इन बच्चों के हाथों में अब कूड़े का थैला नहीं, किताबों का बस्ता होता है

इन बच्चों के हाथों में अब कूड़े का थैला नहीं, किताबों का बस्ता होता हैअजय सिंघल के प्रयास हर दिन सुबह शाम बच्चों की दी जाती है नि:शुल्क शिक्षा, सैकड़ों बच्चे रोज आते हैं पढ़ने

लखनऊ। इस बस्ती के बच्चे आज से सात पहले हर सुबह उठकर कूड़ा बीनने निकल जाते थे। इनके भविष्य की कहानी इसी कूड़े के ढेर में खत्म होती जा रही थी। यहाँ के रहने वाले अजय सिंघल (47 वर्ष) ने इन बच्चों को पढ़ाने की ठान ली। आज 70 फीसदी बच्चों को ये नि:शुल्क पढ़ाने का काम कर रहे हैं। अब हर सुबह इनके हाथ में कूड़े का थैला नहीं बल्कि कापी-किताबों से भरा बैग होता है।

“एक सुबह इस बस्ती से गुजर रहा था, स्कूल समय पर यहाँ के बहुत सारे बच्चे खेल रहे थे, पूछने पर पता चला ये सब कूड़ा बीनने जाते हैं। इनके माता-पिता से जब बात की तो उन्होंने कहा, पढ़-लिखकर कौन सा ये नौकरी करने लगेंगे, बीनना तो जिन्दगीभर कूड़ा ही है।” ये कहना है अजय सिंघल का। ये गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, “इन बच्चों को मैं पढ़ाना चाहता था, इनको कूड़ा बीनने से दूर करना चाहता था, यही सोचकर इस बस्ती का सर्वे किया, पूरी बस्ती में 600 बच्चे थे पर कोई भी स्कूल नहीं जाता था, कुछ बच्चों से मन्दिर की छत पर पढ़ाने की शुरुआत की थी, आज सैकड़ों बच्चे रोज पढ़ने आते हैं।”

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कभी इन हाथों में होता था कूड़े का थैला पर अब हैं किताबें

सहारनपुर जिला मुख्यालय से चार किलोमीटर दूर भगवती कालोनी नाम की एक बस्ती है। ढाई हजार की इस बस्ती में आज से सात पहले कोई भी बच्चा स्कूल नहीं जाता था। ये कूड़ा बीनने का काम करते थे। महिलाएं सूप (जिससे चावल फटके जाते हैं) बनाती थी और यहाँ के पुरुष कूड़ा बीनना, पुराने कपड़ों से समान बेचना, फेरी लगाना जैसे काम करके अपने परिवार का खर्चा चलाते थे। इनकी भाषा, रहन-सहन, जिन्दगी जीने का ढंग आम लोगों से बिल्कुल अलग था। अजय ने इस बस्ती का सर्वे करने के बाद 26 जनवरी 2011 को एक मन्दिर की छत पर यहाँ के बच्चों को पढ़ाने की शुरुआत की थी। इस स्कूल में पहले दिन 32 बच्चे पढ़ने आये थे लेकिन अब हर सुबह 171 के बच्चे जिनकी उम्र चार से सात साल होती है। शाम को 200 बच्चे पढ़ने आते हैं। शिक्षा के अधिकार के तहत अजय अबतक 78 बच्चों को विभिन्न कक्षाओं में दाखिला करा चुके हैं।

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कभी बोलने से डरते थे ये बच्चे ,अब खुलकर पूंछने लगे हैं सवाल

अजय ने कहा, “मुझे ये तो नहीं पता क्रांति किसे कहते हैं पर इतना जरुर कह सकते हैं इस बस्ती में अब क्रांति देखने को मिलती है। इनका रहन-सहन, इनकी भाषा, इनके खाने के तौर-तरीके जब इन्हें बताए गये तो इन्होने खुद बदलाव किया। अब ये साफ़ सुधरे रहते हैं, जो महिलाएं पहले दिन के 40-50 रूपए कमा पाती थी आज उनकी साफ-सफाई की देखकर उन्हें दूसरों के घरों में काम मिल गया है।” वो आगे बताते हैं, “इस गाँव में हर दिन एक रिटायर एमबीबीएस डॉक्टर चार घंटे के लिए आते हैं, प्रति व्यक्ति 10 रुपये की फीस पर मरीज को देखने के साथ ही पूरी दवा भी देते हैं, आसपास के कई गाँवों के 60-70 लोग यहाँ दवा लेने आते हैं।”

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दोस्तों के सहयोग से चल रहा ये संस्थान

इस बस्ती में बच्चों को पढ़ाने की शुरुआत अजय सिंघल ने की थी, लेकिन धीरे-धीरे इनके इन प्रयासों की चर्चा आसपास होनी शुरू हो गयी। अब इनके दोस्त, समाजसेवी, रिटायर्ड अधिकारी इनके सहयोग करने लगे थे। अभी 19 लोगों की इनकी टीम है, जो हर महीने अपनी सुविधा से 500 से लेकर हजार रुपए तक जमा करती है। जिससे इन बच्चों की पढ़ाई का खर्चा चलता है।

छोटे बच्चों के लिए अलग से होती है पढ़ाई

छोटे बच्चे कूड़ा न बीने, इसके लिए चलता है अलग से स्कूल

इस बस्ती का माहौल ऐसा था कि चार-पांच साल के बच्चे सुबह से कूड़ा बीनना शुरू कर देते थे। अजय ने इन बच्चों के लिए सुबह की एक एल्ग से पाठशाला खोद दी जिसमे चार साल से लेकर सात आठ साल के बच्चे पढ़ने आते हैं। अजय ने बताया, “छोटे बच्चों को पिछले साल से ही पढ़ाना शुरू किया है, अभी 171 बच्चे पढ़ने आ रहे हैं। इनके माता-पिता से शुरुआत में 150 रुपए जमा कराए जाते हैं जो देने में सक्षम नहीं हैं उनसे नहीं लिए जाते हैं। पूरे साल इनकी कॉपी-किताब, बैग सभी का खर्चा संस्थान उठाता है।” शाम को बड़े बच्चे पढ़ने आते हैं जिनकी संख्या अभी 200 है। अजय ने इन बच्चों को पढ़ाने के लिए आसपास के पढ़े-लिखे युवाओं को मासिक सैलरी पर रखा है, जो इन सुबह-शाम इन बच्चों को पढ़ाने का कम करते हैं। अजय एलआईसी में काम करते हैं पर हर शाम पांच बजे से रात आठ बजे का वक़्त उनका इन्ही बच्चों के साथ गुजरता है।

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हर दिन सिर्फ 10 रुपए में होता है इलाज

डॉक्टर हर दिन बस्ती में जाकर करते हैं इलाज

यहाँ के लोग कभी बीमार न पड़े उन्हें इलाज के लिए भटकना न पड़े इसके लिए इस बस्ती में हर दिन एक रिटायर्ड एमबीबीएस डॉक्टर जाते हैं। एक मरीज से दस रुपए लेते हैं, देखने के साथ ही दवा भी उतने पैसे में ही देते हैं। इस तरह हर दिन आसपास के कई गाँव के 60-70 लोग इन्हें दिखाने आते हैं।

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फेसबुक से इन बच्चों को पढ़ने के लिए मिली छत

शुरुआत में इन बच्चों ने तीन साल तक मन्दिर की छत पर खुले में पढ़ाई की। अजय फेसबुक पर उड़ान पेज से हर दिन होने वाली गतिविधी शेयर करते रहते थे। अजय ने क्रेजी ग्रीन नाम की संस्था का रजिस्ट्रेशन कराया था उसी के अंतर्गत ‘उड़ान एजूकेशन विंग’ चलती है। फेसबुक के जरिये उड़ान का काम देखकर आश्रय फाउंडेशन ने यहाँ विजिट की। इस संस्था ने इन बच्चों के लिए एक बड़ा हाॅल बनवा दिया। अब ये बच्चे उसी कमरे में पढ़ाई करते हैं।

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