40 साल से रेगिस्तान को कर रहे हरा-भरा, रेत के टीलों में लगाए 50 हजार से ज्यादा पौधे

40 साल से रेगिस्तान को कर रहे हरा-भरा, रेत के टीलों में लगाए 50 हजार से ज्यादा पौधेपौधा लगाते राणाराम बिश्नोई।

लखनऊ। रेत के धोरों (टीलों) पर रेत ही नहीं थमती। पेड़ की जड़ें थमना तो दूर की बात है। लेकिन इंसान का जज्बा यह कारनामा भी कर सकता है। जोधपुर से 100 किमी दूर के ओसियां क्षेत्र का एक गांव है, एकलखोरी। यहां के राणाराम बिश्नोई यहीं कमाल कर रहे हैं।

बचपन में गांव से 33 किलोमीटर दूर स्कूल था। इसके लिए राणाराम पढ़ नहीं पाए। लेकिन प्रकृति की पढ़ाई सीख ली और ऐसी सीखी कि लोग इन्हें राणाराम के बजाय ‘रणजीताराम’ (रण या लड़ाई जीतने वाला) कहने लगे। अभी 77 साल के हैं, राणाराम लेकिन 40 साल पहले (करीब 37 साल की उम्र से) उन्होंने पेड़ लगाने का जो सिलसिला शुरू किया वह आज तक जारी है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे बीज लाकर पौधे तैयार करते हैं।

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खेत-खलिहान, मंदिर-स्कूल और गांव- जहां भी सही जगह मिले, पहली बारिश होते ही उन्हें रोप देते हैं। मवेशियों से बचाने के लिए उनकी बाड़ाबंदी करते हैं। तीन-तीन किलोमीटर दूर से ऊंट गाड़ी पर पानी लाकर पौधे सींचते हैं। उन्हें बच्चों सा पालते हैं। अब तक वे 50 हजार से ज्यादा पौधे लगा चुके हैं।

पिछले 17 साल से वे एक पांच सौ मीटर ऊंचे और तीन बीघा क्षेत्र में फैले धोरे को हरा-भरा करने में जुटे हैं। वर्ष 1998-99 में यहां पर उन्होंने एक हजार पौधे लगाए। बारिश में पौधे लहलहाने लगे। लेकिन बाद में आंधियों में उखड़ गए। केवल 10-15 ही बच पाए। वर्ष 2007 में फिर दो सौ पौधे लगाए। आंधियों में करीब डेढ़ सौ पौधे उखड़ गए। इस बार फिर सात सौ पौधे लगाए हैं। हर रोज घर से करीब तीन किलोमीटर दूर इस धोरे पर वे रोजाना जाते हैं। पास के ट्यूबवेल से पाइप के जरिए पानी लाकर इन्हें सींचते हैं।

बेटे विशेक के साथ राणाराम।

उन्हें यकीन है कि इस धोरे पर भी एक दिन हरियाली छाएगी। ठीक वैसे ही जैसे आसपास के एक बड़े इलाके में उनके प्रयास से छा चुकी है। वे गांव वालों को प्रेरित भी करते हैं। इसी के चलते कई ग्रामीण उनके इस काम में अब हाथ बंटाने लगे हैं या फिर अपनी तरफ से ऐसे ही काम करने लगे हैं। राणाराम के प्रयासों के लिए उन्हें वर्ष 2002 में जिला स्तर पर सम्मान भी मिला, इसके अलावा केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर भी उन्हें उनके काम के लिए सम्मानित कर चुके हैं।

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काम कब और कहां से शुरू हुआ? इस पर वे कहते हैं, ‘ठीक से याद नहीं, लेकिन पहली बार मुकाम (बीकानेर में विश्नोई समाज का धार्मिक स्थान) गए थे। सबसे पहले वहीं पौधा लगाया। फिर यह सिलसिला चल निकला।’ पेड़ों की वजह से आंधियों में जगह छोड़ने वाले धोरे अब बंधने लगे हैं। रेतीली जमीन हरी-भरी हो गई है।

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बेटा मुहिम को आगे बढ़ा रहा

पिता राणाराम की विरासत को बेटा विशेक बिश्नोई आगे बढ़ा रहा है। विशेक पिछले 6 सालों से अकेले मिशन ग्लोबल ब्रांड 363 नाम से मुहीम चला रहे हैं। विशेक ने बिश्नोई समाज को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए दिल्ली के जंतर मंतर के अलावा अजमेर और जोधपुर पर कई धरने और प्रदर्शन कर चुके हैं। उनकी इस मुहिम में आम लोग भी काफी संख्या जुड़ते हैं।

विशेक बिश्नोई।

विशेक अपने पिता के साथ खेती करते हैं। उनके बड़े भाई कल्याण सिंह भारतीय सेना में हैं। विशेक का ज्यादातर वक्त अपनी मुहिम चलाने में निकलता है। वे अपनी इस मुहिम में युवाओं को जोड़ने के उद्देश्य से सोशल मीडिया की मदद ले रहे हैं और युवाओं को जोड़ रहे हैं। इसके जरिये वो अपने काम को लोगों के सामने लाने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि लोगों से उनको काफी अच्छी प्रतिक्रियाएं मिलती हैं।

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वो अपनी मुहिम के लिए सोशल मीडिया से ही फंड जुटाते हैं और इस पैसे का इस्तेमाल पोस्टर, बैनर और धरने से जुड़ी दूसरी चीजों पर करते हैं। सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए विशेक ने अजमेर में धरना प्रदर्शन भी किया। वो कहते हैं कि मुझे उम्मीद है कि देश के प्रधानमंत्री मोदी उनकी आवाज जरूर सुनेंगे। यही वजह है कि उन्होने अपनी मोटरसाइकिल और हेलमेट में स्लोगन लिखा है कि ‘मोदी जी मैं आ रहा हूं’।

प्रकाश जावड़ेकर ने किया सम्मानित।

शहीदों की याद में जगह-जगह लगा रहे पौधे

विशेक चिपको आंदोलन में मारे गए 363 लोगों को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए वर्षों से सरकारी अधिकारियों से लेकर नेताओं के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। लेकिन उसे अब तक आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला है। इसके साथ ही विशेक ने सरकार से मांग की है कि चिपको आंदोलन को इतिहास के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया जाए।

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जोधपुर से लेकर गुड़गांव तक लगाए पौधे

विशेक ने मृतकों की याद में इंडिया गेट, विकास भवन, गुरु जंबेश्वर पर्यावरण संस्थान सिविल लाइन, आईपी कॉलेज दिल्ली सहित अन्य जगहों पर सैकड़ों खेजड़ी और कंकेड़ी के पौधे लगाए हैं। उन्होंने कहा कि अगर सरकार उनका सहयोग करे तो वे पूरे देश में मृतकों की याद में पौधे लगाना चाहते हैं। सरकार व अधिकारियों के नकारात्मक रवैये के चलते 21 मार्च 2014 को उसने प्रधानमंत्री के दिल्ली कार्यालय में एक आरटीआई लगाई। जिसमें सरकार से कुछ प्रश्न पूछे गए थे, उसी दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। तरह-तरह की पूछताछ कर पूरे 4 घंटे बाद संसद मार्ग थाने से छोड़ा गया था।

क्या है चिपको आंदोलन

1730 में राजस्थान के गांव खेजड़ली जिला जोधपुर के राजा के आदेश पर किला बनवाने पर चूना गलाने के लिए लकड़ियों की जरूरत थी। सैनिकों ने क्षेत्र में लगे खेजड़ी के पेड़ों को काटना शुरू कर दिया था। क्षेत्र के लोग इसका विरोध करते हुए पेड़ों से चिपक गए थे। इसके बाद भी सैनिकों ने पेड़ों को चिपके हुए लोगों सहित काट दिया था।

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