बुलंदशहर से ग्राउंड रिपोर्ट: 'हम गाय के कंकाल को हाइवे पर लेकर जाएंगे, नारेबाजी और प्रदर्शन करेंगे, आप इसे प्रमुखता से कवर करें

लोकसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में बढ़ते धार्मिक उन्माद के माहौल में एक और घटना जुड़ने वाली थी। पश्चिमी यूपी धार्मिक उन्माद का एक प्रमुख केंद्र रहा है।

स्‍याना (बुलंदशहर)। पत्रकारों के फ़ोन बजने लगे थे, उत्तर प्रदेश के इस पश्चिमी ज़िले बुलंदशहर में उनसे लगभग दस किलोमीटर दूर, एक गाँव में गन्ने के एक खेत में एक या अधिक गायों के मृत शरीर के टुकड़े मिले थे। गाँव के लड़के चाहते थे कि मामला तूल पकड़े और अख़बार में उनकी तस्वीर छपे। धार्मिक नारे गाँव की गलियों में गूंज रहे थे।

ज़िले के महाव गाँव में तुरत-फुरत एक ट्रैक्टर और ट्राली का इंतजाम कर लिया गया। गायों के शव उन पर लाद दिए गए। क्षेत्र के पत्रकार और पुलिस दोनों जानते थे कि गाँव में घटी इस घटना की चिंगारी कितनी दूर तक जा सकती थी लोकसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में बढ़ते धार्मिक उन्माद के माहौल में एक और घटना जुड़ने वाली थी। पश्चिमी यूपी धार्मिक उन्माद का एक प्रमुख केंद्र रहा है।

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इसके कुछ घंटे पहले, दो दिसंबर की सुबह करीब साढ़े नौ बजे, महाव गाँव के खेत में गाय के कंकाल मिलने की सूचना स्‍याना थाने को दी गई थी। थाने से गाँव से पांच किलोमीटर दूर स्थित चिंगरावठी पुलिस चौकी पर मौजूद दो सिपाहियों को महाव गाँव पहुंचने के लिए फोन किया। सिपाही तुरंत गाँव की ओर चल दिए।

चौकी में खाना बनाने का काम करने वाली और चिंगरावठी गाँव की रहने वाली भागवती उस वक़्त वहीं थीं। ''सिपाहियों के पास फोन आया कि तुरंत महाव गाँव पहुंचो, दोनों सिपाही मेरे सामने ही महाव के लिए निकल गए,'' भागवती ने गाँव कनेक्शन को बताया, ''इसके तुरंत बाद इंस्‍पेक्‍टर सुबोध कुमार सिंह की गाड़ी भी महाव की ओर जाते दिखी।''

उसके बाद भीड़ के हमले में पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की जान चली गई। स्याना पुलिस थाने के कोतवाल इंस्पेक्टर सुबोध कुमार दादरी हिंसा में अखलाक की हत्या मामले की भी जांच अधिकारी थे। उनकी निष्ठा एवं कर्मठता को ऐसे समझा जा सकता है कि जब दादरी मामले में गाय का मांस बदलने का उन पर दबाव पड़ा तो वे झुके नहीं, इसके बाद उनका तबादला वाराणसी कर दिया गया। (ऐसा सुबोध सिंह ने कोबरा पोस्ट https://www.cobrapost.com/ के स्टिंग में खुद बताया था)

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इस बीच उपद्रवी लड़के पत्रकारों को फ़ोन करने लग गए थे, दंगा करवाने की मशीनरी काम पर लग गई थी। गाँव के प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि सुबोध कुमार ने गाँव पहुँच कर ग्रामीणों से बात की और मामला शांत हो रहा था। जिस खेत में गाय का शरीर मिला था उसके मालिक ने कहा कि वह थाने में शिकायत लिखवा देगा।

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एक स्थानीय रिपोर्टर ने बताया, "जब मैं पहुंचा, तो वहां पहले से ही इंस्‍पेक्‍टर सुबोध कुमार सिंह और तहसीलदार राजकुमार भाष्‍कर मौजूद थे। वो गाँववालों को समझाने में लगे थे। तभी इस भीड़ में स्‍याना से आए एक खास गुट से जुड़े लोग शामिल हो गए और नारेबाजी करने लगे।"

अगले ही पल मामला पलटने लगा। पास के ही गाँव नया बांस का रहने वाला बजरंग दल का जिला संयोजक योगेश राज भी अपने साथ कई युवकों को लेकर यहां पहुंच गया। इतना ही नहीं, करीब 13 किमी दूर बुगरासी से भी लड़के मौके पर पहुंच गए। पतली सी ईंटों की सड़क, जिसे स्थानीय भाषा में खड़ंजा कहते हैं, बाइकों से भर गई थी।

"इन लड़कों ने मुझसे कहा कि हम गाय के कंकाल को स्‍याना-बुलंदशहर हाइवे पर लेकर जाएंगे, जहां नारेबाजी और प्रदर्शन करेंगे, आप इसे प्रमुखता से कवर करें,'' गाँव में उस वक़्त मौजूद पत्रकार ने गाँव कनेक्शन को बताया।

इसके बाद कंकालों को हाइवे पर ले जाने को लेकर कोतवाल सुबोध सिंह और उपद्रवियों के बीच नोंकझोंक होने लगी। पुलिस ऐसा करने से उपद्रवियों को इसलिए रोक रही थी क्योंकि जिस रास्ते पर वो बवाल करना चाह रहे थे उसी रास्ते से इज्तिमा के लिए लाखों मुस्लिम समुदाय के लोग आ जा रहे थे।


पुलिस से नोंकझोंक के बीच तहसीलदार ने हाथ जोड़कर ऐसा करने से मना भी किया, और पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह ने अपनी गाड़ी से ट्राली का रास्ता रोक दिया। लेकिन इसके बाद उपद्रवी लड़के ट्राली को खेतों में उतार कर आगे जाने लगे। इसबीच पुलिस ने लाठीचार्ज कर भीड़ को तितर-बितर करना चाहा, तो उस समय उपद्रवी सड़क किनारे गड्ढों में छिप गए, इसी बीच और भीड़ आ गई और इन लोगों ने सड़क बनाने के लिए लगाई गए पत्थरों से पुलिस पर आक्रमण शुरू कर दिया।

भीड़ के हमला बोलते ही सिपाही खेतों में भागने लगे, इसी बीच एक लड़के को कुछ लोग लाते दिखे, उसे गोली लगी थी। इसके बाद उपद्रवियों ने कोतवाल सुबोध सिंह का पीछा किया। हमले से बचने के लिए सिपाही भाग खड़े हुए और थोड़ी देर बाद इंस्पेक्टर सुबोध सिंह का शरीर गाड़ी से लटका हुआ पाया गया। बाद में उस लड़के सुमित की भी गोली लगने से मौत हो गई।

उधर, जब दो दिन बाद गाँव कनेक्शन संवाददाता को बताते हुए चिंगरावठी गाँव के एक बुजुर्ग ने कहा, ''यो बालक खेल-खेल में कांड कर गए। उन्‍ने ना पता रहो के ये हो जाओगो।''


चिंगरावठी उन तीन गाँवों में से एक है, जहां के लोगों पर स्‍याना हिंसा में शामिल होने का आरोप लगा है। इन बुजुर्ग की बात को स्‍थानीय लोग भी सही ठहराते हैं। चिंगरावठी के ग्राम प्रधान अजय कुमार कहते हैं, ''हुआ बस इतना कि जिन्‍होंने भी ये किया, भीड़ बढ़ने पर उनके हाथ से मामला निकल गया।''

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बाकी पुलिसवाले अपनी जान बचाने के लिए वहां से भाग गए खड़े हुए। सुबोध सिंह का शरीर उसी गाड़ी में था। लड़कों ने आकर उन्‍हें देखा और फिर वो भी भाग खड़े हुए। इस बीच एक लड़के ने कपड़े में आग लगाकर उनकी जीप में रख दिया, जबकि वो देख रहा था कि उसी जीप में इंस्‍पेक्‍टर का शरीर भी पड़ा हुआ है," प्रत्यक्षदर्शी ने गाँव कनेक्शन को बताया।

उधर, एडीजी लॉ एंड आर्डर आनंद कुमार ने कहा, ''इस हिंसा में नया बांस गाँव, महाव और चिंगरावठी गांव के करीब 400 लोग शामिल थे। फिलहाल इस मामले की जांच एसआईटी कर रही है। परत दर परत जांच में देखने पर मालूम होता है कि कुछ अतिउत्‍साही युवकों की उदंडता के चलते ऐसा हुआ।" घटना की रोज सुबह से ही मौके पर मौजूद एक स्थानीय पत्रकार ने बताया, ''मुझे प्रदर्शन कर रहे लड़कों में से एक युवक का कॉल आया और उसने मुझसे कहा- इस खबर को आप कवर कीजिए, मेरा नाम जरूर लीखिएगा।''

सड़क पर हंगामे की सूचना पर चिंगरावठी गाँव के प्रधान अजय कुमार भी हाइवे पर पहुंच गए। चिंगरावठी और महाव गांव आमने-सामने है। दोनों गाँवों से आने वाली सड़क स्‍याना-बुलंदशहर हाइवे पर आमने सामने मिलती है। इस तरह ये एक चौराहा बनता है। इसी चौराहे पर चिंगरावठी चौकी भी मौजूद है। प्रदर्शनकारी इसी जगह ट्रॉली लगाकर नारेबाजी कर रहे थे।

ग्राम प्रधान अजय कुमार बताते हैं, ''लड़कों ने सड़क को जाम कर दिया था। पुलिस-प्रशासन उन्‍हें समझा रहा था, लेकिन वो मानने को तैयार ही नहीं थे। ऐसे में पुलिस ने हल्‍का बल प्रयोग किया, जिससे भीड़ तितर-बितर हो जाए। ऐसा हुआ भी, और लड़के भाग भी गए, लेकिन वो सभी सड़क से लगे गड्ढों में जा छिपे।''


अजय कुमार आगे बताया, ''कुछ देर ही बीते होंगे कि लड़कों ने हो हल्‍ला करते हुए हंगामा शुरु कर दिया। एका एक हुए इस पथराव और हंगामे से सब भागने लगे और फिर क्‍या हुआ कुछ पता नहीं। पथराव इतनी तेज हो रहा था कि इसे करने वाले और इससे बचने वालों में फर्क ही नहीं समझ आता था। मैंने दीवार की ओट ली तब जाकर बचा।''

अजय अपने गाँव का पक्ष लेते हुए कहते हैं, ''मेरे गांव का तो गेहूं के साथ घुन पिसने का हाल हुआ है। गाय मिली महाव में, ट्रॉली पर लादकर वहां से लाई गई और बदनाम हो गया चिंगरावठी, क्‍योंकि चौकी का नाम चिंगरावठी है।'' अजय ने इस लाइन से अपनी बात पूरी की, ''हुआ बस इतना कि जिन्‍होंने भी ये किया, भीड़ बढ़ने पर उनके हाथ से मामला निकल गया, वो संभाल न पाए।''

वहीं, चिंगरावठी चौकी से सटा हुआ श्रीमति दिलावरी देवी पीजी कॉलेज है। कॉलेज की एक शिक्षिका ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "सोमवार को मैं अपने क्‍लास में बैठी थी। तभी चपरासी दौड़ते हुए आया और उसने कॉलेज के बाहर हंगामा होने की बात कही। हम सब खिड़कियों से देख रहे थे," उन्होंने आगे बताया, "मैंने देखा कॉलेज की दीवार से सट कर सुमित पड़ा हुआ था। उसके शरीर से खून निकल रहा था। तभी देखा कि कुछ लड़के जिनकी उम्र 17 से 20 साल के बीच रही होगी इंस्‍पेक्‍टर सुबोध कुमार सिंह को दौड़ा रहे थे। सुबोध कुमार सिंह लड़खड़ा कर गिर पड़े और फिर नहीं उठे। एक लड़के ने उनके शरीर को हिलाया पर कोई हरकत नहीं थी।"

शिक्षिका ने बताया, "तभी एक पुलिस की जीप आई और ड्राइवर और एक और पुलिसवाला उन्‍हें उठाकर जीप में रखने लगे। अभी वो जीप को आगे बढ़ाते तब तक लड़कों की भीड़ वापस आ गई। इस पर पुलिसवाले अपनी जान बचाने के लिए वहां से भागे वो (सुबोध सिंह) उसी गाड़ी में रह गए। लड़कों ने आकर उन्‍हें देखा और फिर भाग खड़े हुए। इस बीच एक लड़के ने कपड़े में आग लगाकर उनकी जीप में रख दिया, जबकि वो देख रहा था कि उसी जीप में इंस्‍पेक्‍टर का शरीर भी पड़ा हुआ है। तभी मौके पर और पुलिस वाले आए और इंस्‍पेक्‍टर सुबोध के शरीर को गाड़ी से खींच निकाला।"

सोशल मीडिया में वायरल एक वीडियो में साफ दिखता है कि खेत में खड़ी जीप में सुबोध कुमार सिंह का शरीर लटका हुआ है, जिसमें सिर नीचे जमीन पर और पैर ऊपर सीट पर फंसे हैं। बुलंदशहर हिंसा मामले में अब तक आठ वीडियो सामने आए हैं, जिनमें मारपीट, सुमित को गोली लगने के बाद ले जाते युवक दिखाई दे रहे हैं।

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