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जम्मू-कश्मीर के इस गांव में दहेज लेने वालों को कब्रिस्तान में भी जगह नहीं मिलती

जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले का एक गाँव दहेज प्रथा को एक गंभीर अपराध मानता है। अगर कोई दहेज की मांग करता है तो उसे बहिष्कृत कर दिया जाता है साथ ही स्थानीय मस्जिद में नमाज अदा करने और गांव के कब्रिस्तान में अपने मृतकों को दफनाने की इजाजत नहीं मिलती।

Mudassir KulooMudassir Kuloo   7 April 2021 5:00 AM GMT

जम्मू-कश्मीर के इस गांव में दहेज लेने वालों को कब्रिस्तान में भी जगह नहीं मिलती

श्रीनगर के महाराजगंज बाजार में शादी के माला की दुकान। ( फोटो-Twitter @KitrooAaditya)

गांदरबल (जम्मू-कश्मीर)। बड़ाघर बेबे वेइल 1,000 लोगों का एक छोटा सा गांव है जहां के लोग अखरोट की खेती करते हैं और पश्मीना शॉल बेचते हैं। 30 साल पहले श्रीनगर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गाँव ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया और आज भी उस पर कायम हैं।

गांदरबल जिले के बड़ाघर बेबे वेइल गांव में दहेज पूरी तरह से प्रतिबंधित है और सभी ग्रामीणों ने एक स्टांप पेपर पर हस्ताक्षर करके न तो दहेज लेने और न देने का वादा किया है।

कोविड महामारी में जब शादियां बहुत साधारण तरीकें से होने लगीं, उससे भी बहुत पहले जम्मू-कश्मीर के इस गांव में सरल और सीधे-सादे शादियों का रिश्ता पिछले तीन दशकों से बना हुआ है।

ग्रामीणों ने 30 साल पहले एक स्टांप पेपर पर एक दहेज का दस्तावेज तैयार किया था, जिस पर इमाम और गांव के बुजुर्गों और कुछ प्रमुख लोगों ने हस्ताक्षर किये थे। दस्तावेज में यह भी निर्धारित किया गया कि दूल्हे के परिवार को दुल्हन पक्ष से कुछ भी नहीं मांगना चाहिए। इसके बजाय लड़का पक्ष दुल्हन को 50,000 रुपए का उपहार देता है। इसमें मेहर के रूप में 20,000 रुपए, वार्डन के रूप में 20,000 रुपए और दुल्हन के लिए शादी के कपड़े और अन्य खर्चों के लिए 10,000 रुपए शामिल है। मेहर दुल्हन का अनिवार्य कानूनी अधिकार है और उसे शादी के दौरान उसके दूल्हे द्वारा सम्मान के रूप में दिया जाता है।

स्थानीय मस्जिद के इमाम बशीर अहमद शाह कहते हैं, "कोई भी जो दहेज देता है या शादियों में फालतू खर्च करता है, उसे यहां बहिष्कृत की तरह माना जाता है।"

गांदरबल जिले के बड़ाघर बेबे वेइल गांव में दहेज पूरी तरह से प्रतिबंधित है। (फोटो-Mudassir Kuloo)

"हम सतर्क रहते हैं और दहेज की मांग करने वालों का बहिष्कार करते हैं। उन्हें मस्जिद में नमाज अदा करने की अनुमति नहीं मिलती और उनके परिवारों को कब्रिस्तान में जगह नहीं मिलती है।" 60 वर्षीय इमाम ने कहा।

उन्होंने बताया कि जिस दिन से इस गांव ने दहेज विरोधी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए है तब से बड़ाघर से कोई दहेज के मामले सामने नहीं आए। दहेज को यहां एक गंभीर अपराध के रूप में देखा जाता है।

कश्मीर घाटी में होने वाली शादियों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यहां फालतू में कई दिनों तक दावत चलती रहती है, लेकिन बड़ाघर ने इस प्रथा का विरोध किया है। पिछले तीन दशक से यहां के लोगों ने शादियों में होने वाले खर्चों को बंद कर दिया है। शादी समारोहों को बेहद सरल तरीके से आयोजित किया जा रहा है।

गांव के बाहर शादी करने वाले लड़कियों के माता-पिता भी दूल्हे के सामने इन शर्तों को रखते हैं और बड़ाघर की प्रथा के अनुसार ही कार्यक्रम करते हैं।

गांव के 32 वर्षीय जावीद अहमद शाह ने 2016 में शादी की। 28 वर्षीय बिलाल अहमद ने 2018 में शादी की। इन शादियों में न तो दहेज की मांग की गई और न ही कुछ लेन-देन हुआ।

"यहाँ के ज्यादातर लोग मध्यम वर्ग के हैं। हालांकि कुछ लोग ज्यादा खर्च वाली शादियां कर सकते हैं लेकिन फिर भी वे साधारण तरीकों से ही शादी करते हैं।" जावीद अहमद शाह ने कहते हैं।

"मैं चार लोगों के साथ दुल्हन के घर गया और वहाँ निकाह किया। सब कुछ सादगी से किया गया था। हमने उसके माता-पिता से कुछ भी नहीं मांगा।" बिलाल अहमद ने कहा। उनके भाई और बहन दोनों ने भी बिना दहेज के शादी की है।

"हम सीधे-सादे शादियों में विश्वास करते हैं। हमने अपनी पत्नी के लिए दुल्हन के कपड़ों सहित सभी खर्च खुद किये। दुल्हन के परिवार पर कोई बोझ नहीं था।" जाविद ने कहा। उन्होंने दुख व्यक्त किया कि सामाजिक बुराई अभी भी प्रचलित थी और घरेलू हिंसा का एक मुख्य कारण था।

बड़ाघर के लोगों के जीवन पर इस दहेज प्रथा का गहरा प्रभाव पड़ा है। गांव में दहेज से संबंधित कोई भी घरेलू हिंसा की सूचना नहीं मिली है, ऐसा गांवके लोगों का कहना है। लड़कियों के माता-पिता भी अपनी बेटियों की शादी के लिए खर्च के बोझ से छुटकारा पा चुके हैं।

जाविद कहते हैं कि हम सीधे-सादे शादियों में विश्वास करते हैं।

श्रीनगर की एक प्रमुख महिला कार्यकर्ता एजाबिर अली गाँव कनेक्शन से कहती हैं, "एक बेटी को शादी के समय स्नेह के रूप में दिये जाने वाले उपहार का रिवाज एक समय पर बहुत ही बदसूरत हो गया था।" अली एहसा नामक एक गैर लाभकारी संस्था चलाती हैं जो जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश में महिलाओं के आर्थिक विकास के लिए काम करती हैं।

"दहेज एक सामाजिक बुराई बन गई है और एक खतरनाक प्रवृत्ति है। आमतौर पर महिलाएं अपने ससुराल वालों की मांगों के बारे में नहीं बोलती हैं," अली ने कहा। कई मामले ऐसे सामने आए हैं जहां महिलाओं ने दबाव के आगे घुटने टेक दिए और या तो आत्महत्या का प्रयास किया या तलाक ले लिया। दहेज की मांग की वजह से वे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं का सामना करती हैं। "बड़ाघर गांव दूसरों के लिए एक प्रेरणा है," वे आगी कहती हैं।

दहेज को अक्सर घरेलू हिंसा से जोड़ा जाता है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -5 (2019-20) के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में 18-49 वर्ष की आयु की 9.6 प्रतिशत महिलाओं ने घरेलू हिंसा का सामना किया।

सर्वे में बताया गया है कि शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में यौन उत्पीड़न के ज्यादा मामले सामने आये हैं।

जम्मू-कश्मीर महिला आयोग की अंतिम चेयरपर्सन (5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद भंग) वसुंधरा पाठक मसूदी ने गाँव कनेक्शन से कहा कि उनके पास आने वाली शिकायतों में घरेलू हिंसा दहेज मामले बहुत ज्यादा होते हैं।

मसूदी जो सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील भी हैं, ने कहा, "मेरे कार्यालय में हर महीने फोन कॉल, मेल, व्यक्तिगत संदेश और सोशल मीडिया के माध्यम ऐसी पांच से दस शिकायतें आती हैं।"

इस बीच, बड़ाघर अपने सम्मान को गर्व से आगे बढ़ा रहा है। यह एक ऐसा गाँव बना हुआ है जहाँ बेटियों को उनके माता-पिता द्वारा बोझ नहीं माना जाता है। यहां शादियों को बहुत साधारण माना जाता है और दहेज की न तो मांग की जाती है और न ही दी जाती है। बिलाल ने कहा कि दहेज प्रथा की बुराई से छुटकारा पाने के लिए हमने युवाओं से झूठ बोला। उन्होंने कहा, "अगर हम दुल्हन के परिवार से दहेज की मांग करते हैं तो हमारी बहनों को भी कभी न कभी उसका करना पड़ेगा।"

इस खबर को अंग्रेजी में यहां पढ़ें-

अनुवाद- संतोष कुमार


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