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कम कीमत में एसी की हवा देगा 'देसी कूलैंट'

इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल में दिल्ली के ऐंट स्टूडियो के द्वारा बनाए गए जुगाड़ वाले एसी ने लोगों को लुभाया। मिट्टी के बर्तनों, पानी और पंखे की मदद से तैयार हुआ है एसी, पर्यावरण को नहीं होगा नुकसान।

Jigyasa MishraJigyasa Mishra   21 May 2019 6:55 AM GMT

कम कीमत में एसी की हवा देगा देसी कूलैंट

लखनऊ। अगर आप अपने एसी के बढ़ते बिजली के बिल से परेशान हैं तो आने वाले दिनों में राहत मिल सकती है। देश के कुछ युवाओं ने ऐसा देसी एसी तैयार किया जो कूलर से कम बिजली में चलेगा। आम एयरकंडीशन जहां गर्म हवा निकालकर वातावरण को नुकसान पहुंचाते हैं वहीं ये एसी आने वाले दिनों में हवा को भी साफ करेगा।

टीम ऐंट स्टूडियो

देसी एसी को बनाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले मोनीष कुमार बताते हैं, "सामान्य एसी के मुकाबले ये बिल्कुल अलग है। इसमें न कोई कंडेसर लगा है न गैस भरी गई है। बल्कि मिट्टी के कुछ पॉट (बर्तन), पानी और पंखों का इस्तेमाल किया गया है। इस तरह का सबसे छोटा देसी कूलैंट करीब 6 हजार रुपए का होगा।"

मोनीष की टीम ने इस एसी को देसी कूलैंट नाम दिया है। पांच से 8 अक्टूबर को लखनऊ में हुए इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल में इस देसी कूलैंट ने लोगों को खूब लुभाया। यहां पर प्रदर्शन के लिए काफी बड़े साइज (14 फीट ऊंचा) देसी कूलैंट तैयार किया गया था। लोहे की कुछ जालियों पर रखे मिट्टी के बर्तनों से पर पानी गिर रहा था, और उससे निकलती ठंडी-ठंडी हवा माहौल को खुशनुमा बना रही था। विज्ञान पवेलियन में जाने वाले लोग रुक-रुक कर ठंडी हवा का आनंद ले रहे थे। इसे दिल्ली के ऐंट स्टूडियों ने तैयार कर अपने नाम पेंटेट कराया है। मोनिष पेशे से आर्कीटेक्ट और ऐंट स्टूडियो के हेड हैं।

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'देसी कूलैंट' से ठंडी-ठंडी हवा निकलने के वैज्ञानिक पहलू को मोनीष समझाते हैं, "एक स्टैंड पर विशेष प्रकार के मिट्टी के बर्तन रखे गए हैं। जिन पर कूलर की तरह लगातार पानी गिरता रहता है, इसके पीछे कूलैंट के आकार के मुताबिक लगा पंखा हवा बाहर की ओर फेंकता है।

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पानी से भीगे मिट्टी के बर्तनों से आनी वाली हवा ठंडी हो जाती है। इसके पीछे की वजह सरफेस एरिया (सतह क्षेत्र) ज्यादा होने की वजह से हवा का तापमान कम हो जाता है।"

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इजीप्शियान पीरियड की इवैपोरटिव कूलिंग (वाष्पीकरण से ठंढक):

कला और तकनीकी से नए प्रयास करते रहने वाले मनीष आगे बताते हैं। "ठंडक बढ़ने की प्रक्रिया के लिए इस्तेमाल हुए बेलनाकार आकर के मिटटी के शंकु के सरफेस एरिया (सतह क्षेत्र) को बढ़ाया गया है जिसके जरिए 50 डिग्री सेल्सियस तापमान तक की हवा 10 मीटर प्रति सेकंड की गति से शंकुओं से गुज़रती है। इसी दौरान शंकुओं पर पानी का बहाव सुनिश्चित किया जाता है जिस से हवा का तापमान काम होकर 36 डिग्री पहुंच जाता है।

मोनीष के मुताबिक इस तरह के उपकरण शहर और ग्रामीण दोनों इलाकों में ठंडी हवा देने में सक्षम हैं। ये देसी ऐसी कुम्हारों को रोज़गार और घरों, दफ्तरों, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड जैसी तमाम जगहों पर तेज़ गर्मी से बचने में काम आ सकता है। मोनीष बताते हैं, "हमने इसे कम दाम में बड़ी व छोटी दोनों जगहों पर पर्यावरण का ध्यान रखते हुए ठंडक पहुचाने के उद्देश्य से बनाया गया है, जिसमें हम अभी एयर प्यूरीफायर पर भी काम कर रहे हैं।"


जल्द ही छोटे प्रारूप में उपलब्ध होगा:

फ़िलहाल देसी कूल ऐंट के 14 फ़ीट लंबी ढांचे कई दफ्तरों में लगाए गए हैं, जो सफल रहे हैं। हालांकि अभी सिर्फ आउटडोर (बाहर) के इस्तेमाल हेतु बनाये गए हैं पर 2 महीने के अंदर इसका छोटा प्रारूप भी तैयार हो जाएगा जिसे आसानी से कमरों व केबिन में रख कर इस्तेमाल किया जा सकेगा। मोनीष के मुताबिक इसका आकार और बहने वाला पानी एक समस्या थी, जिसे दूर किया जा रहा है। 14 फ़ीट वाला देसी कूलैंट पेटेंट की प्रक्रिया में पास हो चुका है जिसका पेटेंट ऐंट स्टूडियो के नाम से है।

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कुम्हारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे:

मात्र त्यौहारों के दौरान थोड़ा बहुत कमाने वाले कुम्हारों के लिए ये एक बेहतरीन ज़रिया है। "देसी कूलैंट में ढेरों मिट्टी के खोखले पीपों के आकार जैसे वस्तुओं का प्रयोग हुआ है जिसे सिर्फ मंजे हुए कुम्हार ही बना सकते हैं। अगर ऐसे एसी चलन में आते हैं तो कुम्हारों को रोजगार का जरिया मिलेगा।" मिट्टी के ये बर्तन टूटने पर दोबारा मिट्टी में मिल जाएंगे, जिससे कोई नुकसानदायक अपशिष्ट (वेस्ट) नहीं बचेगा।

मोनीष के एसी की सबसे खास बात इसका पर्यावरण अनुकूल होना है। सामान्य एसी के चलते पर काफी गर्म हवा निकलती है, जो वातावरण के तापमान को गर्म करती है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जब धरती का बढ़ता तापमान बढ़ी समस्या है। मोनीष बताते हैं, आम एयरकंडीशनर की तरह इससे क्लोरो फ्लोरो कार्बन तत्व (सीएफसी) का स्राव नहीं होता है। ये तत्व अल्ट्रा वायलेट किरणों से वायुमंडल की ओजोन परत के लिए घातक होता है। जबकि देसी कूलैंट में बिजला का पंखा, मिट्टी और पानी का इस्तेमाल हुआ है जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।"

ठंडक देने के साथ ही हवा को भी करेगा साफ:

शहरों में गर्मी के साथ प्रदूषण भी एक आम व घातक समस्या बनती जा रही है, जिस से बचने के लिए देसी कूलैंट पर हवा को शुद्ध करने लिए मॉस यानि काई को उगाने की भी तैयारी की जा रही है। "मॉस कई पेड़ों के भाँती एयर प्यूरीफाई (हवा को शुद्ध) कर सकते हैं। मॉस मिटटी पर आश्रित होते हैं इसीलिए हम इस यूनिट (मिट्टी के बर्तनों पर) पर मॉस उगने की प्रक्रिया पर काम कर रहे हैं, ताकि प्रदूषित क्षेत्रों में यह गर्मी से राहत के साथ ही हवा को भी स्वच्छ करे।" मोनीष ने बताया।





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