत्तर प्रदेश में सेव द चिल्ड्रेन और महिला एवं बाल विकास निदेशालय के साथ साझेदारी में एक परियोजना चल रही है जिसका उद्देश्य लखनऊ की गलियों में गुजारा करने वाले बच्चों की स्थिति में सुधार लाना है। इस परियोजना द्वारा 3000 बच्चों को आधार कार्ड के माध्यम से वैध कानूनी पहचान प्राप्त करने के लिए नामांकित किया जाएगा।"

अंजलि ने आगे बताया, देश के पांच शहरों लखनऊ, मुगलसराय, हावड़ा, हैदराबाद, पटना और नई दिल्ली में सेव द चिल्ड्रेन द्वारा एक सर्वे किया गया जिसमें यह बात निकलर सामने आई कि बड़ी संख्या में बच्चे बाल श्रम के माध्यम से खतरनाक कामों में शामिल पाये गए हैं। संस्था ऐसे बच्चों को इस दलदल से निकालने और उनकी पहचान दिलाने के प्रयास में है।

भारत में करीब 1 करोड़, 26 लाख बाल श्रमिक

बाल श्रम अधिनियम के तहत बाल श्रमिकों को दो कैटेगरी में बांटा गया है। जोखिम भरे और बिना जोखिम भरा। जोखिम भरे उद्योगों में चूड़ी, मिठाई, कैमिकल फैक्ट्री, बायो मेडिकल वेस्ट जैस काम है। इसके अलावा 14 वर्ष से ऊपर की आयु के बच्चों को केवल तीन घंटे तक काम करवाया जा सकता है। बाल मजदूरी करवाने वाले से 40 हजार रुपए के आर्थिक दंड का भी प्रावधान है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के जागरूकता पैदा करने के लिए 2002 में विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस के रूप में मनाने की शुरूआत की। संगठन के अनुमान के मुताबिक विश्व में 21 करोड़ 80 लाख बालश्रमिक हैं। जबकि एक आकलन के अनुसार भारत में ये आंकड़ा 1 करोड, 26 लाख 66 हजार 377 को छूता है। अंतरराष्ट्रीय लेबर ऑर्गेनाइजेशन की तरफ से जारी ये आंकड़े आज भी डराते हैं।

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कई बीमारियों की गिरफ्त में आ जाते हैं बाल श्रमिक

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के मुताबिक विश्व में 21 करोड़ 80 लाख बाल श्रमिक हैं। केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार 2001 की जन गणना के अनुसार भारत में 25.2 करोड़ कुल बच्चों की आबादी की तुलना में, 5-14वर्ष के आयु समूह के 1.26 करोड़ बच्चे काम कर रहे हैं। इनमें से लगभग 12लाख बच्चे ऐसे ख़तरनाक व्यवसायों और उद्योगों में काम कर रहे हैं जो बालश्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम के अंतर्गत निषेध है। शहरी क्षेत्रों में उन बच्चों की संख्या अत्याधिक, है जो कैंटीन में काम करते हैं या चिथड़े उठाने एवं सामानों की फेरी लगाने में संग्लन हैं लेकिन इस संबंध में कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है। अधिक बदकिस्मत बच्चे वे हैं, जो जोखिम वाले उद्यमों में कार्यरत हैं। कितने ही बच्चे हानिकारक प्रदूषित कारखानों में काम करते हैं, जिनकी ईंट की दीवार पर कालिख जमी रहती है और हवा विषैली होती है वे ऐसी भठियों के पास काम करते हैं, जो 1200 डिग्री सेल्सियस ताप पर जलती हैं। वे आर्सेनिक और पोटेशियम जैसे खतरनाक रसायनों को काम में लेते हैं। इन बच्चों से कांच-धमन की इकाइयों मेंकाम कराया जाता है, जहां उनके फेफड़ों पर जोर पड़ता है, जिससे तपेदिक जैसी बीमारियां होती हैं लेकिन तब भी अपने मालिकों के आदेश पर उन्हें 12 से 15 घंटे लगातार काम करना पड़ता है।

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