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आज कार के मॉडल से देखते हैं रुतबा , कभी दरवाजे पर गाय-भैंस की संख्या से आंकी जाती थी हैसियत

Ashwani DwivediAshwani Dwivedi   17 Jan 2018 5:50 PM GMT

आज कार के मॉडल से देखते हैं रुतबा , कभी दरवाजे पर गाय-भैंस की संख्या से आंकी जाती थी हैसियतगाँव में घर के दरवाजे पर गाय

लखनऊ। आजकल लोग किसी के घर के बाहर खड़ी कार से आप उसकी हैसियत का अंदाजा लगाते हैं, कभी ये काम गाय-भैंस की संख्या पर होता था। कुछ दशक पहले अगर आप किसी गांव में जाते तो जो जिस घर के सामने जितनी ज्यादा गाय-भैंस बैल बंधे मिलते थे, वो उतना ही संपन्न माना जाता था।

पशुओं को लेकर हालात कुछ इस तरह बदले हैं कि शहरों से सटे कस्बाई इलाकों में भी जहां कई-कई गाय-भैंसे हुआ करती थीं, वहां पैकेटों में दूध आने लगा है। पशुओं के प्रति बढ़ती बेरुखी की वजह महंगाई और परिश्रम बताया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के बख्शी का तालाब (बीकेटी) तहसील में अकड़रिया खुर्द गांव में रहने वाले प्रेम यादव अपने ब्लॉक में दूध के सबसे बड़े व्यवसायी थे। कभी उनकी डेयरी में 100 से ज्यादा भैंसें थीं, अब सिर्फ 2 ही बची हैं। वजह पूछने पर वो बताते हैं, "30 सालों तक दूध का काम किया। लखनऊ (शहर) के हजारों घरों में दूध जाता था। लेकिन मेरी उम्र हो गई है, बेटे नयी सोच के हैं। जानवरों के साथ बराबार लगना (मेहनत) पड़ता है। वो (बेटे) दूसरे काम करने लगे तो कारोबार बंद कर दिया।"

गोमती नदी की तराई में बसे प्रेम यादव के गांव अकड़रियां समेत इस इलाके के दर्जनों गांव दुघरा, जमखनवा, सुल्तानपुर बहादुरपुर ,खानीपुर गाँव में लाखों लीटर दूध उत्पादन होता था। आज भी कारोबार बड़े पैमाने पर है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन गांवों में पशुओं की संख्या तेजी से कम हो रही है। ये हालात तब हैं जब दुग्ध उत्पादन में उत्तर प्रदेश नंबर वन है और भारत विश्व में सबसे आगे।

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देश के इस डेयरी व्यवसाय से छह करोड़ किसान अपनी जीविका कमाते हैं। 19 वीं पशुगणना के अनुसार भारत में कुल 51.2 करोड़ पशु है। भारत अभी सालाना 16 करोड़ (वर्ष 2015-16) लीटर दूध का उत्पादन कर रहा है। इसमें 51 प्रतिशत उत्पादन भैंसों से, 20 प्रतिशत देशी प्रजाति की गायों से और 25 प्रतिशत विदेशी प्रजाति की गायों से आता है।

कभी यही जानवर किसानों के सबसे बड़े सारथी हुआ करते थे। लेकिन बिगड़ती नस्लों, कम होते चरागाहों के चलते किसान पशुओं से दूर होते गए। दो दिन पहले दिल्ली में पशु स्वास्थ्य से जुड़ी एक कंपनी के कार्यक्रम में केंद्रीय लघु एवं सूक्ष्म उद्योग मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा, "किसानों की आमदनी तब तक नहीं बढ़ सकती है जब तक खेती और पशुधन एक साथ न हों।" खुद केंद्रीय किसान और पशु कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह 2017 में लिखे गए किसानों की आमदनी बढ़ाने के अपने लेख में कहते हैं, “किसानों को सलाह दी गई है कि वो एक साथ कई फसलें उगाए। खेती के साथ पशुपालन, मुर्गी, शूकर और मछली पालन भी करें।’’

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लेकिन पशुपालन क्षेत्र की मुश्किलें युवाओँ को दूर इससे दूर ले जा रही हैं। जहां पहले प्रत्येक गाँव में चारागाह की जमीन चिन्हित थी। उन्हीं जमीनों पर मकान बन गए है या उन पर खेती होने लगी है। बख्शी का तालाब ब्लॉक के अकड़किया कला गाँव के रामशंकर द्विवेदी ( 74 वर्ष) बताते हैं, "पहले गाँव का एक आदमी सारे गाँव की गाय, भैंसों को चरा लाता था, बदले में हम उसे मासिक पारिश्रमिक देते थे। धीरे-धीरे जंगल, चारागाह ही खेत बन गए। जानवरों को चराने की जगह खत्म हो गयी। दूसरे, आजकल के लड़के मेहनत नहीं करना चाहते, गोबर करकट करने में उनका स्तर खराब होता है। अब सिर्फ एक गाय है उसी के सहारे काम चल रहा है।" पिछले 25 सालों से रामशंकर द्विवेदी पशुपालन से जुड़े हैं। पहले उनके पास छह देशी गाय और दो तीन जर्सी गाय थीं।

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उत्तर प्रदेश में पिछली सरकार में बड़े जोर-शोर से कामधेनु योजना शुरू की गई थी। पशुओं की संख्या पर आधारित ये योजना तीन स्तर पर थी। योजना के लिए एमबीए से लेकर इंजीनियरिंग की डिग्रीधारक युवाओं ने आवेदन किया और डेयरी शुरू की लेकिन उनमें से ज्यादातर कारोबार बंद कर चुके हैं या फिर घाटे में हैं।

राजस्व विभाग द्वारा गोसेवा आयोग को उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की करीब 58000 ग्राम पंचायतों में चारागाह हैं, इनका कुल रकबा 95140 हेक्टयर है लेकिन विभाग के अनुसार 70-80 फीसद चारागाहों पर अवैध कब्जे हैं। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने शपथ लेने के बाद एंटी भूमाफिया अभियान शुरू किया, जिसमें 50-50 वर्षों तक के कब्जे सामने आए हैं। ग्रामीणों को उम्मीद जगी है कि उनके बचे-खुचे चारागाह मुक्त होंगे।

पशुओं की संख्या घटती क्यों जा रही है और आवारा पशुओं की संख्या में इजाफे के पीछे की एक वजह लखनऊ के ककौली गाँव के निवासी जयपाल सिंह यादव (66 वर्ष) बताते हैं, "हमेशा गाय-भैंस घर में पाली और दूध का व्यवसाय भी किया अभी भी दो गाय हमारे पास हैं, लेकिन जैसे-जैसे शहरीकरण हुआ हमारी जमीन महंगी हुई और प्लाटिंग शुरू हो गयी, लड़के मॉडर्न हो गए। अब जानवरों का चारा पानी कौन करे? साथ ही जानवरों के लिए न तो चराने की जगह रह गयी, न ही हरे चारे की व्यवस्था हो पाती है। यही वजह है कि जानवर कम करने पड़े। हमारे बाबा कहा करते थे कि जिसके दरवाजे पर गाय भैस नहीं वो किसान कैसा।"

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दूसरी बड़ी समस्या लागत के अनुपात में मुनाफा रहा। लेकिन पशुधन के विशेषज्ञ इसका उपाय बताते हैं, पिछले 40 वर्षों से इस इंडस्ट्री में काम कर रहे आयुर्वेद के प्रबंध निदेशक पशुपालन को मुनाफे का सौदा बनाए जाने पर कहते हैं, “पशुपालन का मतलब सिर्फ गाय-भैंस नहीं। अगर आप के पास जगह है तो मछली पालिए, पोल्ट्री का बिजनेस कीजिए। जब दूध हो तो उसे सीधे न बेचें बल्कि उससे प्रोडेक्ट बनाएं, जैसे खोया, पनीर और दूसरे प्रोडक्ट, जिनसे आप की अच्छी कमाई होगी। गोबर है तो बायोगैस और बिजली बनाने की कोशिश करिए।’

सिर्फ भारत ही नहीं दुनियाभर में इस बात पर मंथन जारी है कि पशुओं के जरिए आमदनी बढ़ाने पर ज़ाेर दिया जाए ताकि वो किसानों और ग्रामीणों के लिए उपयोगी हों। पशुधन को लेकर दुनियाभर के देशों के साथ काम करने वाली गैर सरकारी संस्था पशुधन और पशु चिकित्सा दवाओं के वैश्विक संगठन जीएलवीमेड (GALVmed) से जुड़े पशु चिकित्सक और जानकार राहुल श्रीवास्तव कहते हैं, "भारत में छोटे-बड़े, मझोले और घरेलू कई तरह के पशुपालक हैं, उन्हें नजर में रखकर योजनाएं बनाए जाने की जरूरत है। छोटे जानवरों के पशुपालन को बढ़ाए जाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में छोटे पालक अच्छे नतीजे दे रहे हैं।”

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इस बात को लखनऊ के युवा पशुपालक विजय यादव (34 वर्ष) की बातों से समझा जा सकता है। वह कहते हैं, “भूसा-चोकर महंगा हो गया है, पशुओं से दूध उतना मिलता नहीं है जितना खिलाने में खर्चा आता है। यही कारण है किसान अनुपयोगी जानवरों को खुला छोड़ रहे है।” विजय के दर्द के पीछे की एक वजह जानकार खेती का मशीनीकरण भी मानते हैं। गेहूं-धान में कंबाइऩ के उपयोग से भूसा कम हुआ तो ज्यादा फसल लेने के लालच ने पराली जलाने की समस्या को जन्म दिया।

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